अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
10.06.2017


 समय, परिस्थिति और भाईलोग

समय और परिस्थिति दोनों अभिन्न मित्र हैं।

एक दिन, समय जब आराम करने जा रहा था, उसके मोबाइल की घंटी बजने लगी। उसने फोन रिसीव किया। फोन परिस्थिति का था। समय ने हुलसते हुए कहा - "देखा! अनुमान कितना सही होता है, मेरा। दिल के मामलों में ऐसा ही होता है। ज़रूर, ज़रूरी और महत्वपूर्ण बात होगी, अन्यथा इस समय वह फोन नहीं करता।"

फिर दोनों में बातें हुई, एकदम संक्षिप्त।

इस संक्षिप्तता ने समय को चिढा दिया। उसने कहा - "धत्! बस इतना ही पूछना था कि मैं घर पर हूँ या नहीं।"

आराम करना स्थगित कर वह मित्र की प्रतीक्षा करने लगा।

प्रतीक्षा भी संक्षिप्त रही।

दुआ-सलाम के बाद दुख-सुख की बातें हुईं। दुख-सुख की बातें करने के लिए मनुष्य बनना ज़रूरी होता है। परिस्थिति को मनुष्य के रूप में देखकर समय का मन करुणा से भर उठा। पर उसके चेहरे के भावों को वह पढ़ नहीं सका।

परिस्थिति ने आगे कहा -

"फूल देखे थे अक्सर जनाज़ों में मैंने,
कल गोरखपुर में फूलों का जनाज़ा देखा।"

"वाह! क्या बात है?" समय ने दाद देते हुए कहा - "शायर कब से बन गये?"

"मैं क्यों शायर बनने लगा? शायर बनकर क्या फ़ायदा? औक़ात जैसी कोई चीज़ होती भी है, शायरों के पास? अख़बार में पढ़ा था। किसी बड़े शायर का है।"

"किसी बड़े शायर की रचना है। शायरों के बारे में ऐसी बातें करते हो?"

"क्यों? शायर ही तो है, कोई भाई-वाई तो नहीं? अच्छा, सुन। ख़ुशख़बरी है।"

"ख़ुशख़बरी?"

"हाँ! यहाँ के भाई लोगों को जानते हो न?"

"हाँ, हाँ ... क्यों नहीं। उन लोगों को कौन नहीं जानता होगा। सभी भय खाते हैं उनसे।"

"हाँ! सभी भय खाते हैं उनसे। उनकी दरबार में हाज़िरी लगाते हैं। तुमसे तो कुछ होता नहीं। उन्हें लेकर मैं भी काफ़ी तनाव में रहता था। कल से मैंने भी हाज़िरी लगाना शुरू कर दिया है। और, तुमसे क्या छिपाना। अपना सब कुछ उन्हें अर्पित कर दिया है। आरती करके आ रहा हूँ अभी – ‘तुम्हीं हो माता, पिता तुम्हीं हो .....।’ देखा, आरती का ही असर। सारा भय, सारा टेंशन जाता रहा।"

समय के चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान तैर गयी।

समय के चेहरे पर मुस्कान देखकर परिस्थिति को अचरज हुआ।

समय ने पूछा - "पर ये सब सूझी कैसे तुम्हें?"

"चैनल वाले और अख़बार वाले आजकल काम की बड़ी-बड़ी चीज़ें परोस रहे हैं। नहीं पढ़ा क्या -

‘बन के हादसा, बाज़ारों में आ जायेगा।
जो न होगा, अख़बारों में आ जायेगा।
चोर उचक्कों की करो क़द्र, कि मालूम नहीं,
कौन, कब, कौन सी सरकार में आ जायेगा।’

है न काम की बात?"

सुनकर समय के मुस्कान की रहस्यमयता और गाढ़ी हो गई। उसका चेहरा और अधिक रहस्मय लगने लगा। परिस्थिति को कुछ समझ में नहीं आया। उलझन होने लगी। सोचने लगा - ’भाई लोगों के दरबार में कहीं इसने भी तो ......।"


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें