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ISSN 2292-9754

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09.09.2016


रीतिकालीन हिन्दी काव्य में ऊहात्मक विरह-वर्णन

कहा जाता है कि, "जहाँ न पहुँचै रवि, वहाँ पहुँचै कवि"। बात ग़लत नहीं हैं। यह विशेषता कवि को उसकी कल्पना-शक्ति के कारण प्राप्त है। अपनी कल्पना के बूते पर वह दू-दूर की कौड़ियाँ ढूँढ लाता है। काव्यशास्त्रियों का भी मत है कि कल्पनारहित कवि-कर्म सफल नहीं हो पाता। कल्पना में वह शक्ति मानी जाती है, जिससे काव्य सरस बनता है और जिसको ग्रहण कर रसिकगण झूम उठते हैं। वेद, पुराण और संस्कृत, प्राकृत की असीम काव्य-राशि से लेकर वर्तमान आधुनिक भाषाओं के साहित्य में सुन्दरतम् कल्पनाओं के एक से बढ़कर एक अनूठे उदाहरण बिखरे पड़े हैं।

कल्पनायें सरस, मनोहारिणी, अनूठी, विचित्र और पाठकों-श्रोताओं को मुग्ध कर देने वाली होती हैं। परन्तु विचित्र कल्पनाओं की एक ऐसी श्रेणी भी माननी पड़ती है, जो अपने वैचित्र्य में अनन्य है। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि उनकी विचित्रता को सूचित करने के लिए कोई अन्य कल्पना करना कठिन है। ऐसी कल्पनायें अपनी इसी विशेषता के कारण मनोरंजक बन जाती हैं। इतनी मनोरंजक व विचित्र कि पाठक बरबस हँसने तक को बाध्य हो जाता है। ऐसी कल्पनायें हिन्दी-साहित्य में "ऊहात्मक कल्पनाओं" के नाम से जानी जाती हैं। रीतिकालीन हिन्दी साहित्य में वियोग श्रृंगार के अंतर्गत समाहित होने वाली ऐसी ही कुछ विचित्र और मनोरंजनात्मक कल्पनायें दृष्टव्य हैं। वियोग के कारण नायिका की विरहदग्धता व कृशता के संदर्भ में ये उदाहरण प्रस्तुत हैं।

नायक अपनी नायिका के बिछुड़कर दूर परदेश चला गया है। उसके विरह में नायिका व्याकुल होकर बिलख रही है। विरहदग्धा नायिका की विरहाग्नि कितनी तीव्र हो सकती है?

"औंधाई सीसी सु लखि, बिरह-बरनि बिललात।
बीच ही सूखि गुलाबु गौ, छीटौ घुई न गात॥"

(बिहारी सतसई)

विरहवह्नि से बिलखती नायिका को देखकर उसकी सखियाँ उसे शीतलता पहुँचाने के हेतु से गुलाब जल की शीशी उसके शरीर पर उंडेलती है। लेकिन शरीर की दाहकता इतनी तीव्र है कि उस गर्मी से गुलाबजल शरीर को छूने से पूर्व ही भाप बनकर उड़ जाता है। उसका एक छींटा भी नायिका के शरीर को छू नहीं पाता।

और तो और गुलाबजल की कांच की शीशी तक उस गर्मी से पिघल जाती है-

"दीसी मैं गुलाबजल सीसी में मगहि सूखै।
सीसी मौ पिघली परे, अंचल सौ दागि रै॥"

और आगे भी तो इस विरह अग्नि की तपन देखिये -

"पलनु प्रगटि, बरुनीनु बढ़ि नहीं कपोल ठहरात।
अँसुआ परि छातिया, छिनकु छनछनाइ छिपी जात॥"

प्रिय की याद में नायिका के आँसू उसकी पलकों में प्रगट होते हैं। बरौनियों से होकर आगे बढ़ते हैं और कपोलों पर न रुकते हुए सीधे उसके वक्ष पर गिरते हैं। और वक्ष पर गिरकर उनकी क्या हालत होती है? वे क्षणभर में छनछनाकर भाँप बनकर हवा में गायब हो जाते हैं। गर्म तवे पर पानी की बूँद गिरने से जो हालत होती है, ठीक वही।

हिन्दी रीतिकाल का यह दोहा "अमरुक शतक" (850 ई.) के निम्नलिखित श्लोक से बहुत अधिक साम्य दिखाता है, जिसमें नायक कहता है कि, "मैं यहीं से देख रहा हूँ कि मेरी प्रियतमा का हृदय प्रचण्ड विरह की आग की लपटों से तप्त है। उस हृदय तल के ऊपर लगी हुई आग की लपटों से उसके स्तन चारों ओर से पीले पड़ गये हैं। बड़ी कातर होकर मेरे मार्ग की ओर वह आँख लगाये हुए है। उन आँखों से आँसुओं की बूँदें छन-छन करती हुई स्तनों पर पड़ रही है -"

"तप्ते महाविरहवहिन शिखावलीभिरा
पाण्डुर स्तन तटे हृदये प्रिमायाः।
मन्मार्गवीक्षण निवेशिनदी दृष्टेर्नूनं
छमच्छमिति बाष्पकणाः पतन्ति॥"

("अमरुक शतक")

ईसा की पहली शताब्दी में प्राकृत भाषा में रचित "गाहा सत्तसई" (गाथा सप्तशती) के निम्नलिखित वर्णन की छाया भी बिहारी के एक दोहे में दृष्टव्य है। "गाहा सत्तसई" में कवि लिखता है

"घेत्रूण चुण्णमुट्ठि हरिसूससिआए वेपमाणाए।
भिसिणेमि त्ति पिअअमं हल्थे गन्धोदअं जाअं॥"

(प्राकृत)

संस्कृत में,

"गृहीत्वा चूर्णमुष्टि हर्षोत्सुकिताया वेपमानायाः।
अवकिरामिति प्रियतमं हस्ते गंधोदकं जातम्॥"

(कपूर इ. सुगंधित पदार्थों का चूर्ण नायिका ने मुट्ठी में भरकर, उसे प्रियतम के ऊपर बिखेरने का विचार किया। लेकिन सात्विक स्वेद के कारण (काम जनित) वह चूर्ण नायक के ऊपर सुगंधित जल बनकर ही गिरा।)

बिहारी ने अपने निम्न दोहे में उक्त अवस्था को पलट दिया हैं। यहाँ नायक, नायिका के तप्त शरीर को शीतलता पहुँचाने के लिए दूतियों के द्वारा "अगरजा" (चंदन, कपूर इ. का सुगंधित लेप) भेजता है। सखियाँ वह लेप नायिका को देती है। लेकिन विरहाग्नि की तीव्रता से उस लेप का जलांश भाप बनकर उड़ जाता है और वह लेप नायिका के शरीर पर "अबीर" (सुगंधित-चूर्ण) बनकर ही लगता है -

"मैं लै दयौ लयौ सु कर छुअत छिनकी गौ नीरु।
लाल तिहारौ अगरजा, उर व्है लग्यो अबीरु॥"

(बिहारी सतसई)

नायिका के विरह की इस दाहकता से केवल नायिका या उसकी सखियाँ ही विचलित हों ऐसा नहीं। सारा गाँव भी इस गर्मी से आतंकित है -

"सुनत पथिक मुँह माह निसि, चलत लुवै उहि गाम।
बिनु बुझै, बिनुही कहै, जियत बिचारी बाम॥"

नायक परदेश में है। वह अपनी प्रिया के संबंध में जानने को आतुर है कि उसके विरह में वह मर गई अथवा अभी भी जी रही है। कुछ पथिक, जो उसके गाँव से होते हुए वहाँ पहुँचे हैं - आपस में बातें कर रहे हैं। एक पथिक कहता है कि माघ मास की शीतल रात्री में भी उस गाँव में लूएँ चलती है। नायक यह सुनता है और बिना कुछ पूछे-कहे, जान जाता है कि नायिका अभी जीवित है। कैसे? माघ मास की शीत रात्री में जो लू चल रही है, वह उसकी विरहदग्धा प्रियतमा की साँसों के कारण ही तो होगी। वह यदि मर चुकी होती तो (उसकी साँसों यदि बंद हो गई होती) तो लू कैसे चलती?

इस विरह अग्नि से उत्पन्न गर्मी का आंतक गाँव तक ही सीमित हो, ऐसा नहीं। यह गर्मी तो आगे और भी ताण्डव करती है -

"प्यारी को परसि पौन गयो मानसर महँ,
लगत ही और गति भई मानसर की।
ज्लचर जरे औ" सेवार जरि छार भयो,
जल जरि गयो पंक सूरण्यो भूमि दरकी॥"

प्यारी (प्रेमिका) के शरीर को स्पर्श करके पवन मानसरोवर जा पहुँचा। उस पवन के वहाँ पहुंचते ही मानसरोवर की हालत ख़राब हो गई। विरहदग्धा प्रिया के तप्त शरीर के स्पर्श से गरमाई हुई इस हवा की प्रचण्ड गर्मी से सरोवर के जल में रहनेवाले सभी प्राणी जल गये, शैवाल भी जलकर राख हो गया, सारा पानी जल गया, कीचड़ सूख गया और सरोवर की भूमि दरक गई।

उक्त सारे उदाहरणों में वर्णित दाहकता प्रोषितपतिका नायिकाओं की है, जिनके प्रियतम पहले ही परदेश चले गए हैं। लेकिन उन प्रवत्स्यत्पतिकाओं की दग्धता भी कम दृष्टण्य नहीं, जिनके पति परदेश जानेवाले ही है। यानी प्रिय के परदेश गमन के अवसर पर ही कितनी विरह दग्धता उत्पन्न होती है?

"प्यारों परदेश को गनावे दिन जोतिषी सों
व्याकुल व्है लखत लगन लीक खांचते।
सुनत सगुन तन तरुनी कौ मैन तयो
प्राण गयो पिघली सरस कांचे काँचते।
सासु कहयौ इतै आउ, राचन रुचिर ल्याऊ
अति ही दुखित कर गह्यो लाज पांचत।
थार गयो चटक पटक नारियर गयो
मुद्रा औटि चांदी भई विरह की आंचते॥"

प्रिय को परदेश जाना है। वह ज्योतिषी से मुहूर्त निकाल रहा है। प्रिया व्याकुल होकर ज्योतिषी को लग्न की रेखाएँ खिंचते देख रही है। सगुन सुनते ही उसके तन में कामदेव का प्रभाव उत्पन्न होता है - विरहाग्नि जागती है। सासु बेटे के (नायक के) सिर पर तिलक करने हेतु रोचने की थाली लाते हेतु बहू से कहती है। जब वह थाली लाती है तो विरह की गर्मी से थाली चटक जाती है, उसमें रखा नारीयल पटाक् से फूट जाता है और कलदार रुपया और कर चांदी बन जाता है।

ऐसे ही एक अन्य अवसर पर सासू बेटे को टीका लगा रही हैं। पता चलता है कि अक्षत लगाने का चावल तो थाली में है ही नहीं। सासू बहू से चावल लाने को कहती है। बहू के शरीर में विरह की गर्मी है और वह पसीने से तर-बतर है। सासू के कहने पर वह चावल तो ले आती है लेकिन चावल देने के लिए हाथ फैलाती है तो "भात" हाथ में पक कर तैयार हो चुका होता है।

"तांदूर बिसरी गयो, बधु से कहयो ले आऊ
तब तै पसीनो छुट्यो मन तन को तयो।
तांदुर ले आई तिया आंगन में ठाड़ी रही
कर के पसाखे में भात हाथ में भयो॥"

यही नहीं, रुंध्यासमय संझवाती करने हेतु नायिका अपनी सखि से कहती है और कहती है मेरी छाती से छुआ कर दीये की बाती क्यों नहीं जला लेती?

"सांझ भये भौन संझबाती क्यों न देत आली
छाती ते छुवाय दियाबाती क्यों न बारि लै।"

विरह के कारण नायिका की कृशता का वर्णन भी बड़े ऊहात्मक ढंग से हुआ है। संस्कृत में एक वर्णन प्राप्त होता है -

"उद्धूयेत तनूलतेति बि सिनीपत्रेण नो वीज्यते स्फोटः
स्यादिति नागंक मलयजक्षोदाम्भसा सिच्यते स्यादिस्या-
तिभरात्पराभव इत्रि त्रासान्नवा पल्लवारोपो वक्षसि
तत्कथं वरतनो राधिः समाधीयताम्।"

(नायिका के शरीर में फफोले न पड़ जाये इसीसे चंदन का लेप नहीं कर सकते, उड़ न जाये इसीसे कमलदल से हवा नहीं कर सकते, दबकर दम न घुट जाये इस भय से वक्षपर कदली दल या कमल पत्र थी नहीं रख सकते, फिर कहो कैसे संताप शांति का उपाय किया जावे?)

बिहारी की नायिका भी इतनी कृश हो गई है कि मौत चश्मा लगाकर भी उसको ढूँढ नहीं पाती-

"करी बिरह ऐसी तऊ, गैल न छाड़त नीचु।
दीनै ऊ चसमा चखनु, चहै लहै न मीचु॥"

इस विरह जन्य कृशता की एक और बानगी –

"उद्धूयेत नतभ्रूः पक्ष्म निपातोद्भवैः पवनैः।
इति निर्मिमेषस्या विरहवयस्या विलोकते वदनम्॥"

सखि विरहिणी नायिका को टकटकी बाँधे देख रही है। पलक नहीं झपकाती कि पलक झपकने से उत्पन्न हवा से कहीं यह कृशांगी उड़ न जाये।

इसी स्थिति का वर्णन ब्रजभाषा में कृष्णकवि करते हैं -

"बरुनी बयार लागै जनि उड़ि जाय शेष
सखी को समाज अनिमेषे रहियतु है।"

महाकवि विल्हण (ई. 1076-1126) विरचित विक्रमाङकदेव चरित में चंद्रलेखा के पूर्वानुराग का वर्णन करता हुआ दूत राजा से कहता है। तुम्हारे वियोग से उसकी शरीरलता इतनी कृश हो गई है कि घर के खंभे से टकराकर लौटे हुए अपने श्वास समीरण से भी वह हिलने लगती है -

"प्राप्त तथा तानवमंगयण्टि स्त्वद्विप्रयोगेण कुरंग दृष्टेः।
धत्रे गृहस्तम्भनिविर्त्रितेन कम्पं यथा श्वास समीरेण॥"

लेकिन महाकवि बिहारी की नायिका तो कृशता में इसको भी मात कर जाती है -

"इत आवति, चली जात उत, चली छ सातक हाथ।
चढ़ि हिंडौरे सी रहै, लगी उसोंसनु साथ॥"

कृश नायिका साँस भीतर खींचती है तो उस धक्के से छ-सात हाथ पीछे चली जाती है, साँस छोड़ती है तो छः सात हाथ आगे चली आती है। इस प्रकार वह दिन भर झूले पर चढ़ी हिंडोले लेती सी लगती है।

इस प्रकार स्पष्ट होता है कि रीतिकालीन हिन्दी काव्य में वियोग श्रृंगार का वर्णन कितना ऊहात्मक हुआ है।

प्रो. डॉ. किशोर गिरडकर
अध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग
अमोलकचंद महाविद्यालय, यवतमाल


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