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ISSN 2292-9754

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09.29.2014


रामभक्ति काव्य : उद्गम और विकास

भारतीय संस्कृति के समष्टिगत रूप का दर्शन हमें जिन विशिष्ट स्थलों पर होता है, उनमें प्रमुख है मर्यादा पुरुषोत्तम राम का चरित। यह चरित्र इतना लोकप्रिय रहा है कि भारत की विभिन्न भाषाओं में ही नहीं, पड़ोसी देशों की जनभाषाओं में एक विशाल साहित्य की रचना हुई है। समय के बहाव के अनुसार कवियों की वैयक्तिक रुचि और समकालीन सामाजिक-सांस्कृतिक आदर्शों के अनुसार भी रामकथा नये-नये साँचों में ढलती रही। इस बहाव में राम महापुरुष से धीरोदात्त नायक और अंतत: अवतारी पुरुष बन गये। हिंदुओं ने उन्हें विष्णु के दशावतारों में प्रतिष्ठित किया। वे साहित्यिक कृतियों के नायक तो बने ही, कालान्तरों में भक्ति-संप्रदायों के उदय होने पर उनके अधिष्ठाता भी बने। सगुण और निर्गुण - दोनों पंथों के भक्त कवियों ने उनकी महिमा का बखान किया। इस समग्र साहित्य और परम्पराओं का विहंगावलोकन करने पर हमें राम के - ऐतिहासिक, साहित्यिक और साम्प्रदायिक - ये तीन रूप उपलब्ध होते हैं।

उद्गम

राम का महत्त्वपूर्ण उल्लेख हमें सर्वप्रथम 'वाल्मीकि रामायण' में मिलता है। रामायण से पूर्व वैदिक साहित्य में भी राम से संबंधित पात्र और स्थान आदि खोज निकाले गये हैं; परन्तु जिन प्रसंगों में ये पात्र या स्थान आये हैं, उनका सम्बंध दाशरथी राम से स्थापित नहीं होता। इस पर विभिन्न मत-मतान्तर होते रहे। लेकिन भिन्न तर्कों और आक्षेपों के बाद भी 'राम' की ऐतिहासिकता अक्षुण्ण बनी रही। "राम के ऐतिहासिक वृत्त का उल्लेख सर्वप्रथम 'वाल्मीकि रामायण' में ही मिलता है। यहाँ राम का विष्णु से कोई सम्बंध नहीं। वे अवतार न होकर केवल मनुष्य, महात्मा और धीरोदात्त नायक हैं।"1 उसके बाद रामचरित्र का वर्णन हमें महाभारत के 'आरण्य', 'द्रोण', 'शांति पर्वों' के अतिरिक्त रामोपाख्यान में मिलता है। पाणिनि की 'अष्टाध्यायी', कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' के अतिरिक्त बौद्ध ग्रंथों में भी कुछ परिवर्तनों के साथ रामकथा दी गई है। पौराणिक साहित्य में हरिवंश पुराण, विष्णु पुराण, भागवत पुराण, स्कंध पुराण, पद्म पुराण में भी रामकथा विषयक प्रचुर सामग्री उपलब्ध होती है। इससे सिद्ध होता है कि पुराण काल (400 ई.-1500ई.) में रामचरित की प्रतिष्ठा बढ़ती गई।

यद्यपि राम को अवतार मानने की तिथि में मतभेद है - कोई उसे 500 ई.पू. तो कोई 1100 ई. मानते है, पर जहाँ तक रामभक्ति के साम्प्रदायिक रूप का प्रश्न है वह आठवीं शताब्दी के पश्चात आरम्भ हुआ और अब तक चला आ रहा है। इस एक हजार वर्षों के इतिहास को विद्वानों ने तीन युगों में विभाजित किया है :

"1) आलवार युग - 800 से 1100 ई.
2) आचार्य युग - 1100 से 1400 ई.
3) रामावत युग - 1400 से वर्तमान तक"2

राम उपासना के इतिहास में रामानंद एक युग प्रवर्तक आचार्य माने जाते हैं।

इनके पूर्व श्री सम्प्रदाय में राम की प्रतिष्ठा होते हुए भी प्रधानता लक्ष्मी-नारायण को ही दी जाती थी, पर रामानंदजी ने राम-सीता को प्रधानता दी। उन्होंने विशिष्टाद्वैत का आधार लेकर नये विचारों का प्रतिपादन किया जो समसामयिक तथा लोकोपयोगी थे। उन्होंने भक्ति को आम लोगों के लिए सुलभ बनाया और संस्कृत की अपेक्षा हिन्दी भाषा को प्रधानता दी।

राम काव्य का विकास

इसी रामानन्दीय परम्परा में गोस्वामी तुलसीदास का आविर्भाव हुआ। यद्यपि तुलसी से पूर्व भी रामभक्त कवि हुए। उनमें से अधिकांश का राम-साहित्य अप्रकाशित और अप्राप्य है। अब तक जो ग्रंथ प्रकाश में आये हैं, उनमें विष्णुदास का वाल्मीकि रामायण का हिन्दी रूपान्तरण तथा ईश्वरदास रचित 'भरत मिलाप' तथा 'अंगद पौज' उल्लेखनीय है। कुछ जैन कवियों ने भी राम-कथा संबंधी रचनायें लिखी है। मुनि लावण्य ने 'रावण मंदोदरी संवाद', ब्रह्म जिनदास ने 'रामचरित या राम रास' और 'हनुमान रास' तथा सुंदरदास ने 'हनुमंत चरित' लिखे।

राम-काव्यधारा के सर्वप्रथम प्रधान कवि तुलसी है। भक्त, कवि, लोकनेता तथा समाजसुधारक सभी दृष्टि से उनका स्थान हिन्दी में अप्रतिम तथा अक्षुण्ण है। उन्होंने अपनी रचनाओं द्वारा रामभक्ति को जीवन और साहित्य दोनों का चिरस्थायी अंग ही बना दिया। रामानंद की तरह उन्होंने भी दास्य भावना का प्रचार किया।

''सेवक सेव्य भाव बिनु भव न तरिय उरगारी''

तुलसी ने राम का लोकमंगलकारी, लोकरक्षक तथा लोकरंजक चित्र प्रस्तुत कर उसमें शक्ति, शील और सौंदर्य की प्रतिष्ठा कर लोगों के हृदय में आनंद और आश्वासन को स्थापित किया। राम के चरित्र का आधार लेकर मानव जीवन की व्यापक तथा सम्पूर्ण समीक्षा की। ''तुलसी ने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों तथा स्थितियों में कर्तव्य भावना का स्वरूप अंकित कर लोक-चेतना का मार्गदर्शन किया, ऐसे आदर्शों की स्थापना की जो अमर तथा अमिट हैं तथा जिन्होंने उस समय भी मुर्झाये हुए हिन्दु हृदयों को लहलहा दिया। उनके राम मानव भी है और ब्रह्म के प्रतीक भी जिनका अवतार 'परित्राणाय साधूनाम् विनाशायच दुष्कृताम्' के लिए होता है।''3

तुलसी का दार्शनिक पक्ष भी अत्यंत पुष्ट है। पर जीवन के सांगोपांग चित्रण के साथ उन्होंने अपने धार्मिक एवं दार्शनिक सिद्धांतों को इस तरह गुंफित कर दिया है कि शुष्क सिद्धांत भी काव्य की वस्तु बन गये हैं। श्रृंगार रस का परिपाक तो उन्होंने ऐसी संयमित शैली में किया है कि रामकाव्य एक लम्बे अरसे तक अपने मर्यादावाद के लिये प्रसिद्ध रहा।

राम भक्ति काव्य के प्रवाह में एक नया मोड़ लाने का श्रेय कवि अग्रदास को है। इन्होंने स्वयं को सीता की सखी मानकर राम की उपासना की। इससे 'सखी संप्रदाय' की स्थापना हुई और राम भक्ति में रसिक भाव का प्रवेश हुआ। (कृष्ण भक्ति शाख में सखी संप्रदाय की स्थापना का श्रेय स्वामी हरिदास को दिया जाता है।) अग्रदास के दो ग्रंथ हैं, 'रामाष्टयाम' तथा 'रामध्यान मंजरी'। इनमें राम की ऐश्वर्यपूर्ण लीलाओं का इस प्रकार चित्रण हुआ है कि उनका राजसी रूप उभर आता है। अग्रदास की यह मधुरोपासना आरम्भ में तो तुलसी के मर्यादावाद के सामने दबी रही, परंतु लगभग सौ वर्षों बाद जिस वेग से यह धारा प्रवाहित हुई उससे मधुर भाव की उपासना में कई संप्रदाय अस्तित्व में आये - जैसे, तत्सखी शाखा, रामायत सखी संप्रदाय, स्वसुखी संप्रदाय आदि। इन संप्रदायों के रामभक्त कवियों में हृदयराम, प्रियादास, कलानिधि, महाराज विश्वनाथ और महाराज रघुराजसिंह विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

रामकाव्य के इस प्रवाह में अगला महत्वपूर्ण नाम है केशव का। 'क्लिष्ट काव्य का प्रेत' माने जाने वाले केशव ने अपनी 'रामचंद्रिका' का आधार वाल्मीकि रामायण तथा अन्य संस्कृत ग्रंथों को बनाया। इसमें कवि का ध्यान कथा की सूत्रबद्धता पर कम और अलंकार कौशल तथा वाग्विलास पर अधिक रहा है। इस कमी के होते हुए भी संवादों और राजदरबार की रीति-नीति के चित्रण की दृष्टि से इसका महत्व है।

द्विवेदी युग में रामभक्ति काव्यधारा ने नूतन और आधुनिक मोड़ लिया। मौथिलीशरण गुप्त और अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध ने राम के वृत्त को अपने युग के परिप्रेक्ष्य में नया और बौद्धिक आयाम दिया। परम्परागत रामकथा के उपेक्षित पात्रों को भी इसमें न्याय मिला। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने बांग्ला में 'काव्येर उपेक्षिता' नामक लेख लिखा था। पंडित महावीरप्रसाद द्विवेदीजी ने छद्म नाम से इसे हिन्दी में प्रकाशित किया। इसीसे प्रेरित होकर गुप्तजी ने 'साकेत' में उर्मिला को केन्द्र बनाकर रामकथा का अवगाहन किया। वाल्मीकि के राम की मानवीयता गुप्तजी के विश्वबंधुत्व से मिलकर एक नवीन दिशा की ओर उन्मुख हुई।

''भव में नव वैभव व्याप्त कराने आया
संदेश यहाँ मैं नहीं स्वर्ग का लाया
इस भूतल पर ही स्वर्ग बसाने आया।''4

उन्होंने उपेक्षिता उर्मिला का गौरवपूर्ण, त्यागमय जीवन अपनी संपूर्ण भवुकता तथा कोमलता के साथ चित्रित किया। कैकेयी को मनोवैज्ञानिक दृष्टि से प्रस्तुत कर उसके मानवीय चरित्र को उद्घाटित किया। राम और सीता के चरित्र को वर्तमान सामाजिक परिवेश के अनुसार ढालकर प्रस्तुत किया। 'साकेत' का प्रबंध कौशल कहीं-कहीं शिथिल होने पर भी उसमें महाकाव्य के सभी गुण विद्यमान हैं। गीतितत्त्व का अभिनव समावेश उसकी चारुता का वर्धन करता है, तो मौलिक उद्भावनायें पाठक के चित्त को चमत्कृत व उल्लसित करती है।

अयोध्याप्रसाद उपाध्याय 'हरिऔध'जी ने 'वैदेही वनवास' में राम को नरत्व प्रदान कर रामचरित की घटनाओं को एक नई दृष्टि से देखने का प्रयास किया। 'प्रियप्रवास' की राधा के समान ही 'वैदेही वनवास' की सीता भी प्रजा की कल्याण कामना की ओर प्रवृत्त है। जिस प्रकार गुप्तजी ने 'उर्मिला', 'यशोधरा' आदि उपेक्षित पात्रों को कथाक्रम के केन्द्र में रखा, उसी प्रकार डॉ. बलदेवप्रसाद मिश्र ने 'साकेत संत' में भरत को काव्य का केन्द्र बनाया व रामकथा का गुम्फन किया।

''धन्य वह संत था कि रामहेतु राम से भी
दूर हट राम के समीप रहा आया है
धन्य वह तार भारती की मंजु बीन का था
जिसके स्वरों ने हमें भारत दिखाया है।''5

भरत के साथ-साथ माण्डवी को आदर्श नारी के रूप में चित्रित कर कवि ने एक अन्य उपेक्षित चरित्र को ­याय प्रदान किया क्योंकि कवि का मत है कि भरत के चरित्र को पूर्णता प्रदान करने का श्रेय माण्डवी को ही है। राम काव्यधारा की श्रृंखला में 'साकेत संत' एक महत्त्वपूर्ण कड़ी की तरह है।

प्रवृत्तियाँ

राम काव्यधारा के उपर्युक्त विहंगावलोकन से इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि इस धारा के कवियों ने तीन दृष्टियों से रामचरित को प्रणित किया -- 1. भक्ति भावना से 2. रसिक भावना से 3. राष्ट्रीय तथा बौद्धिक भावना से।

भक्त कवियों के उपास्य राम विष्णु के अवतार और परम ब्रह्म स्वरूप हैं। इनके राम में शील, शक्ति और सौंदर्य तीनों का समन्वय है। इन कवियों ने राम की उपासना दास्य भाव से की। लेकिन रसिक भाव से राम की उपासना करने वाले कवियों का भाव दास्य न होकर मधुर था। यह मधुरोपासना थी। अत: इन कवियों के राम शील, भक्ति और सौंदर्य में से सौंदर्य के ही अधिष्ठाता अधिक है। उनमें ऐश्वर्य और रूप का प्राधान्य है। राम का यह रूप इन कवियों को उस मर्यादावाद के भीतर नहीं रख सका जो तुलसी ने प्रतिष्ठित किया था। आधुनिक युग में राम का रूप फिर बदला। अब कवि राम के प्रति भक्तिभाव धारण करते हुए भी उन्हें आदर्श मानव के रूप में चित्रित करने की ओर उन्मुख हुए।

समन्वयात्मकता

रामकाव्य में प्रारम्भ से ही समन्वय की वृत्ति दृष्टिगत होती है। इन कवियों ने केवल राम के प्रति ही अपने श्रद्धा सुमन अर्पित नहीं किये हैं, अपितु अन्य देवताओं - कृष्ण, शिव, शक्ति, गणेश आदि की भी स्तुति की है। अपने युग में शिव और विष्णु के अनुयायियों में पारस्परिक संघर्ष देख तुलसी ने शैवों और वैष्णवों में सामंजस्य स्थापित करने के लिये सेतुबंध के अवसर पर राम द्वारा शिव की पूजा करायी और कहलवाया, ''सिव द्रोही मम भगत कहावा। सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा॥''6 और शिव द्वारा राम की प्रशंसा भी करवायी। रसिक सम्प्रदाय में आकर यह उदार दृष्टिकोण लगभग समाप्त हो गया। लेकिन आधुनिक युग में आकर मैथिलीशरण गुप्तजी ने समन्वय और सामंजस्य की भावना पर जोर दिया। उन्होंने एक ओर कर्म का संदेश तो दूसरी ओर निष्काम कर्मयोग की बात कहकर अपनी समन्वय वृत्ति का परिचय दिया। नारी की स्वतंत्रता पर बल देकर उसकी प्राचीन आदर्शवादिता का प्रतिपादन भी उनकी समन्वयवादी दृष्टि को दर्शाता है।

लोकसंग्रह की भावना

तुलसी का आविर्भाव ऐसे युग में हुआ था जिसमें हिन्दुओं की दशा अत्यंत दयनीय थी। अत: कवि कर्म को समझते हुए तुलसी ने राम के रूप में ऐसे लोकनायक की प्रतिष्ठा की जिसके लोकरंजक तथा लोकरक्षक स्वरूप को देख हिन्दुओं के मुरझाये हुए हृदय लहलहा उठे। राम के आदर्श पुत्र, आदर्श भाई, आदर्श पति, आदर्श राजा, आदर्श शिष्य आदि रूपों को प्रस्तुत कर तुलसी ने जीवन की अनेक उच्चातिउच्च भूमियों का अंकन किया। हिन्दू गृहस्थ और शासक प्रेरणा पाते रहे। सार रूप में रामकाव्य का आदर्श पक्ष अत्यंत उच्च है। राजा-प्रजा, पिता-पुत्र, भाई-भाई, स्वामी-सेवक,पड़ोसी-पड़ोसी के सुंदर व स्वस्थ सम्बंधों का दिग्दर्शन कराकर तुलसीदास ने आदर्श समाज का चित्र प्रस्तुत किया।

संदर्भ :

1. डॉ. रामकुमार वर्मा : हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास, पृ.333
2. डॉ. शांतिस्वरूप गुप्त : हिन्दी संत साहित्य की परम्परा, पृ. 132
3. डॉ. रामसागर त्रिपाठी : मध्यकालीन भक्ति साहित्य, पृ. 87
4. मौथिलीशरण गुप्त : साकेत, पृ.138
5. डॉ.बलदेवप्रसाद मिश्र : साकेत संत, पृ. 56
6. गोस्वामी तुलसीदास : रामचरित मानस, लंकाकांड पृ.758

प्रो. किशोर गिरडकर
अध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग
अमोलकचंद महाविद्यालय, यवतमाल



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