अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
09.07.2014


रामदरश मिश्र की कहानियों में नारी मुक्ति

सम्पादक: सुमन कुमार घई
तिथि: ८ सितम्बर, २०१४

शोध संक्षेप

भारतीय समाज में नारी सदैव अपने अधिकारों से वंचित और उपेक्षित रही है क्योंकि हिंदू समाज पितृसत्तात्मक समाज का प्रभुत्व रहा है। रामदरश मिश्र ने महिलाओं की वेदना और चीख को अपनी कहानियों के द्वारा आवाज़ प्रदान की है। मिश्र ने नर-नारी के संबधों को ही नहीं बल्कि नारी के जीवन से जुड़ी सभी समस्याओं को अपनी कहानियों में प्रस्तुत किया है। मिश्र ने अपनी कहानियों के माध्यम से नारी की स्वतन्त्रता तथा उसके अधिकारों की बात की है।

किसी भी समाज के सुसंस्कृत होने की पहचान नारी से होती है। जब-जब नारी का गौरवमय स्थान अपनी महत्ता छोडने लगा है, तब-तब नारी ने उस महत्ता को प्राप्त करने के लिए संघर्ष किया है, यही संघर्ष नारी मुक्ति का रूप ले लेता है। यहाँ नारी मुक्ति से हमारा अभिप्राय पुरुष के विरुद्ध संघर्ष का बिगुल बजाना है, न कि घर गृहस्थी की दीवारों में दरारें डालना, बल्कि नारी को उसका सम्मानित दर्जा दिलाना है। नारी को छः गुणों से युक्त माना गया है।

काव्येषु मंत्री, कर्मेषु दासीं
भोज्येषु माता, रमणेषु रम्भा
धर्मानुकूला क्षमया धरित्री
भार्य्या चा षड्गुण्यवती च दुर्लभा। (1)

अर्थात एक पत्नी प्रत्येक कार्य में मंत्री के समान सलाह देने वाली, सेवादि में दासी के समान काम करने वाली, भोजन कराने में माता के समान, शयन के समय रम्भा के समान सुख देने वाली, धर्म के अनुकूल तथा क्षमा जैसे गुणों को धारण करने में पृथ्वी के समान छः गुणों से युक्त स्त्री होती है।

स्त्रियों में मात्र गुण ही होता है, अवगुण नहीं ऐसा नहीं है। गोस्वामी तुलसीदास के अनुसार उनमें आठ अवगुण भी हैं- साहस, झूठ, चचंलता, माया, भय, छल, अविवेक, निर्दयता

नारी सुभाउ सत्य सब कहहीं
अवगुन आठ सदा उर रहहीं।
साहस अनृत चपलता माया
भय अविवेक असौच अदाया।। (2)

किन्तु पुरुषों ने नारी के इन गुणों को न समझते हुए नारी को इन्हीं गुणों में रत होना उसके भाग्य को माना है। पुरुषों ने नारी के तो गुण तथा अवगुण निर्धारित करके उसे गुलामी की सीमाओं में बाँध दिया लेकिन कभी भी अपने गुण तथा अवगुणों को निर्धारित नहीं किया। स्त्री के लिए बनाए गए अधिनियमों एवं कानून का पालन तभी ठीक ढंग से हो सकता है, यदि उन्हें पुरुषों के बराबर सम्मान मिले। समाज को सँवारने में नारी के योगदान को पुरुष द्वारा महत्व मिलना चाहिए। नारी के सामाजिक रूप का वर्णन डॉ. श्याम सुन्दर व्यास इस प्रकार दर्शाते हैं-

"यदि परिवार समाज का केन्द्र बिन्दु है, तो नारी इस बिन्दु का विस्तार है। अतः परिवार के अर्न्तगत उसकी स्थिति एवं विकास को समझने के लिए हमें उसके माता, पत्नी के स्वरूप को समझना होगा तथा कानून के अन्तर्गत उसकी सामाजिक स्थिति पर विचार करना होगा। क्योंकि परिवार प्रदत्त अधिकार ही उसकी सामाजिक स्थिति के परिचायक है।"3 यदि नारी की वास्तविक स्थिति को समझा जाए तो नारी को आधुनिक काल में सभी अधिकार प्राप्त हैं, उसे कमाने का अधिकार है परन्तु उस कमाई पर खर्च करने का अधिकार नहीं है। यदि उसे अपनी मर्जी से कुछ खर्च करना है तो उसे अपने पति की इज़ाज़त लेकर खर्च करना है। परिवार में बच्चे पैदा करने से लेकर पालन-पोषण की ज़िम्मेदारी स्त्री की है, लेकिन बच्चे की पढ़ाई तथा उसके शादी ब्याह जैसे निर्णय लेने का अधिकार नहीं है। इस प्रकार नारी दोहरे दर्जे की ज़िंदगी व्यतीत करती है।

कवि, कहानीकार, उपन्यास लेखक समीक्षक और निबन्ध लेखक, उदत्त उदार और स्नेहशील स्वभाव वाले रामदरश मिश्र जी का नाम हिन्दी साहित्य में बड़े ही सम्मान के साथ जाना जाता है। इनका कहानी लेखन 1960 के बाद शुरू होता है। छठे दशक में जब ’नई कहानी’ का ज़ोर-शोर था, तब मिश्र जी ने नर-नारी के संबधों को ही नहीं बल्कि नारी के जीवन से जुड़ी समस्याओं को अपनी कहानियों में प्रस्तुत किया। मिश्र जी नें अपनी कहानियों के माध्यम से नारी की स्वतन्त्रता तथा उसके अधिकारों की बात की है। मिश्र जी का कहानी लेखन 1960के बाद शुरू होता है।

अधिकांशतः कहानियों में लेखकों की दृष्टि में नारी शोषण, उत्पीड़न, दलहन, कुचलन तथा पराधीनता की पात्र रही है। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि उसे सचेत एवं जागृत होने का अवसर कम कहानियों में मिला है, किन्तु मिश्र जी की कहानियों में नारी के विभिन्न जीवंत रूप दृष्टिगत होते हैं। मिश्र जी नारी को करुणा की देवी समझते हैं, परन्तु समय व परिस्थितिवश समाज के अत्याचारों को सहन न करने के लिए प्रेरणा का भाव भी दर्शाते हैं। ’अकेला मन’, एक अधूरी कहानी, दिन के साथ कहानियों से स्पष्ट है, कि इनके केन्द्र में नारी चरित्र है- ’अभिशप्त और उत्पीड़ित नारी चरित्र’। ’सर्पदंश’, ’लड़की’, ’मुक्ति’, ’बसंत का दिन’, ’बदलिया’, ’एक अधूरी कहानी’, ’अकेला मकान’, ’लाल हथेलियाँ’, ’एक भटकी हुई मुलाकात’, ’पराया शहर’, ’एक रात पशुओं के बीच’, ’एक औरत एक ज़िंदगी’, ’आखिरी चिट्ठी’, ’अपने लिए’, ’वह औरत’, सीमा, मिश्र जी द्वारा रचित वे कहानियाँ हैं, जो नारी की नियति पर गम्भीरता पूर्वक विचार करती हैं। मिश्र जी ने नारी जीवन के दर्द को बहुत गहराई से उभारा है।

’एक अधूरी कहानी’ की प्रमुख पात्र सुहागी को ’भउजी’ के नाम से जाना जाता है। भउजी के पति नारायण भईया तथा उनके बड़े भाई केदार दोनों सिंगापुर में नौकरी करते थे। जब-जब केदार भईया वापिस आते हैं, तब उनकी पत्नी मर जाती है। भउजी को अपने पति की याद सताने लगती है। धीरे-धीरे घर में गरीबी पैर पसारने लगती है। वह अपने ही घर में आने वाले सुन्दर को, जो उसके पति का दोस्त था, उसके साथ भाग कर चली जाती है। वहाँ सुन्दर का दोस्त कलपू उसकी इज़्ज़त लूटना चाहता है, तो भउजी उसकी हत्या कर देती है, तथा जेल की स्ज़ा काटकर ज़िदंगी भर संघर्ष करती है।
’आखिरी चिट्ठी’ में पारिवारिक रिश्तों के खोखलेपन तथा उससे उपजे नारी जीवन के त्रासदी का विश्लेषण दर्शित होता है। कहानी की प्रमुख पात्रा प्रभा के पिता पुलिस में नौकरी करते हैं, लेकिन डाकुओं के गिरोह का मुकाबला करते-करते वीरगति को प्राप्त करते हैं। बाद में वह अपने भाईयों से तिरस्कार तथा ससुराल में पति की उपेक्षा की शिकार प्रभा अपनी बेटी को छोड़कर जीवन से हार मान लेती है, तथा अपनी बातों को विनोद भैय्या (वक्ता) के सामने चिट्ठी के रूप में कहती जाती है।

’सीमा’ कहानी की नायिका पैरों से विकलांग होती हुई, अपनी माँ तथा समाज में हास्य का पात्र बनती हुई अपना जीवन बिताती है। मिस कुमुद कहती है, "क्यों हॅंसती है रे लंगड़ी? मैं सब समझती हूँ कमबख्त सीढ़ी के पास बैठी सबका चलना पहनना निहारा करती है। वह चाहती है, सभी लोग लंगड़े होकर बैठ जाएँ।" लेकिन सीमा लोगों के ताने सुनकर भी विरोध नहीं करती बल्कि साहस व धैर्य से उस अपंगता को नकार कर जीवन को खुशहाल बनाती है।

"लाल हथेलियाँ" कहानी में, सुभाष सुंदरता की चाह में अपनी पत्नी से विरक्त हो जाता है तथा ज्योत्सना मेहता, जो एक पैसे वाले की बेटी है, उससे प्यार कर बैठता है। जब ज्योत्सना तथा सुभाष के आपसी प्यार का पता चलता है, तो वह दिल का दौरा पड़ने से स्वर्ग सिधार जाती है। सुभाष ज्योत्सना से शादी कर लेता है, लेकिन ज्योत्सना से संबंध बनाकर लाल हथेलियों व खुरदरी हथेली वाली ममता में अन्तर समझ पाता है कि खुरदरी हथेलियाँ लाल हथेलियों से कहीं अधिक अपनापन उड़ेल सकती हैं। इस कहानी में स्वार्थ संकुल पुरुष की मानसिकता को दर्शाया गया है।

जिस तरह सामान्य जन की पक्षधरता का विषय मिश्र जी की कहानियों में बराबर मिलता है, उसी तरह नारी के उत्पीड़न के प्रति वे बराबर क्षुब्ध और क्रुद्ध दिखाई देते हैं। अनेक दावों तथा सुधारों के बावजूद भी नारी की स्थिति आज दयनीय है। ’बेला’, मर गई, प्रतीक्षा, एक औरत एक ज़िदंगी, मुक्ति, एक अधूरी कहानी, अतीत का विष, आखिरी चिट्ठी, अकेला मकान और लड़की जैसी कहानियाँ नारी से जुड़े अनमेल विवाह, देह व्यापार, श्रम की विवशता, देहभोग की लालसा आदि समस्याओं को दर्शाती हैं।

’मुक्ति’ कहानी में जवान बेटियाँ स्वार्थी पिता के उस कारागार के मुक्त होने के लिए फड़फड़ाती है। यह मिश्र जी की सबसे बड़ी विशेषता और कलात्मकता है जो सामाजिक मूल्यों को गति प्रदान करती है। आज नारी के मन में अनेक प्रश्न उठते हैं, क्या नारी का धर्म अधिकारी पुरुष अधिकृत पत्नी बनकर रहना है? क्या सारे नियम बंधन स्त्री के लिए है? पुरुष परम स्वतन्त्र है? क्या सारे समाज में पुरुष के अनाचार को अनदेखा किया जाता है? क्या नारी को ही सब कुछ सहन करना होता है? मिश्र जी ने इस कटु यथार्थ को स्वीकार किया है, क्योंकिः-

विशैलः कामदृर्तो व गुणर्वा परिवार्जितः
उपचर्यः स्त्रियासाध्क्या सतत देववत् पतिः (4)

अर्थात पति चाहे शीलरहित हो, कामपूर्ण हो या अवगुण युक्त हो-कैसा भी क्यों न हो, स्त्री के द्वारा उसकी सेवा सदा देवता तुल्य होनी चाहिए।

मिश्र जी की कहानियों का संसार प्रमुख रूप से सामाजिक यथार्थ से जुड़ा हुआ है, किन्तु यथार्थ के विभिन्न आयाम होने के कारण मुख्य रूप से आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र ही महत्वपूर्ण है। नारी एक नदी के समान है, जो निरन्तर बाधाओं के आने पर भी बहती रहती है, तथा कभी मंद नहीं पड़ती है। इन्हीं गुणों के कारण नारी समाज में अपने अस्तित्व को मज़बूती प्रदान करती है। ’एक भटकी हुई मुलाकात’ कहानी में पति-पत्नी के तलाक़ जैसी समस्या को उजागर किया है। यह कहानी एक माँ के संघर्ष की कहानी है, जो अपने बच्चे को प्राप्त करने के लिए अथक प्रयास करती है तथा अपने पति से अलग होकर बच्चे की परवरिश की ज़िम्मेदारी ख़ुद उठाना चाहती है।

मिश्र जी ने अपनी आत्मकथा में - नारी यातना की अनुभूति ने मुझे कुछ ऐसा झकझोरा था, कि बेटी की विदाई का गीत सुनते-सुनते मैं रोने लगा था।(5)

डॉ. रामदेव शुक्ल ने लिखा है- रामदरश मिश्र की कथा-विरासत इतनी समृद्ध है, कि उसमें न तो कथानक का अभाव है, न यथार्थ के प्रति अलग से किसी समझदारी के विकास की आवश्यकता है। वह जन-चेतना का अक्षय प्रवाह है, जिसमें अयथार्थ अपने आप बाहर फेंक दिया जाता है।(6) यही एक रचनाकार की उपलब्धि है।

मिश्र जी ने अपनी कहानियों के माध्यम से तत्कालीन सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था की ओर दृष्टि डाली है। उनकी अच्छाईयों ओर बुराईयों की ओर ध्यान आकर्षित किया है। इन्होंने कहानियों में समाज के यथार्थ रूप का वर्णन किया है। मिश्र जी मानते हैं कि परिवार से ही समाज़ बनता है। समाज़ में हर समय कुछ न कुछ परिवर्तन होते ही रहते हैं, जिसके फलस्वरूप उसके व्यक्तित्व, सम्बन्ध तथा सामाजिक स्थिति में बहुत से दोष पनपने लगते हैं। मिश्र जी ने अपने जीवन में आए व्यक्तियों के प्रसंगों के माध्यम से इस परिवर्तन को सजीवता से शब्दबद्ध किया है। इन्होंने मनुष्य के मन में आए विकारों के साथ-साथ दूषित समाज व्यवस्था में विशेषकर नारी के साथ होने वाले भेदभाव को प्रस्तुत किया है।

मिश्र जी की कहानियों में स्त्री चरित्रों के मुख्यतः दो रूप देखने में आते है जिनमें पहला रूप उन स्त्री चरित्रों को है जो हमारे अतीत के गौरव समान आदर्शो, धर्म संस्कृति, परमपराओं और रीति रिवाजों की मान्यताओं को लेकर चलती है और दूसरा रूप वे है जो इन सब का विरोध करती है। मिश्र जी की चेतना तथा यथार्थ की दृष्टि इतनी पैनी है कि स्वानुभूति से मानव जीवन में व्याप्त मूल्यों की परानुभूति होती है इसलिए मिश्र जी ने अपनी कहानियों के माध्यम से सामाजिक मूल्यों को अंकित किया है। इन्होंने नारी पात्र चाहे वह शहरी हैं या फिर ग्रामीण दोनों की ही संवेदना को उजागर किया है अतः पात्रों के चरित्र से कथावस्तु का प्रारम्भ, विकास और अंत होता है। इसलिए चरित्र कहानी का संजीव संचालक बनकर कहानी में स्वैच्छिक गति से रमता चला जाता है।

इस प्रकार स्त्रियों की वेदना ही नारी मुक्ति की जन्मदात्री है। यह वेदना पूरे समाज की स्त्रियों की वेदना है। ज़रूरत है समाज़ को बदलने की जो स्त्रियों की इस वेदना को समझ सके। मिश्र जी ने इसी वेदना को अपनी कहानियों में उकेरा है, जिन्हें पढ़कर स्त्रियों की इस वेदना को समझा जाए तथा उन्हें पुरुषों के समान भागीदारी दी जा सके।

सन्दर्भ सूची

1. स्त्री विमर्श - विनय कुमार, पाठक, भावना प्रकाशन, दिल्ली -110091, प्रथम सं. - 2005, पृष्ठ संख्या 06
2. रामचरितमानस (लंकाकांड) - गोस्वामी तुलसीदास, गीता प्रेस, गोरखपुर, सं. 14वाँ, संवत् - 2022, पृष्ठ संख्या 753
3. हिन्दी महाकाव्यों में नारी चित्रण - डॉ. श्याम सुन्दर व्यास, सत्यम प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ - 51
4. सेवा समर्पण - नारी विशेषांक, सम्पादन - जुगल किशोर शर्मा, सेवाकुंज, नई दिल्ली - संस्करण अप्रैल-2004, पृष्ठ -78
5. सहचर है समय - डॉ. रामदरश मिश्र, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 1975, पृष्ठ 85
6. रचनाकार रामदरश मिश्र - डॉ. नित्यानन्द तिवारी एवं डॉ. ज्ञानचन्द गुप्त, राधा प्रकाशन नई दिल्ली, संस्करण 199., पृष्ठ 15.

कीर्ति भारद्वाज,
शोधार्थी,
हिन्दी विभाग,
गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय,
ग्रेटर नोएडा, उत्तर प्रदेश मोबाइल न. 9650605931
kirti.kittu@gmail.com


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें