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ISSN 2292-9754

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03.23.2015


आधी आबादी का संघर्ष

पुस्तक : आधी आबादी का संघर्ष
लेखक : ममता जैतली तथा श्री प्रकाश शर्मा
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन ई-बी नेताजी सुभाष मार्ग
नई दिल्ली -११०००२
पहला संस्करण 2006
मूल्य : ४००रु.

 यह पुस्तक राजस्थान के महिला आंदोलन के दस्तावेज़ीकरण का एक विनम्र प्रयास है। राजस्थान के महिला आंदोलन को लिखित रूप देकर इतिहास के तौर पर जो जगह ममता जैतली तथा श्री प्रकाश शर्मा ने दिलाई है, वह भविष्य में शोध कार्य करने वालों के लिए उपयोगी एवं सार्थक सिद्ध होगी। राजस्थान में सामंतशाही परिवेश के बावजूद तथा सम्भवतः इसी कारण एक सशक्त महिला आंदोलन बना। यह पुस्तक राजस्थान की महिला आंदोलन की कुछ झलकियाँ ही दिखाती है। इस पुस्तक में ७ अध्याय हैं जिन्हें ४ भागों में विभाजित किया गया है।

पहला अध्याय 'आजादी से पहले औरतों की स्थिति' में राजस्थान की महिलाओं की स्थिति को वर्णित किया गया है। राजस्थान की महिलाओं की जकड़न और सीमाओं की बात करें तो सबसे पहले हमें मीरा बाई के अभूतपूर्व संघर्ष के बारे में पता चलता है। राजस्थान के देशी राज्यों में संघर्ष और स्वाभिमान की परम्परा के कारण मेवाड़ का विशिष्ठ स्थान था। १५-१६वीं शताब्दी के राजपूत राजाओं के रनिवासों में न केवल पर्दा प्रथा ही प्रचलित थी बल्कि कई अन्य प्रकार के बंधन और वर्जनाओं के कारण नारियों का जीवन जकड़ा हुआ था। ऐसे में मीराबाई ने राजस्थान के सामंतशाही माहौल में अपने लिए एक सम्माननीय जगह बना ली। वह पर्दे की घुटन से बाहर आई। सूक्ष्मता के साथ यदि देखा जाये तो वास्तविक अर्थों में नारी चेतना की भावभूमि १९वीं सदी के पूर्वार्ध में बनने लगी थी। ज़ाहिर है सदियों से पिछड़ेपन की शिकार महिलाओं में एक घुटन का अहसास तो हो ही रहा था।

ऐसे में अंग्रेज़ शासकों ने शिक्षा रूपी हथियार के द्वारा राजमाताओं और पटरानियों के अस्तित्व पर चोट पहुँचाई छोटी उम्र की कन्याओं का विवाह हो रहा था। यदि पति मर जाये तो पत्नी को उसी के साथ सती होना पड़ता था। स्वामी दयानंद ने समाज में स्त्री की स्थिति पर विशेष ध्यान दिया तथा विवाह संबंधी अधिनियम पारित किए गए हैं।

दूसरा अध्याय ‘आजादी के आंदोलन में औरतों का संघर्ष’ अध्याय में महिलाएँ घरों से आज़ादी के लिए निकलीं परन्तु धनिक वर्ग, व्यापारी वर्ग, बाहर से आए व्यापारियों की पत्नियाँ, आम शहरी मध्यम वर्ग से लेकर ग्रामीण अंचलों और आदिवासी माहौल से भी निकल कर आईं थी। ये शिक्षित भी थीं, अर्ध साक्षर या निरक्षर भी। कोटा की सुशीला दीक्षित ने १३ वर्ष की उम्र में सार्वजनिक मंच से सरफ़रोशी की तमन्ना गीत गाया। साथ ही शिक्षा और सुधार कार्यक्रमों से नारी जागृति हुई। जब महिलाएँ जेल जातीं तो उस दुर्गन्ध युक्त वातावरण का वर्णन किया है। जब सत्याग्रह की शुरूआत हुई तभी एक विशेष पंचायत बुलाई गई, उस पंचायत में किस तरह पितृसत्तात्मक समाज की चौपाल से नारी जागृति का बिगुल बजा, उसकी विस्तृत जानकारी दी गई है।

तीसरा अध्याय 'आजादी के पश्चात औरतों की स्थिति' सन १९४५ से लेकर २००१ तक की महिलाओं की स्थिति, लिंग अनुपात, साक्षरता दर, महिलाओं की मृत्यु के कारण, यौन अपराध, वेश्यावृति आदि को आँकड़ों के माध्यम से प्रदर्शित किया है। इसके साथ ही राष्ट्रीय महिला आयोग का समर्थन, महिला विकास कार्यक्रम का सांगठनिक ढांचा, उद्देश्य और महिला विकास कार्यक्रम के समाज पर पड़ने वाले प्रभाव को अंकित किया है।

चौथा अध्याय 'आजादी पश्चात महिला आंदोलन के मुख्य पड़ाव' के अंतर्गत राजस्थान में महिला आंदोलन को लिपिबद्ध करने के प्रयास में इस आंदोलन की जड़ों को खोजने का प्रयास किया गया है। जो महिलाओं ने अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ष से ही इस आंदोलन की शुरूआत मानी थी। सन् १९६० के अंत तक जयपुर में नारी चेतना संगठन की शुरूआत राजस्थान विश्वविद्यालय में प्रौढ़ शिक्षा विभाग की निदेशक चन्द्रकान्ता डांडिया द्वारा की गई। महिला कल्याण कार्यों के लिए स्वैच्छिक संस्थाओं के स्तर पर इन कई प्रयास किए गए। इन संस्थाओं के प्रयासों के परिणामस्वरूप जो नई दिशाएँ उभरकर सामने आईं उनका बखूबी विवरण दिया गया है।

पाँचवा अध्याय 'न्यूनतम मजदूरी के लिए संघर्ष' इस अध्याय में महिलाओं के आर्थिक शोषण के संघर्षों को दिखलाया गया है। ग्रामीण मजदूर महिलाओं के साथ उनके वेतन को लेकर हमेशा से ही भेदभाव किया गया है। ठीक इसी आर्थिक भेदभाव को दूर करने के लिया अदालत में महिलाओं ने जनहित याचिकाएँ डालीं। राजस्थान में सन् १९६४ के नियम के तहत जो फैसला लिया गया उसमें महिलाओं की आर्थिक असमानता तथा उनके साथ होने वाले भेदभाव को कैसे दूर किया जाए, इन सबका विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है।

छठा अध्याय 'महिला हिंसा के खिलाफ आंदोलन' के अंतर्गत अध्याय में घरेलू हिंसा विरोधी अभियान चलाया गया। जयपुर में रूवा जिले का सबसे पहला केस था आशा रानी हत्याकांड, यह दहेज हत्या का केस था। आशारानी की मौत का बदला लेने के लिए जयपुर की सड़कों पर पहला प्रदर्शन था। इस अध्याय में महिला सहायक समितियाँ, जो पारिवारिक स्तर पर गठित की गई हैं, विधवा दहन विरोधी अभियान, सती विरोधी सभा, सती मेलों के आयोजनों पर रोक, यौन हिंसा विरोधी अभियान की विस्तृत रूप से व्याख्या की है।

ममता जैतली तथा श्री प्रकाश के द्वारा बड़े ही विस्तृत रूप से राजस्थान जैसे पिछड़े राज्य की महिलाओं की स्थिति का वर्णन किया है। प्राचीन परम्परा से लेकर वर्तमान समाज में स्थापित हुए कानून, स्वयंसेवी संस्थाओं को बतलाकर पाठकों को उनकी सुरक्षा, अस्तित्व का अहसास दिलाया है। जिनकी जानकारी उन महिलाओं को नहीं थी। उन्हें जागरूक करने का भरपूर प्रयास किया गया है वह अत्यंत सराहनीय है।

कीर्ति भारद्वाज (शोध-छात्रा)
गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय
ग्रेटर नॉएडा


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