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ISSN 2292-9754

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01.23.2019


स्वप्न तट

मुझे एक क़ैदी में तब्दील कर
वो भागता है हर बार
नये नये स्वप्न तट की तरफ़

ये देख दरिया हँसता है
और रोती है दीवारें
बिछड़े हुए दोस्त की तरह
लग कर गले,

मेरे भीतर उसकी मौजूदगी
ढलता सूरज है
उगा भी तो
इस क़दर तपा देगा
की हो जाऊँगी पत्थर
सुना है होते हैं
सख़्त पत्थर के इरादे


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