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ISSN 2292-9754

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01.23.2019


न्याय की आस्था

उसकी पीठ पर बैंजनी फूल बँधे थे
और हाथ में सपने
अभी अभी उगे पंख
उसने क़रीने से सजा रखे थे
कुछ जुगनू उसके होंठों पर चिपके थे
कुछ हँसी बन आसमान में

वो एक सर्द रात थी
जब हम नक्षत्रों के नीचे चल रहे थे
और चाँद मेरे साथ

हिम खंड के पिघलने तक
मैं उसका साथ चाहता था
उसे भी इंतज़ार था सुनहरी धूप का

मैं भरना चाहता था
वो समेटना

इसलिए हमने एकांत का
इंतज़ार किया
उसकी हँसी एकांत को भर रही थी
मैं डूब रहा था

तभी एकांत के अँधेरों में छिपे भेड़ियों ने
उसकी हँसी को भेदना शुरू कर दिया

मैं अकेला, उनके साथ उनकी हैवानियत
हैवानियत से मेरी नियत हार गई
और हँसी भी

क्षत विक्षित हँसी अब झाड़ियों में पड़ी थी
और मैं न्याय में
न्याय उलझा था किसी नियम से

मैं आज भी अँधेरी रात के डर को
मुट्ठी भर राख और
चुल्लू भर आँसू में मिला कर
न्याय की आस्थाएँ ढूँढ़ रहा हूँ


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