अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
01.23.2019


कथा- कोहरे की

हर बार बाँची जाती है
कोहरे की रति गाथा

जिसमें होती है
महर्षि पराशर और काली की कहानी

जिसे सुनकर
प्रेम बन के कोहरा
लिपटता है आगोश में

नर्म कोहरे में खोते
ख़ुद से ख़ुद को जोड़ते
धुँध में धुआँ धुआँ होते
अपने में जलते बुझते
रचते हैं प्रेमी प्रेम कहानी

लेकिन इससे इतर है
एक और कहानी

कोहरे की एक गाथा को
बाँचता है मज़दूर

सुलगती पेट की आग में
ख़ुद को उसके ताप में
असल अंधकार में
कोहरे के प्रताप में

ओढ़ निकल पड़ता है
चादर कोहरे की
जमाता पाँव पर थरथराता है
इससे पहले मौत सोख ले प्राण
भागता है पकड़ लेता है
कोहरे के पाँव

अब मत कहना दुष्यंत
आसमान में कोहरा घना है
ये उनकी व्यक्तिगत आलोचना है।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें