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05.14.2014


भारत के पारंपरिक नाट्य रूपों में नृत्य एवं संगीत

भारत में नृत्य तथा संगीत का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। नाट्य के आदि ग्रन्थ नाट्यशास्त्र में नृत्य संबंधी मुद्राओं, चारियों का वर्णन भारत में नृत्य के मूल सूत्र के रूप में मौजूद है। पुरातात्विक स्रोतों एवं साहित्यिक स्रोतों से भारत में नृत्य की अत्यंत समृद्ध परंपरा हमारे समक्ष प्रस्तुत होती है। पुरातात्विक स्रोतों के अंर्तगत गुहा चित्रकला, मूर्तिकला में नृत्य के साक्ष्य प्राप्त होते हैं, जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि हमारी भारतीय नृत्य कला कितनी प्राचीन है। नृत्य के साहित्यिक स्रोतों की बात करें तो भरत के ‘नाट्यशास्त्र’ तथा आचार्य नंदिकेश्वर के ‘अभिनयदर्पण’ नृत्य के आदि ग्रन्थ के रूप में हमें प्राप्त होते हैं। प्राचीन तमिल साहित्य ‘तोल्काप्पियम’ तथा ‘शिल्पाधिकारम’ ने तमिलनाडु में नृत्य तथा संगीत के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। ‘शिल्पाधिकारम’ की नायिका ‘माधवी’ अत्यंत निपुण नर्तकी है।

नृत्य की परम्परा युग-युग से चली आ रही है। नृत्य की परम्परा ने नृत्य शैली के अनेक रूपों को जन्म दिया है। नृत्यों के मूल और शुद्ध रूप हज़ारों वर्षों के गुज़र जाने के बाद भी सुरक्षित हैं और ये हमारी वर्तमान संस्कृति के अंग हैं। पहले नृत्य सिर्फ मन की भावना को व्यक्त करने के लिए किया जाता था, या ईश्वर की आराधना में, यह अनुमान करना कठिन है। मोहनजोदड़ों के अवशेष से एक कांस्य प्रतिमा में नृत्य करती बाला प्रकट हुई है। प्राचीन शैल-चित्रों में नृत्य करती मानवाकृतियाँ चित्रित हैं।

पहली शताब्दी में भरत का नाट्य शास्त्र लिखा गया जो संगीत और नृत्य के सिद्धांतों पर आधारित ग्रंथ है, जिसमें नृत्य के विधान का सूक्ष्म से सूक्ष्म विश्लेषण अैर सैद्धांतिक वर्णन किया गया है। यह ग्रंथ यह सिद्ध करता है कि इसकी रचना से पहले नृत्य अपनी श्रेष्ठता और कलात्मक ऊँचाई को प्राप्त कर चुका था।

भारतवर्ष भर के मंदिरों, स्तूपों और गुफाओं में बने चित्र, खुदी हुई मूर्तियाँ प्राचीन काल में नृत्य के विकास का साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। सांची और भरहुत के द्वारों पर बनी अप्सराएँ, बाघ, अजंता, और एलोरा की दीवारों पर बने चित्रों की रूपसियाँ, चिदम्बरम्, खजुराहो और कोणार्क के मंदिरों में उत्कीर्ण नायिकाएँ तथा हेलविड तथा बेलूर के मंदिरों की दीवारों पर बनी नृत्य करती आकृतियाँ नृत्य शैली का प्राचीन रूप सिद्ध करती है| इन आकृतियों को देखकर नृत्य की भाव भंगिमाओं का बारीकी से अध्ययन किया जा सकता है|

लोक दृष्टि से शिव की नटराज की मूर्ति शास्त्रीय नृत्य का प्रतीक है, जिसमें नृत्य के हाव-भाव एवं मुद्राओं का समावेश है। शिव के सहस्र नामों में एक नाम नटराज है। शिव प्रदोष स्तोत्र में शिव के नृत्य का विस्तृत विवरण है। शिव का ताण्डव नृत्य सर्वज्ञात है। उनका नादान्त नृत्य भी प्रसिद्ध है। चिदम्बरम् में शिव के नृत्य के आधार पर दक्षिण भारतीय ताम्र नटराज मूर्तियाँ बनी हैं। यह नृत्य उनके पाँच नृत्यों का प्रतीक है। शिव का नृत्य ब्रह्माण्ड में सम्पूर्ण संचलन की लयात्मकता को प्रकट करता है।

शास्त्रीय नृत्य मूल रूप से शास्त्रीय पद्धति पर आधारित है, अर्थात जो शास्त्रों से लिए गए हैं। शास्त्रीय रूप से नृत्य की निष्पत्ति नृत्त धातु से हुई है। शास्त्रीय नृत्यों का उल्लेख हमें भरत द्वारा लिखित ‘नाट्यशास्त्र’ एवं आचार्य नंदिकेश्वर के ‘अभिनयदर्पण’ में प्राप्त होता है।

आचार्य धनंजय ने दशकरुपक(1/9) में नृत्य को परिभाषित करते हुए लिखा है कि “नृत्य भावों पर आश्रित होता है- ‘भावाश्रयं नृत्य’।”

अभिनय दर्पण (श्लोक 16) के अनुसार नृत्य रस, भाव तथा व्यंजना का प्रदर्शित रूप है। इस नृत्य का आयोजन सभा और राजदरबार में किया जाना चाहिए।

“रस भावव्यंजनादियुक्तम नृत्यमितीर्यते।
एतन्नृत्यं महाराज सभायां कल्पयेत सदा॥”

नाट्यशास्त्र में वर्णित मुद्राएँ भारतीय शास्त्रीय नृत्य की भाव- भंगिमाओं का मूल आधार है। भारतीय नृत्य परम्परा में शास्त्रीय नृत्य की चार प्रमुख शैलियाँ रही हैं, भरतनाट्यम्, कथकली, कथक और मणिपुरी । कुचिपुंडी और ओडिसी को शास्त्रीय नृत्य की मान्यता बाद में मिली। कोई बीस साल पहले मोहिनी अट्टम को शास्त्रीय नृत्य शैली के रूप में स्वीकृत किया गया है. भारत में प्रचलित शास्त्रीय नृत्य इस प्रकार है -
1. कत्थक (उत्तर भारत)
2. भरतनाट्यम (तमिलनाडु)
3. ओड़िसी (उड़ीसा)
4. कुचिपुड़ी (आन्ध्र प्रदेश)
5. मोहिनीअट्टम (केरल)
6. कथकली (केरल)
7. मणिपुरी (मणिपुर)
8. सत्रिय (असम)

कत्थक

कथक का जन्‍म उत्तर में हुआ। इस नृत्य शैली में पद ताल और तेजी से चक्‍कर लेने की प्रथा है जो इसमें प्रभावी स्‍थान रखती है, जो इस शैली की सबसे अधिक महत्‍वपूर्ण विशेषता है। इस नृत्य शैली में हस्‍त मुद्राओं तथा पद ताल पर अधिक ध्यान दिया जाता है, जो नृत्य को प्रभावी बनाता है।

भरतनाट्यम

भरतनाट्यम दक्षिण भारत के तमिलनाडु का प्रसिद्द नृत्य रूप है। प्राचीन काल में यह नृत्य दासीअट्टम के नाम से प्रचलित था क्योंकि यह मंदिरों में देवदासियों द्वारा प्रस्तुत किया जाता था, जिनका काम अपने जीवन को पूर्ण रूप से इश्वर की अराधना में समर्पित करना होता था. भरतनाट्यम भाव भंगिमाओं, मुद्राओं तथा चारियों पर आधारित भारत की प्रमुख शास्त्रीय नृत्य शैली है।

ओड़िसी

यह उड़ीसा की प्रचलित नृत्य शैली है। यह नृत्यशैली भी मंदिरों में देवदासियों द्वारा प्रस्तुत की जाती थी इसमें जयदेव द्वारा रचित गीतगोविन्द के पदों तथा धार्मिक कथाओं का प्रस्तुतीकरण किया जाता है। यह भाव भंगिमाओं एवं ताल पर आधारित नृत्य शैली है।

 कुचिपुड़ी

यह दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश की प्रसिद्द नृत्य शैली है। इसका प्राचीन नाम कुचेलापुरी या कुचेलापुरम था। यह शैली मंदिरों में और वह भी आंध्र प्रदेश के कुछ मंदिरों में वार्षिक उत्‍सव के अवसर पर प्रदर्शित की जाती थी। परम्‍परा के अनुसार कुचीपुडी नृत्‍य मूलत: केवल पुरुषों द्वारा किया जाने वाला नृत्य रहा है। कुचीपुडी नाटक खुले और अभिनय के लिए तैयार मंचों पर खेले जाते हैं। इसके प्रस्‍तुतिकरण कुछ पारम्‍परिक रीति के साथ शुरू होते हैं और फिर दर्शकों को पूरा दृश्‍य प्रदर्शित किया जाता है। कुचीपुडी नृत्‍य का सबसे अधिक लोकप्रिय रूप मटका नृत्‍य है।

मोहिनीअट्टम

मोहिनीअट्टम केरल की महिलाओं द्वारा किया जाने वाला अर्ध शास्त्रीय नृत्य है जो कथकली से अधिक पुराना माना जाता है। मोहिनीअटट्म केरल के मंदिरों में प्रमुखत: किया जाने वाला नृत्य है। यह भी देवदासी नृत्‍य परंपरा से विकसित है। जैसे कि भरतनाट्यम, कुची पुडी और ओडिसी। मोहिनी का अर्थ है एक ऐसी महिला जो देखने वालों का मन मोह ले या उनमें इच्‍छा उत्‍पन्‍न करें। इसमें समुद्र मंथन पर आधारित कथानक का प्रस्तुतीकरण होता है।

कथकली

कथकली केरल के दक्षिण - पश्चिमी राज्‍य का एक समृद्ध शास्त्रीय नृत्य है। कथकली का अर्थ है एक कथा का नाटक या एक नृत्‍य नाटिका। कथा का अर्थ है कहानी, इसमें अभिनेता के द्वारा रामायण और महाभारत के महाग्रंथों और पुराणों से लिए गए चरित्रों का अभिनय किया जाता हैं। इसमें चेहरे के हाव भाव, भवों की गति, नेत्रों का संचलन, गालों, नाक और ठोड़ी की अभिव्‍यक्ति पर बारीकी से काम किया जाता है तथा कथकली में अभिनेता - नर्तक द्वारा विभिन्‍न भावनाओं को प्रकट करता है। कथकली एक नृत्‍य नाट्य परम्‍परा है जो केरल की विशिष्‍ट शैली की परम्‍परा के साथ विकसित हुआ, विशेष रूप से कुडियाट्टम।

मणिपुरी

यह पूर्वोत्तर भारत के मणिपुर की प्रसिद्द नृत्य शैली है. मणिपुरी नृत्‍य भारत के अन्‍य नृत्‍य रूपों से भिन्‍न है। इसमें शरीर धीमी गति से चलता है, यह नृत्य शैली भाविक संकेतों और मनमोहक गति से भुजाओं और उँगलियों द्वारा प्रस्तुत की जाती है। यह नृत्‍य रूप 18वीं शताब्‍दी में वैष्णव सम्प्रदाय के साथ विकसित हुआ। इसमें विष्णु पुराण,भागवत पुराण तथा गीतगोविंद से लिए गए कथानकों को प्रस्तुत किया जाता है।

सत्रिय

यह पूर्वोत्तर भारत के असम की प्रसिद्ध नृत्य शैली है। इस नृत्य शैली के जन्मदाता असम के शंकरदेव हैं। उन्होंने ताल, लय, पद के मिश्रण से इस नृत्य शैली का निर्माण किया। इस नृत्य शैली में भाव और मुद्राओं द्वारा कथानक का प्रदर्शन किया जाता है।

संगीत की भाँति नृत्य में भी देशी और मार्गी का वर्गीकरण रहा है। लोकरुचि को लेकर स्वाभाविक रूप से प्रदर्शित होने वाला नृत्य देशी अथवा लोक है। यही लोक नृत्य शास्त्रीय तत्वों के समावेश कर शास्त्रीय के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त करता रहा है। भारत के प्रमुख लोक नृत्यों में उत्तर प्रदेश का ‘रास नृत्य’, झारखंड का ‘छऊ’, महाराष्ट्र का ‘लावणी’ हैं।

संगीत का इतिहास

संगीत एक त्रिवेणी है, जिसमें गीत वाद्य तथा नृत्य तीनों का समावेश है। इन तीनों का एक दूसरे के साथ अभिन्न सम्बन्ध रहा है। संगीत रत्नाकर में शारंगदेव लिखते हैं-
गीतं वाद्यं तथा नृत्यं त्रयं संगीतमुच्यते

संगीत भारतीय समाज का अभिन्न अंग है। आज से लगभग ३००० वर्ष पूर्व रचे गए वेदों को संगीत का मूल स्रोत माना जाता है। चारों वेदों में, सामवेद को संगीत का सबसे प्राचीन ग्रन्थ माना जाता है। प्राचीन समय में वेदों व संगीत का कोई लिखित रूप न होने के कारण उनका मूल स्वरूप लुप्त होता गया। उत्तर वैदिक काल के ‘रामायण’ ग्रन्थ में भेरी, दुंदभि, वीणा, मृदंग व घड़ा आदि वाद्य यंत्रों व भँवरों के गान का वर्णन मिलता है। पौराणिक काल के ‘तैत्तिरीय उपनिषद’, ‘ऐतरेय उपनिषद’, ‘शतपथ ब्राह्मण’ के अलावा ‘याज्ञवल्क्य-रत्न प्रदीपिका’, ‘प्रतिभाष्यप्रदीप’ और ‘नारदीय शिक्षा’ जैसे ग्रन्थों से भी हमें उस समय के संगीत का परिचय मिलता है। भरत मुनि द्वारा रचित भरत नाट्यशास्त्र, भारतीय संगीत के इतिहास का प्रथम लिखित प्रमाण माना जाता है। आज के भारतीय शास्त्रीय संगीत के कई पहलुओं का उल्लेख इस प्राचीन ग्रंथ में मिलता है। भरत् नाट्य शास्त्र के बाद शारंगदेव रचित संगीत रत्नाकर, ऐतिहासिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है। बारहवीं सदी के पूर्वाद्ध में लिखे सात अध्यायों वाले इस ग्रंथ में संगीत व नृत्य का विस्तार से वर्णन है।

संगीत रत्नाकर में कई तालों का उल्लेख है। १००० वीं सदी के अंत तक, उस समय प्रचलित संगीत के स्वरूप को प्रबंध कहा जाने लगा. प्रबंध दो प्रकार के हुआ करते थे… निबद्ध प्रबंध व अनिबद्ध प्रबंध। निबद्ध प्रबंध को ताल की परिधि में रह कर गाया जाता था, जबकि अनिबद्ध प्रबंध बिना किसी ताल के बंधन के, मुक्त रूप में गाया जाता था। प्रबंध का एक अच्छा उदाहरण है जयदेव रचित गीत गोविंद। भारत में सांस्कृतिक काल से लेकर आधुनिक युग तक आते-आते संगीत की शैली और पद्धति में जबरदस्त परिवर्तन हुआ है। भारतीय संगीत के इतिहास के महान संगीतकारों जैसे कि कालिदास, तानसेन, अमीर खुसरो आदि ने भारतीय संगीत की उन्नति में बहुत योगदान दिया है।

प्राचीन काल में भारतीय संगीत के दो रूप प्रचलित हुए- 1. मार्गी तथा 2. देशी। कालांतर में मार्गी संगीत लुप्त होता गया। भारत में संगीत की प्रचलित पद्धतियाँ इस प्रकार हैं-

शास्त्रीय संगीत शास्त्रों पर आधारित नियमबद्ध गायन शैली है। इसके अंतर्गत राग आधारित गायन गाया जाता है, जो तालबद्ध होता है. यह दो पद्धतियों में विभाजित है.
• हिन्दुस्तानी संगीत पद्धति
• कर्नाटक संगीत पद्धति
उप- शास्त्रीय संगीत जिसमें देसी, लोक या शास्त्र दोनों परम्पराओं की पद्धति का अनुसरण हो उसे हम उप- शास्त्रीय संगीत कहते हैं। इसमें ठुमरी, टप्पा, कजरी, होरी, चैती आदि आते हैं।
सुगम संगीत जिसमें उप शास्त्रीय संगीत, सिने संगीत, लोक संगीत आदि गाया जाता है। इसमें ग़ज़ल, भजन, नज़्म, गीत, कव्वाली आदि संगीत आते हैं।
लोक संगीत काल और स्थान के अनुरूप वातावरण में स्वाभाविक रूप विकसित हुआ है, जिसका जन्म हमारे लोक परम्पराओं से हुआ है। फाग, सोहर आदि।
हमारी प्राचीन सभ्यता के अनुसार वर्तमान में संगीत वाद्यों में भी अनेक परिवर्तन होते गए, मध्यकाल में इस्लामी संस्कृति का प्रभाव भारतीय संगीत पर दिखता है। वर्तमान समय में पाश्चात्य संगीत का प्रभाव भी भारतीय संगीत पर देखने को मिलता है। वैदिक काल से वर्तमान तक संगीत के और नृत्य के स्वरूप में अनेक परिवर्तन हुए हैं तथा अपने स्वरूप में समय के अनुरूप बदलाव के कारण ही यह कला आज तक जीवंत है।

भरत के नाट्य शास्त्र में नाट्य के अंतर्गत नृत्य तथा संगीत के समावेश का विस्तृत विवरण है। नाट्यशास्त्र में नाट्य को नृत्त, नृत्य और नाट्य की सम्पूर्णता में माना गया है.

• नृत्त वह है जिसमें केवल अंग संचलन किया जाता है।
• नृत्य वह है जिसमें अंग संचलन के साथ भाव प्रदर्शन भी किया जाये ।
• नाट्य का अर्थ है अंग संचालन और भाव प्रदर्शन के साथ शब्दों का प्रयोग ।

इसीलिए यह माना जाता है कि नृत्य कला का उत्कर्ष नाटकों में जाकर हुआ। एक बार यह प्रक्रिया स्पष्ट हो जाने से हमारे सामने लोक में व्याप्त नाट्य शैलियों का महत्व स्पष्ट हो जाता है। वास्तव में लोक नाट्य के रूप में हम जो कला समृद्धि देखते हैं वह नृत्य का ही एक परिष्कृत रूप है। अनेक ऐसी शैलियाँ नृत्य के शास्त्रीय रूप से अलग होकर पारम्परिक लोक शैली के रूप में भी जानी जाती हैं।

संगीत तथा नृत्य नाट्य प्रस्तुति के अभिन्न अंग के रूप में प्राचीन काल से ही रहा है। पारंपरिक नाट्य शैलियों में शास्त्रीय नृत्य की मुद्राओं, पद, ताल, चारियों का परिष्कृत रूप देखने को मिलता है। वहीं शास्त्रीय तथा लोक संगीत ने नाट्य प्रस्तुति के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रचलित नृत्य नाट्य रूप जैसे यक्षगान, कुडियाट्टम, रामानट्टम, कृष्णाट्टम, भागवतमेला, अंकीया नाट, रासलीला, छऊ आदि में शास्त्रीय नृत्यों का समावेश देखने को मिलता है। वहीं इन लोक एवं पारंपरिक नाट्य रूपों में शास्त्रीय संगीत तथा लोक संगीत का प्रयोग भी देखने को मिलता है। उदाहरण स्वरुप भागवत मेला जिसमें कर्नाटक शैली के संगीत पर भरत नाट्यम शैली के अनुसार अभिनय किया जाता है।

नाटक में संगीत की प्रस्तुति जिस रूप में होती है उसे नाट्य संगीत कहा जाता है। नाटकीय भाव या यथार्थ को सघन/प्रभावशाली बनाने के लिए जिस संगीत का संयोजन किया जाता है उसे ही नाट्य संगीत माना गया है। नाट्य संगीत की उपयोगिता को मुख्य बिन्दुओं में इस प्रकार है-

नाट्य संगीत की मुख्य विशेषता और मुख्य उद्देश्य है। संगीत नाटक के लिए अनिवार्य नहीं वैकल्पिक है। भरतमुनि से लेकर आज के नाट्य चिंतकों ने नाट्य प्रस्तुति के लिए आवश्यक रूप से संगीत की अनुशंसा की है।

 सन्दर्भ सूची
अभिनय दर्पण- आचार्य नंदिकेश्वर
• आन्ध्र की सांस्कृतिक संरचना- डॉ. शैलाडा पद्मावती
• दक्षिण का रंगमंच- टी.आर.भट्ट, शरेश्चान्द्र, डॉ. नंदिनी
• केरल के सांस्कृतिक विरासत- डॉ. गोपीनाथन
• रंग परंपरा- नेमिचंद्र जैन
• परम्पराशील नाट्य- जगदीशचंद माथुर
• संगीत का इतिहास और नवजागरण- डॉ. रामविलास शर्मा
• इंडियन क्लासिकल डांस- कपिला वात्स्यायन
• कत्थक प्रसंग- रश्मि वाजपेयी
• लोकायन– डॉ. ओमप्रकाश भारती


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