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ISSN 2292-9754

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01.23.2019


निश्चल प्रेम

पीपल की परिक्रमाओं सा पवित्र
निश्छल बैर तुम्हारा मुझसे
कभी तो उस प्रेम को भी कोसता होगा
जो एक बार तुम्हारी निगाहों के
झोले से गिर गया था
मैंने उठाकर लौटाया नहीं जिसे
और तुमने भी मुस्कराकर
वापस नहीं माँगा..

उस बैर का यूँ कोसना भी
मंजूर है मुझे क्योंकि
तुम्हारे प्रेम का आसमानी रेनकोट
पहने मैं कई सावन जी जाता हूँ
चढ़ जाता हूँ ग़म के पहाड़
तुम्हारे फितूर में मुस्कुराकर..

आख़िर तुमसे ही तो सीखा है मैंने
चलते रहना एक परछाई का हाथ थामे..


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