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ISSN 2292-9754

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12.17.2018


दिल के राज़

उसके हर एक शब्द को
बहुत संजीदगी से अपनाया मैंने
उसकी हर एक भावना को
बहुत महत्त्व से दिल में उतारा मैंने
उसकी हर एक अनुभूति को
बहुत गंभीरता से सराहा मैंने
उसकी हर एक नज़र को
बहुत जुनून से अपनी रूह में बसाया मैंने
उसके हर एक स्पर्श से
बहुत अनुराग में अपने अंगों को सजाया मैंने

उसके शब्दों के भाव
उसकी अनुभूति के अहसास
उसकी नज़रों का आनंद
उसके स्पर्श के सौहार्द
इतनी गहराई से मुझसे
अनजाने वादे करते गए
मैं भी बेपरवाह हर वादे की
हाँ में हाँ मिलाती रही
ना कुछ पूछा ना कुछ माँगा
ना कोई गवाह ना कोई साँझा

जब उन वादों में दिन रात जीती रही
जब उन क़समों में हर पल लिपटी रही
तब एक पल के लिए भी ना सोच पाई
कि उसके दिल की गहराइयों में
छिपे हो सकतें हैं कितने राज़
जो ना ही उसकी आँखों ने बयान किए
ना ही उसके स्पर्श ने इज़हार किए
शब्द तो वैसे ही बदनाम हैं
कि बहुत कुछ बता कर भी
बहुत कुछ छुपा लेते हैं


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