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ISSN 2292-9754

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04.02.2018


हादसा

तुम –
समझते हो
भारी–भरकम
शब्दों की बौछार से
कर दोगे बंद मुँह
और
कुचक्रों की बिसात पर
कर दोगे होम मुझे?
आख़िर,
सोचा होगा तुमने
एक व्यक्ति
ही तो हूँ,
दबाई जा सकती है
आवाज़ मेरी
“हादसे “के नाम पर॥

इतिहास –
दोहराता है
अपने आपको॥
भूल गए –
ये ही ग़लती की थी
दुर्योधन ने
द्यूतसभा में
और दोहराया पुनः
चक्रव्यूहभेदन के अवसर पर।
अपमानित हुई द्रौपदी
मारा गया अभिमन्यु।
वह देखो,
सत्य के पहिए
कुरुक्षेत्र का मैदान
बँधी पट्टी
हाथों में तराजू
आई न्यायदेवी
करने हिसाब॥
रौंद डाला
सर्वस्व
रह गया
शेष
केवल सत्य॥
हुआ समूल नाश
कौरवों का।
रह गए अंधे माँ–बाप
काटते अपने पुत्रों के
दुराचारों की पौध
रोते–बिलखते
ऐश्वर्य से भरपूर
महल में
नितांत अकेले॥


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