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ISSN 2292-9754

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11.06.2016


खानदानी

कुदरत ने उसे स्वस्थ, मज़बूत, मोटा ताज़ा शरीर प्रदान किया था। चमकती काली-काली आँखें, सुनहरे, मुलायम बाल।

उम्र के इस आख़िरी पड़ाव में अपने भव्य ड्राईंग रूम में आराम से, आधुनिक सुख-सुविधाओं से लैस, रोलिंग चेयर पर झूलते हुए साठ इंच के एल.सी.डी. पर डिस्कवरी चैनल देखते-देखते डॉगेश्वर बाबू अपने ही बाल-चरित में खो गए थे!

चारों तरफ कुहासा… किसी मोहल्ले के धोबी के कपडे प्रेस करने के टेबल के नीचे माता ने कई बच्चों के साथ उसे भी जनम दिया था… मगर कुछ ही हफ़्तों में धोबी गाँव से आ गया और उसने उसकी माँ को बच्चों समेत वहाँ से खदेड़ दिया था…। बेचारी कहाँ गई पता नहीं..। अन्य भाई-बहनों का क्या हुआ? क्या पता…? उसे होश आया तो वह एक कोठी में, मुलायम गद्दे वाली बास्केट में लेटा हुआ था। ऊऊऊऊऊऊ कर रोया तो एक सात-आठ साल की अपूर्व सुंदरी कन्या फीडिंग बोटल में दूध रखकर पिलाने लगी थी।

फिर तो कहना ही क्या? बाल्यकाल… राजदरबार में… उसकी तंदुरूस्ती… और भी निखरने लगी। कोठी में आनेवाले लोग भी कहते, "कहाँ से लाये प्योर अलसेशियन ब्रीड है।" अपनी तारीफ़ सुन सुन कर वह फूले न समाता! जब कभी नौकर-चाकर, मालिक या बेबी सिकड़ी में बाँधकर हाथों में हंटर लिए उसे बाहर गली या पार्क में घुमाने ले जाते, वह मानो शेर हो जाता लगता पूरी दुनिया उसके पाँवों के नीचे है।

ऐसे ही बीतते तो ज़िन्दगी कितनी हसीन हो जाती, मगर नहीं! जैसे ही उसने जवानी में क़दम रखे उसके तेवर बदलने लगे। बिना वजह भौंकना, गली में आते-जाते स्वजातीय मादाओं को देखकर मचल पड़ना, बेक़ाबू हो जाना। सिकड़ी तोड़ कर भागने के लिए व्यग्र, और तो और एक दिन जब बेबी उसे बड़े प्यार से बिस्कुट खिला रही थी उसने ताव में आकर ऐसा झपट्टा मारा कि बेबी के हाथ खून से रँग कर सिर्फ लाल मांस का लोथड़ा दिखाई देने लगा था।

बस इतनी सी बात पर मालिक ने तीन साल तक के पालन-पोषण के बावजूद हंटर से मार-मार कर गाडी में बैठा कर शहर के दूसरे छोर पर छोड़वा दिया था।

कुछ ही दिनों में उसके तेवर अनेक गैसों के रूप में वायुमंडल में विलीन हो गये। शरीर की ऊर्जा जाती रही,… आभिजात्य के घमंड का घड़ा चूर-चूर होकर ज़मीन पर बिखर गया…।

मगर नसीब, नसीब होता है। उसका क़द रंगरूप व्यवहार बोलचाल ने उसे उस इलाक़े के कुत्तों का नेता बना दिया था। एम.सी.डी. वालों के अत्याचार से परेशान कुत्तों के लिए तो वह मसीहा बन गया था। वहीं उसका नाम डॉगी से डॉगेश्वरजी हो गया था।

भैंरो बाबा की कृपा, बक़ायदा इलेक्शन करवा कर वह अपने कौम का सर्वमान्य नेता हो गया, उसे अँग्रेज़ी में भी भौंकना आता था इसलिए बड़े-बड़े नेता पदाधिकारी, विदेशी डेलिगेट उससे मेल जोल बढ़ाने लगे थे।

इसी बीच उसने अपने रहने के लिए एक ख़ूबसूरत आशियाना भी बना लिया था। ऐसे बाहुबली, बुद्धिमान और धनवान योग्य वर के लिए बड़े-बड़े संपन्न परिवारों के रिश्ते आए थे। उसने एक ख़ूबसूरत स्वस्थ और अच्छी नस्ल की मादा से विधिवत विवाह कर गृहस्थी बसा ली।

कुछ ही महीने में घर बच्चों की किलकारी से भर गया था। इतने सारे पहरेदार, सेवक सब उनकी सेवा आवभगत में लगे रहते थे।

एक बार डॉगेश्वरजी कहीं विदेश यात्रा पर गए। देखा… वहाँ अपने खानदान के बुज़ुर्गों का आदम क़द विशाल फोटो लगाने का रिवाज़ है, जिससे लगाने वाले की प्रतिष्ठा और भी बढ़ जाती है।

बस…, फिर क्या था! महत्त्वकांक्षा की आग में जलते हुए वे इस क़दर मचल गए कि न दिन में चैन न रात में नींद! बस एक ही हसरत महीनों के मशक़्क़त के बाद, उन्होंने अपने पिताजी और आदरणीय दादाजी की दो आदमक़द तस्वीरें शीशे में जड़वाकर ड्राइंगरूम और बाहर की दीवार पर टँगवा दीं। फिर क्या था पूरे इलाक़े के ही नहीं न जाने कहाँ-कहाँ से झुण्ड के झुण्ड प्राणी आकर उन तस्वीरों को देखते और उनके खानदान पर मंत्रमुग्ध होते।

डॉगेश्वरजीका व्यवहार अब तानाशाही मनुष्यों जैसा होने लगा था। फिर वही घमंड़, वही हिक़ारत भरी दृष्टि से छोटे-छोटों को देखना, गुस्साना, गुर्राना, भौंकना, पंजे मारना। मगर खानदानी रईस, ख़ुद इतने बड़े नेता, कौन क्या बिगाड लेता? अब उम्र भी हो गई थी फिर भी रौब में कोई खलल नहीं। राजनीति ने उसे बुरी तरह भ्रष्ट कर दिया था। अब वे कई नाजायज़ बच्चों के पिता थे। बच्चों की माताएँ उस महलनुमा घर में रानी की सेविका बन कर रह रही थीं।

रॉकिंग चेयर पर झूलते-झूलते डागेश्वर जी मदमस्त होकर अतीत में विचरन कर रहे थे कि घर के बाहर तीव्र शोर पर उनका ध्यान गया। ज़ोर-ज़ोर से भौंकने, गुर्राने, रोने-भागने, झपटने, चिल्लाने की आवाज़ पर वे चकित, "क्या प्रलय हो गया।" वे बाहर निकले, सारे पहरेदार विपरीत दिशाओं में भाग रहे थे, कुछ लहूलुहान ज़मीन पर गिरे पड़े थे। एकदम भयानक दृश्य, अचानक उनकी दृष्टि, दो मज़बूत बाघों पर पड़ी, उनकी आँखों से ज्वाला निकल रही थी। अगल-बगल, दूर-दूर तक कोई नहीं, सामने चंद क़दमों की दूरी पर दो खूँखार, बाघ। कुछ मिनट अवाक, एक-दूसरे को घूरते रहे बस। अचानक एक बाघ ने एक क़दम आगे बढ़कर कहा, "ये आदम क़द फोटो किसके हैं?"

"मेरे बाप दादाऽऽऽऽ का…" थरथराते हुए उसके कंठ से बस इतना सा निकला ही था कि बाघ झपटा "चुप कुत्ते, ..अपनी औक़ात भूल कर तुमने हमारे पुरुखों की तस्वीरें लगा ली हैं ठहर… तुझे अभी मज़ा चखाता हूँ।" इतना कहकर दोनों उस पर एक-साथ झपट पड़े और कुछ ही पल में डागेश्वर जी वहाँ नीचे दो भागों में विभक्त गिरे पड़े थे।


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