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ISSN 2292-9754

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09.05.2017


चलो चलते हैं

सुनो साथी
चलो चलते हैं
नदी के किनारे
ठंडी रेत पर
पाँव को ज़रा ताज़गी दे
वहीं ज़रा सुस्ताएँगे
अपने-अपने हिस्से का
अबोला दर्द
रेत से बाँटेंगे
न तुम कुछ कहना
न हम कुछ पूछेंगे
अपने-अपने मन की गिरह
ज़रा-सी खोलेंगे
मन की गाथा
जो हम रचते हैं
काग़ज़ के सीने पर
सारी की सारी पोथियाँ
वहीं आज बहा आएँगे
अँजुरी में जल ले
संकल्प दोहराएँगे
और अपने-अपने रास्ते पर
बढ़ जाएँगे
सुनो साथी
चलते हैं
नदी के किनारे
ठंडी रेत पर
वहीं ज़रा सुस्ताएँगे!


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