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ISSN 2292-9754

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01.22.2018


’जमुनी’ कहानी संग्रह में लोक जीवन व संस्कृति

अपराजेय मानवीय जिजीविषा के समर्थ कहानीकार मिथिलेश्वर जी की कहानियों में लोक संस्कृति और समाज से जुड़ी समस्याओं, आकांक्षाओं और संघर्षो को मुखरित कर साहित्य की परम्परा को स्थापित किया गया है। मिथिलेश्वर जी ग्रामीण जन-जीवन के कुशल चितेरे हैं। ’जमुनी’ कहानी संग्रह 2001 में प्रकाशित हुई है। प्रायः उन्होंने अपनी कहानियों में गाँव की ज़िन्दगी अपने समस्त रूप, रंग, गंध, राग-विराग के साथ चित्रित की है। स्वतंत्रता के बाद जिस तरह से शहरों में परिवर्तन आया, वैसा गाँव में अपेक्षित परिवर्तन नहीं हो पाया। मिथिलेश्वर जी की कहानियों में रीति-रिवाज, परम्परा की रूढ़िवादी विचारधारा एवं देवी-देवताओं, अंधविश्वास और भाग्यवादी जैसी मान्यताएँ आज भी ग्रामीण जन-जीवन में स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। प्रखर आलोचक डॉ. नगेन्द्र लिखते हैं - “इस पीढ़ी के कहानीकारों में से अधिकांश गाँव से शहर आये हैं, इसलिए उन्होंने अपनी कहानियों में ग्रामीण जन की समस्याओं को अंकित किया है, लेकिन उनकी कहानियों में आँचलिकता की स्थानीय रंगत नहीं है, क्योंकि न तो उनकी दृष्टि रूमानी है, और न ही वे अतीत के मोह से ग्रस्त है।’’1 प्रायः उनका यह वक्तव्य आश्चर्यजनक ही नहीं अपितु हास्यास्पद प्रतीत होता है चूँकि ’जमुनी’ कहानी में मिथिलेश्वर जी लिखते हैं - “हे काली भाई! हे गौरेया बाबा! हे महावीर जी! हे सतगुरू! हे छठी मइया! हमार जमुनी कसहुँ निमन हो जाए...। वह पुनः देवी-देवताओं को गोहराने और मनौतियाँ मनाने लगती है। उसके रूआंसे मन के भीतर जाने-अनजाने छठ का एक गीत बज उठता है:

चार पहर राति जल-थ सेईले
सेईले चरण तोहार
छठी मइया.....
दुखवा हरना हमार.....”2

’छूँछी’ कहानी में मिथिलेश्वर जी लिखते हैं - “’एहिजा चिलार पर पुन कमाए नइखीं बइठल। अपना परिवार के रोजी-रोटी खातिर बइठल बानीं। लाश लवारिस ह कि केहू के घर के, हमरा एहसे कवनो मतलब नइखे। आग दिआई पइसा से मतलब बा।”3 प्रायः इन कहानियों में आँचलिकता की स्थानीय रंगत स्पष्ट दिखाई देती है।

मिथिलेश्वर जी की कहानियों में प्रायः लोक संस्कृति और लोक जीवन की छटा बिखरी पड़ी है - “परानपुर आरा शहर का एक उपेक्षित मुहल्ला था। उसे मुहल्ला न कहकर अगर गाँव कहा जाए तो ज्यादा उचित होगा। वह गाँव था भी। शहर बढ़ते-बढ़ते वहाँ तक आ गया था। परानपुर के सभ्य और सम्पन्न कहे जाने वाले लोग उसे छोड़कर शहर के अच्छे मोहल्लों में जा बसे थे। लेकिन वहाँ के गरीब, उपेक्षित और पिछड़े वहीं रह गए थे। उनके साथ उनका वह गाँव भी रह गया था। कच्ची मिट्टी के खपड़ैल के घर फूँस की झोपड़ियां, पुराने जमाने के दो-एक पक्के मकान, सब यथावत् बरकरार थे। वहाँ के बाशिंदो की भाँति उस गांव की पुरानी संस्कृति भी बरकरार थी। दाई-बारी, धोबी-कुम्हार, कुली-मजदूर, मेहतर-मिस्त्री, डोम-चमार और पासी-कहार का काम करने वाले उस गाँव के लोग आम शहरियों की तरह एक-दूसरे से कटकर नहीं, सटकर जीते थे। कमाने के लिए चाहे वे शहर के किसी मोहल्ले में जाते हों, लेकिन शाम को गाँव लौटने पर अपने गाँव के होकर ही जीते थे। जन्म-मरण, शादी-ब्याह और पर्व-त्योहारों के अवसरों पर ही नहीं, सदैव एक-दूसरे के सुख-दुख के साथ होते थे। किसके यहाँ क्या हो रहा है? किसके यहाँ कौन आया? किसे यहाँ क्या बना है? सब जानते थे। एक-दूसरे का घर और एक-दूसरे का जीवन उनके लिए तनिक भी गोपनीय और अबूझ नहीं था। जो अपने में सिमटकर जीने वाले थे, ऐसे लोगों का वास इस मुहल्ले में नहीं। शायद इसीलिए ऐसे लोग इस मुहल्ले में थे भी नहीं।”4

’छूँछा’ कहानी में बूढ़ी औरत की दयनीय स्थिति चित्रित की गई है। बूढ़ी औरत को पीठ पीछे दँतुली कहते हैं। उसके पति के मर जाने और उनकी इकलौती बेटी को उनके ससुराल वालों द्वारा ज़िंदा जला देने से वह मानसिक संतुलन खो जाती है। इसको देखते हुए, उसके देवर ने उसे पागल करार कर दिया। जिससे उसकी संपत्ति को हड़प कर, उसे घर से बाहर निकाल दिया जाता है। और वह दर-दर भटकती हुई परानपुर गाँव में पहुँच आयी है - ‘परानपुर’ में दँतुली किसी के दरवाजे पर नहीं रहती थी। गाँव के उत्तरी छोर पर स्थित ‘गोरेयाथान’ (गोरेया बाबा नाम देवता का स्थान) के पास उसने डेरा जमाया था। नीम के एक पुराने वृक्ष के नीचे गोरेया बाबा का चबूतरा था। पर्व-त्योहारों के दिन परानपुर की औरतें गौरेया बाबा की पूजा करती थीं। वह सार्वजनिक स्थल था।

‘गोरेयाथान’ के पास एक गोरेया बाबा का चबूतरा था और दूसरी ओर परानपुर के कबाड़ों का ढेर। लोग अपने घर का कूड़ा-कर्कट और बेकार हो गए सामान वहीं फेंकते थे। उन्हीं कबाड़ों के पीछे अपने लिए जगह बनाकर वह रहती थी। बारिश के दिनों में किसी के ओसारे में जाकर छिप जाती थी। फिर बारिश छूटते ही अपनी जगह पर आ जाती थी।”5

मिथिलेश्वर की कहानियों में लोक पर्व, उत्सव व संस्कारों का उल्लेख मिलता है। दँतुली की मृत्यु पर दाह-संस्कार का मार्मिक चित्रण किया है - “सुबह का उजाला फैलते और दिन की शुरूआत होते ही पुरानपुरवासी गोरेयाथान जुटने लगे थे। इस बीच मुहल्ले की औरतें पहले ही पहुँच चुकी थीं दँतुली के पास और उसे घेरकर रोना भी प्रारम्भ कर दिया था - “एकदम गऊ थी बेचारी....?”

“अरे, अब हम अपने बच्चों को किसके पास सोनपापड़ी के लिए भेजेंगी? कौन उन्हें दुलार से सोनपापड़ी खिलाएगा....?

“अरे, गोरेयाथान आने पर अब कौन हमें आशीषेगी? जी खोलकर दुआएँ देती थी बेचारी। अपनी बहू-बेटी से भी हमें अधिक समझती थी। हमें छोड़कर चली गई एकाएक....।”

परानपुर के मर्द एकत्रित होते ही उसके दाह-संस्कार की तैयारी में लग गए थे। भले ही वह उनकी कोई नहीं थी, लेकिन उनके गाँव में तो रहती थी। खून का न सही, साथ रहने का संबंध तो था ही। फिर यह तो पुण्य का काम था। उनके गाँव की यह पुरानी परंपरा भी थी। गाँव में मरे व्यक्ति की लाश को वह लावारिस की तरह कभी नहीं फेंकते। उन्होंने बड़े लोगों के मुहल्ले में मरने वाले लावारिसों की दुर्गति देखी थी। वे उसके सख्त खिलाफ थे।

इस अवसर पर परानपुर के प्रमुख व्यक्ति जगन पासी ने गोरेयाथान में एकत्रित लोगों को संबोधित करते हुए कहा - “अब देर करने की जरूरत नहीं। यह हमारी माँ-बहन से कम नहीं है। जिसकी जैसी औकात हो उसी अनुसार चंदा देकर इसका उचित दाह-संस्कार हमें करना है....।”6

‘छूँछी’ कहानी में परानपुर गाँव का सूक्ष्म चित्रण किया है, जिसका एक-एक दृश्य आँखों के सामने दिखाई देता है। यहाँ के लोगों में आत्मीयता के साथ एक-दूसरे के सुख-दुःख में सटकर रहते हैं। साथ ही अपनी परम्परा और संस्कृति का निर्वाह करते हैं।

‘नदी की राह में’ कहानी में नदी की अविरल धारा की तरह, लोक जीवन अपनी सम्पूर्ण हाव-भाव से परिलक्षित प्रतीत होती है, मिथिलेश्वर जी इसी नदी की पवित्र धारा को रेखांकित करते हुए लिखते हैं - “वह अक्सर नीम और बबूल के दातौन से ही मुँह धोता था। जब तक गाँव में रहा उसका यह नियम अबाध रूप चलता रहा। लेकिन गाँव छूटते ही सारे नियम छूटते चले गए। उसके झोले में ब्रश और पेस्ट भी मौजूद है। लेकिन ब्रश न निकाल उसने एक आदिवासी लड़की से दातौन खरीद मुँह धोना शुरू कर दिया। वह दातौन नीम या बबूल का तो नहीं था, पर जिस जंगली लकड़ी का था, उसे खट्ठे-मिट्ठे गँवई स्वाद से तरोताजा हो गया उसका मन। उसे पुनः याद हो आया अपना गाँव। उसने देखा, दातौन बेचने वाली वह लड़की कच्ची उम्र की थी। लेकिन अपनी गोद में एक बच्ची भी लिये हुए थी। गौर करने पर उसे पता चल गया कि वह बच्ची उसकी अपनी थी। इसी छोटी उम्र में माँ बन गई। क्या जानेगी इस जीवन और जगत का सुख। इसे असमय में माँ बनाने वाला इसका पति अवश्यक अशिक्षित, गँवार और जाहिल होगा....।

‘गूँगा गंगू’ कहानी में जन्मजात गूँगे गंगू की विवशता और उनकी दुःख भरी कहानी है। वह जीवन की कठिनाई से हार मानने वाले नहीं हैं। जीवन में आने वाले सभी संघर्षो को चुनौतीपूर्ण मात देने वाले हैं। पवितरी गूँगे गंगू से आत्मीय भाव से स्नेह रखती है - “पराहू की दूसरी पत्नी के मायके वाले कलकत्ता चटकल और इटागढ़ में काम करते थे। गाँव में कभी मजदूरी मिलती थी, कभी नहीं। पराहू की आय एकदम कम थी। झोंपड़ीनुमा घर के सिवाय गाँव में उसकी और कोई संपत्ति भी नहीं थी। कलकत्ता में कामों की कमी नहीं है और आय भी मेहनत के अनुसार अच्छी थी। उसकी पत्नी उसे कलकत्ता लेकर चल पड़ी। पराहू, गंगू को भी साथ ले जाना चाहता था, लेकिन उसकी पत्नी तैयार नहीं हुई - “इस गूंगे-बलाय को हम कहाँ-कहाँ ढोते चलेंगे? यहाँ गाँव में इसका गुजर-बसर हो जाएगा, कलकत्ता में इसका वास नहीं। यहाँ पवितरी काफी संभाल लेगी इसे....।”

बस एक रात गंगू को सोता छोड़ दोनों पति-पत्नी निकल गए थे। उस वक्त गंगू की उम्र दस-ग्यारह वर्ष की थी। अपने पेट की भूख को शांत करने के लिए वह गाँव की झाड़ियों से वनबेर तोड़कर खाता। कट चुके खेतों से अनाज के दाने चुन लाता। गाँव के गड्ढों और पोखरों से मछलियाँ पकड़ लाता। कोई छोटा-मोटा काम कराने के लिए कभी कोई पकड़कर ले जाता तो वही खिला देता। कभी कुछ नहीं मिलता तो पवितरी के दरवाजे पर जा बैठता। वह उसे अवश्य खिलाती। पूरे गाँव में एक पवितरी ही थी जो उस पर स्नेह रखती थी। गूँगे गंगू को भी यह लखते देर नहीं लगी थी। शायद यही कारण था कि अस्वस्थ होने पर या कहीं से भी हारने-थकने और निराश होने पर वह पवितरी के ही दरवाजे जाकर पड़ जाता था।

पवितरी सिताबगंज गाँव की कहारिन थी। कुछ वर्ष पूर्व पति का निधन हो गया था। उसे दो बेटियाँ थीं। दोनों की शादी कर वह मुक्त हो गई थी। अब वह अकेले रहती थी। उसका घर भी अन्य कहारों की अपेक्षा अच्छा था। उसकी स्थिति भी ठीक थी। चाँदी की हँसुली, चाँदी के कंगन आदि कुछ पुराने जेवर भी उसके बदन पर बने हुए थे। वह दुबली-पतली और अधेड़ उम्र की हो गई थी। लेकिन काम करने में बहुत फुर्तीबाज थी। अभिजित सिंह के यहाँ चौका-बर्तन वही करती थी। अपने दरवाजे गंगू को पड़ा देख उसके अंदर मातृत्व उमड़ आता था - “मेरा गंगू बेटा, अब तक तू कहाँ था रे? चल, हाथ-मुँह धोकर खा ले। कैसे कसाई माँ-बाप थे कि तुझे छोड़कर गए? भगवान ने तेरा मुँह चीरा है तो आहार भी देंगे।’’7 ‘गूँगा गंगू’ कहानी में रज्जू बाबा की पंडिताई गिरी के खोखलेपन को उजागर किया है! भविष्यवाणी व चमत्कार के नाम पर लोगों से ठग किया जाता है। गाँव के सीधे-साधे, भोले-भाले लोग उनके चंगुल में फंस जाते हैं। ऐसे ढोंगी बाबा का पोल ‘’गूँगा गंगू’ ने खोलकर रख दिया है। “रज्जू बाबा सिताबगंज गाँव को छोड़कर बाहर के आगुंतकों से पहले यही पूछते थे कि उसे किस-किस पर संदेह है और उसके परिचय के दायरे में कौन-कौन लोग हैं? फिर उन्हीं नामों में से आवश्यकतानुसार किसी एक का नाम या दो-चार नामों की घोषणा वे कर देते थे। अभिजित सिंह के मामा से भी ऐसे ही नामों की सूची की माँग उन्होंने की। लेकिन ठीक इसी वक्त गंगू ने जोर-जोर से ‘आऊ-आऊ’ चिल्लाते हुए रज्जू बाबा के आसन के दक्खिनी छोर की ओर हाथ का इशारा कर सबका ध्यान उधर आकृष्ट कर दिया। लोगों ने देखा, सचमुच रज्जू बाबा के आसन के दक्खिनी छोर के नीचे से साँप की पूँछ लटक रही थी। उसे देखते ही लोग चिल्ला पड़े - “साँप-साँप।’’

रज्जू बाबा भी आसन से उछलकर नीचे आ गए। लोगों ने रज्जू बाबा को साँप की पूँछ दिखाते हुए कहा - “आपके आसन के नीचे साँप घुस गया है बाबा। ठहरिये, हम अभी इसका काम तमाम कर देते हैं....।”

साँप मारने के अभ्यस्त गाँववालों ने अपनी लाठी-डंडे सँभाल तत्क्षण मोर्चा ले लिया। रज्जू बाबा रोकने लगे। अपनी दयालुता का परिचय देते हुए साँप को जीवित भगाने की फिराक में लग गए। एक ग्रामीण का डंडा ले दूर से ही अपने आसन को ठोंकने लगे कि साँप निकलकर भाग जाए। लेकिन साँप पर इसका कोई असर नहीं। इसके बाद रज्जू बाबा के लाख रोकने और ना-ना करने के बावजूद साँप को मारने के लिए गाँव के लोगों ने आसन के गद्दे को उलट दिया। कोई और अवसर होता तो वे रज्जू बाबा की इच्छा के विरुद्ध ऐसा कदापि नहीं करते। लेकिन यह आपातस्थिति थी। रज्जू बाबा की रक्षा के लिए ही वे ऐसा कर रहे थे। लेकिन यह क्या? गद्दा हटते ही लोगों ने देखा कि आसन के नीचे पड़ा वह साँप मरा हुआ था। उससे कुछ ही दूर पर अभिजित सिंह की पत्नी का वह गायब हुआ हार पड़ा था। अभी हाल ही में शिवेंदु की चोरी हुई विदेशी घड़ी तथा गोबरधन की बेटी के चोरी गए जेवर भी पड़े थे। अब लोगों को यह समझते देर नहीं लगी कि बाबा क्यों आसन नहीं उलटने देना चाहता था और क्यों आसन पर ही सदैव मौजूद रहा था? आसन के पास किसी और को न जाने देने के पीछे भी उसकी मंशा क्या थी?”8

‘जमुनी‘ कहानी संग्रह की सर्वश्रेष्ठ कहानी ‘जमुनी‘ कही जा सकती है। जमुनी एक भैंस है। पूरी कहानी का केन्द्र बिन्दु जमुनी है। शुरू से अंत तक उसी पर मँडराती है। जमुनी के बीमार पड़ने पर जिउत, जोगिनी और परिवार के सभी जन अचेतन अवस्था में रहकर पूर्व की घटनाओं को ताज़ा करते हैं। अतः जमुनी कहानी का अधिकांश भाग पूर्वदीप्ति शैली में है। प्रायः ‘जमुनी’ कहानी कुछ सीमा तक ‘गोदान’ की पृष्ठभूमि को रेखांकित करती मालूम होती है। ‘जमुनी’ कहानी में मिथिलेश्वर जी लिखते हैं- “जमुनी को किसी ने माहूर तो नहीं दे दिया या टोना-टोटका तो नहीं कर दिया। दरवाजे पर हाथी की तरह मस्त जमुनी को देखकर कितने मुदइयों का कलेजा फट रहा था। जरूर उन्हीं में से किसी ने कुछ किया है। वह सुरूज बाबा को गोहराती है कि जमुनी को ठीक कर दे.....।”9 इस तरह मिथिलेश्वर की कहानियों के संबंध मे प्रखर आलोचक डॉ. रामचन्द्र तिवारी जी लिखते हैं- “वस्तुतः मिथिलेश्वर ने अपने प्रत्यक्ष अनुभव को सहज कथा-शिल्प में ढालकर प्रेमचन्द की कहानी-परम्परा को पुनः प्रतिष्ठित करने का प्रयत्न किया है।”10

जमुनी एक लम्बी कहानी है, जिनमें गौना, पचरा, बैसाखी मेला, संकरात परब का उल्लेख हुआ है। जोगिनी विश्वास के नाम पर अलिआर के ओझाई पर कुछ चढ़ावा देती है। अलिआर जोगिनी से कहता है- “मैंने सब इंतजाम कर दिया है भौजी, उसके बाण को काट दिया है....... अब सिर्फ साचर स्थान पर दारू ढरकाना और मुर्गी काटना बाकी है। इसके बाद तो उसे भैंस को छोड़कर भागना ही है।”

अलिआर ने महाजन देखकर ही अपनी फर्माइश की है। अपनी फर्माइश के पीछे अपने प्रति महाजन का विश्वास और उसकी सामर्थ्य को वह सदैव ध्यान में रखता है। अगर महाजन श्रद्धालु है और आर्थिक दृष्टि से तंगी में नहीं है, तो उसके यहाँ वह खसी काटने, वस्त्र अर्पित करने और देवास के नाम पर सवा मन धान निकालने का आग्रह करता है। पर यहाँ जिउत की स्थिति-विश्वास को देखकर ही वह सिर्फ मुर्गी और दारू का न्यूनतम आग्रह करता है। लेकिन इस आग्रह पर भी एक क्षण के लिए जिउत का परिवार असमंजस की स्थिति में पड़ जाता है! मुर्गी और दारू का नाम सुन जोगिनी जिउत की ओर ताकती है और जिउत जोगिनी की ओर! फिर दोनों कातर दृष्टि से अलिआर की ओर ताकने लगते हैं। उनकी आँखों की भाषा अलिआर समझ जाता है। अपनी स्थिति पर तरस खाने का आग्रह उनकी आँखें कर रही होती है। जवाब में वह मँजे हुए खिलाड़ी की तरह कहता है - “’इतना तो करना ही होगा भौजी! साचर को बिना संतुष्ट किए कुछ नहीं हो सकता।”

इसके बाद न चाहते हुए भी जोगिनी अँचरा के खूँट से चंद सिक्के निकाल अलिआर की हथेली पर रख देती है - “मुर्गे के चूजा ही ले लेना भाईजी और एक पौवा ही दारू! इतने से ही साचर को मना लेना....। हाथ सकेत में है, नहीं तो मनमाफिक चढ़ावा देती....।”11

एक तरफ दुनिया बड़े-बड़े दावे करती है, चाँद मंगल पर बसने की बात करती है। वहीं दूसरी ओर समाज की यथार्थ स्थिति कुछ और है। इस पर प्रखर आलोचक डॉ. रामचन्द्र तिवारी लिखते हैं - “स्वतंत्रता-प्राप्ति के चालीस वर्ष बाद भी आज का भारतीय गाँव आर्थिक समृद्धि और मानसिकता दोनों स्तरों पर बहुत पीछे है।”12 वहीं ’जमुनी’ कहानी के संबंध में डॉ. राकेश गुप्त एवं डॉ. ऋषिकुमार चतुर्वेदी हिन्दी कहानी 1991-95, खण्ड-2 का भूमिकांश में लिखते हैं - “मिथिलेश्वर ग्रामीण परिवेश के सशक्त कथाकार हैं। उनकी लम्बी कहानी जमुनी को कृषक- जीवन की महागाथा कहा जा सकता है, जिसमें एक सामान्य भारतीय कृषक परिवार के प्रेम-घृणा, आस्था-विश्वास, आशा-निराशा, हर्ष-विवाद, सम्पत्ति-विपत्ति और उत्थान-पतन का मार्मिक एवं सजीव चित्र प्रस्तुत किया है....। शिल्प का रचाव निश्चय ही कहानी को महत्वपूर्ण बना देता है, किन्तु कहीं-कहीं अनायास सादगी ही शिल्प का शृंगार बन जाती है। प्रेमचन्द का कथाशिल्प ऐसा ही था। वर्तमान कथाकरों में मिथिलेश्वर का कथाशिल्प भी इसी प्रकार है।”

शीर्षक कथा जमुनी एक लम्बी कहानी है जिनमें एक कृषक परिवार का संघर्ष जीवन्त हो उठता है और जहाँ अपनी भूख-प्यास और नींद-आराम को दरकिनार करते हुए हर एक की चिन्ता बीमार भैंस को मृत्यु के मुख में जाने से बचाने की है, क्योंकि वह भैंस ही उनकी सुख-समृद्धि का केन्द्र है।

जमुनी के अतिरिक्त इस संग्रह की अन्य कहानियाँ भी जीवन और जगत के ज़रूरी सवालों के जवाब तलाशती अमिट प्रभाव क़ायम करने वाली कहानियाँ है। निःसन्देह यह कहानी-संग्रह समर्थ कथाशिल्पी मिथिलेश्वर के प्रौढ़ कथा-लेखन की सार्थक यात्रा का द्योतक है। ‘बाबूजी’ के कथाकार ने अपने लेखकीय नैरन्तर्य और श्रेष्ठ कथा-लेखन के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट मौजूदगी का एहसास कराते हुए हिन्दी कथा-जगत को और अधिक ऊर्जस्वित और विकसित किया है....।”13

निष्कर्षतः समकालीन कहानीकारों के संबंध में प्रखर आलोचक डॉ. नगेन्द्र लिखते हैं- “मिथिलेश्वर, बलराम, शिवमूर्ति आदि की कहानियों में समकालीन भारतीय ग्रामीण-समाज का यथार्थ रूप उसकी यथार्थ समस्याओं को चित्रित होते हुए देखा जा सकता है। इस सब कहानीकारों की सहानुभूति गाँव के सामान्य शोषित जन के प्रति हैं और शोषणकर्ताओं के प्रति विरोध की भावना है।”14

शोधार्थी
जीतलाल
हिन्दी विभाग
इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय
खैरागढ़ (छ.ग.)
sahujeetlal3232@gmail.com

संदर्भ ग्रंथ:-

1. डॉ. नगेन्द्र, संपादक हिन्दी साहित्य का इतिहास, मयूर पेपर बैक्स प्रकाशन नोएडा,
सैतालीसवां पुनर्मुद्रण संस्करण: 2014 पृ.सं. - 752
2. मिथिलेश्वर ’जमुनी’ कहानी संग्रह, राजकमल पेपर बैक्स प्रकाशन नई दिल्ली,
पहला संस्करण: 2010 पृ.सं. - 95
3. वही - पृ.सं. 14
4. वही - पृ.सं. 9
5. वही - पृ.सं. 10-11
6. वही - पृ.सं. 11
7. वही - पृ.सं. 136-137
8. वही - पृ.सं. 139-140
9. वही - पृ.सं. 70
10. तिवारी डॉ. रामचन्द्र हिन्दी का गद्य साहित्य, विश्वविद्यालय प्रकाशन वाराणसी,
पंचम संस्करण 2006 ईं. पृ.सं. - 316
11. मिथिलेश्वर ’जमुनी’ कहानी संग्रह, राजकमल पेपर बैक्स प्रकाशन नई दिल्ली,
पहला संस्करण: 2010 पृ.सं. - 77
12. तिवारी डॉ. रामचन्द्र हिन्दी का गद्य साहित्य, विश्वविद्यालय प्रकाशन वाराणसी,
पंचम संस्करण 2006 ईं. पृ.सं. - 316
13. मिथिलेश्वर ’जमुनी’ कहानी संग्रह, राजकमल पेपर बैक्स प्रकाशन नई दिल्ली,
पहला संस्करण: 2010 - नेपथ्य से
14. डॉ. नगेन्द्र, संपादक हिन्दी साहित्य का इतिहास, मयूर पेपर बैक्स प्रकाशन नोएडा,
सैतालीसवां पुनर्मुद्रण संस्करण: 2014 पृ.सं. - 752


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