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ISSN 2292-9754

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12.17.2018


मैं अच्छी नहीं...?

शायद मैं अच्छी नहीं,
क्योंकि मैं झूठ नहीं बोलती।
दूसरों की इच्छाओं के अनुरूप,
सच को कभी नहीं तोलती।

शायद मैं अच्छी नहीं,
क्योंकि पीठ पर वार नहीं करती।
जो है सब कुछ सामने ही तो है,
ये सोच कर पीछे से प्रहार नहीं करती।

शायद मैं अच्छी नहीं,
क्योंकि सभी को ही भला समझती।
आस्तीन में रहकर साँप बन जाते हैं,
लोगों की ये कला नहीं समझती।

शायद मैं अच्छी नहीं,
क्योंकि छल कपट का अर्थ नहीं जानती।
मुँह पर अच्छे बने रहने वालों के,
दिलों के अंदर की गर्द नहीं जानती।

शायद मैं अच्छी नहीं,
क्योंकि प्रतिउत्तर देना नहीं जानती।
चाशनी में लिपटे करेले को।
चखने के बाद भी नहीं पहचानती।

शायद मैं अच्छी नहीं,
क्योंकि सभी में वफ़ा तलाश रही।
हरेक शीशी भरी हुई है जहर से,
और मैं हूँ कि सब में वफ़ा तलाश रही।

शायद मैं अच्छी नहीं,
क्योंकि सही रास्तों से प्यार है।
नहीं समझी कि मंज़िलों की चाह में,
ग़लत अपनाने वालों की भरमार है।


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