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ISSN 2292-9754

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02.18.2016


आध्यात्मिक एहसास की अनुभूतिः संदर्भ "यात्रा"

मानव मात्र की प्रत्येक प्रवृति सप्रयोजन ही होती है। साहित्य का सृजन भी एक पवित्र और प्रशंसनीय प्रवृति है। किसी भी सृजन के पीछे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रयोजन रहता ही है, फिर वह कला हो या साहित्य। उसमें विविधता समायी होती ही है, यही वैविध्य कलाकार की अनोखी, अनूठी सिद्धि है। रचनाकार की नज़र जहाँ कहीं भी पहुँचती है, वहाँ से वे सत्य, शिव और सौंदर्य को खोज लेता है। इसीलिए साहित्य सत्यम्, शिवम् और सुंदरम् का सुभग संगम है।

गुजराती साहित्य में अति प्रसिद्ध रचनाकार के रूप में जाने-माने जाते हैं कवि सुंदरम् (तख़ल्लुस), उनका पूरा नाम है त्रिभुवनदास पुरुषोत्तमदास लुहार। तेहसिल मिंयामातर, जिला भरुच में दिनांक 22 मार्च 1908 में जन्म धारण कर, "कोयाभगत नी कड़वी वाणी" से कविता यात्रा प्रारंभ करके "वसुधा" तक का सुहाना सफ़र करते हुए पाठकों को एक अनोखा आस्वाद करवाया। हाँ ये ज़रूर कहूँगी कि उनकी 1951 में प्रकाशित अप्रतिम कृति "यात्रा" काव्य संकलन हेतु उन्हें नर्मद साहित्यसभा द्वारा नर्मद सुवर्णपदक से 1952 में पुरस्कृत किया गया तथा "काव्य मंगला" के लिए रणजीतराम सुवर्णपदक से उन्हें नवाज़ा गया था। दक्षिणायन के प्रवास के बाद उनके जीवन ने करवट बदली और आगे वे कहते हैं, "जीवन की परम कृतार्थता कहाँ, किसमें? जीवन का सौंदर्य, रस, आनंद, औऱ प्रेम की अनुभूति की उत्कट जिजीविषाओं का क्या? ये सारे सवाल ने सोच को स्थगित कर दिया............। और मैं श्री अरविंद की सक्रियता के समक्ष खड़ा हो गया, तब जहाँ मुझे अनेक बार निष्क्रियता दिखाई दी थी, वहीं पर परम सक्रियता नज़र आयी, जिसने हमारी भौतिक सक्रियता को तृणवत् कर दिया। अति उत्क्रांत स्तर की सक्रियता को मैं अनुभूत कर पाया, जिसने मेरे तमाम प्रश्नों के उत्तर के किवाड़ खोल दिए।"1

इसी संदर्भ में कवि की अद्भुत रचना "यात्रा" की संवेदना को उजागर करना चाहती हूँ। सन् 1951 में प्रकाशित काव्य संकलन "यात्रा" उनके निजी काव्य प्रवृति के संदर्भ में ही नहीं, अपितु समग्र अर्वाचीन गुजराती कविता के संदर्भ में एक विशेष घटना के समान था। जिसमें कवि के आध्यात्मिक संवेदन का बारीकी से निरूपण दृष्टिगत होता है। "यात्रा" की रचनाओं में श्री अरविंद एवं श्री माताजी की सजीव प्रेरणा स्पष्ट दिखाई देती है। इसमें कवि ने दिव्य तत्व की मधुर झंखना, उन्हें प्राप्त करने की अदम्य लालसा, औऱ पाने की लाक्षणिक प्रस्तुति द्वारा लगता है कोई नई यात्रा का ही प्रारंभ किया है। यात्रा एक नयी उज्जवल, ऊर्ध्वगामी पगडंडी है जिन पर कवि के पावन चरण अग्रसर हो रहे हैं। सुंदरम् कहते हैं, "हमारी रुचि, समज, ज्ञान चाहे रोज़ प्रगित न करते हों परंतु गति में तो रहते ही हैं। जो चीजें कल जैसी लग रही थी, आज नहीं लगती।"2

कवि की सोच, भाव विश्व, काव्य प्रवाह को देखने पर लगता है कि वे समय के साथ विकसित होते रहे हैं। अतः "यात्रा" की रचनाएँ गुजराती काव्यविभा में एक अनूठी छवि स्थापित करती हैं। उनके जीवन-कृतित्व पर श्री अरविंद की दिव्यता संबंधी कल्पना का गहरा प्रभाव दृष्टिगत होता है। परिणाम स्वरूप समाज की विषमता को एवं समाज की बारीक वास्तविकता से गूँथी कविताओं ने भी ऊर्ध्व मार्ग ग्रहण किया है, जो भक्ति का, आध्यात्मवाद का, आशावाद का मार्ग है। "यात्रा" की रचनाओं में तत्व की चाह प्रकट हुई है, जो सजीव और स्तुत्य है। एक अनोखी यात्रा जो ऊर्ध्वगमन की दिशा में आगे बढ़ रही है, इस प्रकार से देखें तो शीर्षक यथार्थ है।

कवि की व्यापक एवं साधक दृष्टि का केंद्र बिंदु है आध्यात्मवाद। यही एक भाव यात्रा के विविध रूपों वाले काव्यों में गूँथा है। इस प्रकार उनका ये अध्यात्मभाव सघन एवं प्रभावकारी बन पड़ा है। यात्रा में प्रणय काव्य, सोनेट, स्थान और व्यक्ति विशेष के काव्य, भक्ति गीत, ऊर्मि गीत, भजन लय में ढले गीत, अध्यात्मभाव के काव्य, ऊर्ध्व जीवन की आकांक्षा के गीत, चिंतनात्मक आदि काव्यों का संयोजन है पर उसमें भी आध्यात्मिक काव्यों की विपुलता दृष्टिगत होती है। जो अपने आप में विषय को संजोये हुए है। बेशक कवि ने अन्य भावसभर काव्यों को भी अध्यात्म का पुट दिया है। मेरी ये कोशिश रहेगी कि मैं जिससे अधिक प्रेरित हुई हुँ ऐसे अध्यात्म भाव के काव्यों की बात करूँगी।

हम देख सकते हैं कि रचनाकार भी यात्रा में मानो खुले आसमान में उड़ रहे हैं, उनका संवेदन अति भावुक एवं स्निग्ध अनुभूत हो रहा है। फिर भी अध्यात्म विषयक क्षेत्र में साधक की भूमि से वे दूर नहीं हटते। साधक की उच्चतम भूमिका पर रहकर काव्य के क्षेत्र में भ्रमण कर रहे हैं। प्रसिद्ध कविता "कोयाभगत नी कड़वी वाणी", "यात्रा" में आकर मीठी, मधुरी हो गयी है। जो कविताएँ मानवाभिमुख थी वे समग्र अध्यात्माभिमुख हो गयी है। "यात्रा" में कवि ने श्री अऱविंद की साधनायुक्त विचारधारा को काव्य में पिरोया है। पाठकों को अपनी शिष्ठ-मिष्ठ भाषा के माध्यम से श्री अरविंद की पारगामी दिव्यदृष्टी को समझाने का सफल प्रयत्न किया है। इन काव्यों में भक्ति, चिंतन, मनन, प्रशान्ति, दिव्य की झंखना आदि चित्रित है। यात्रा में अध्यात्म विषयक जो काव्य है उसमें कुछ लंबे है, तो कुछ छोटे भी है। "आभनो खेडैयो", "हंसा मारा", "ढूंढढूंढ", "एक ज रटना", "हे चकवा", "पूनमराणीने", "मेरे पिया", "भव्यसतार", "तवचरणे", "जाग अगनी", "चल", "एक पंखणी", "नव ठरतुं", "आजे मोरी", "एक ज्योत", "आ हवा" अहीं आदि आदि अध्यात्म एवं भक्ति से भरे गीत (लयबद्ध) काव्य है। इन गीतों में कवि की सुंदर कल्पना की लीला, शब्द एवं अर्थ का सायुज्य, भावाभिव्यंजना, हृदय को छू जानेवाली संवेदना, औचित्यपूर्ण प्रतीक योजना, मधुर ध्वनि संयोजन, रसात्मकता, ऋजुता, लयात्मक मनोहारिता, सुक्ष्मातिसुक्ष्म अनुभूति आदि का कलात्मक गूँफन दृष्टिगोचर होता है। इस संकलन के गीत तो रसप्रद, भाववाही है ही पर काव्य के रूप में भी अनुपम लगते हैं। सुंदरम् कवि के रूप में तो ऩिखरकर सामने आते ही है परंतु यहाँ उनका साधक रूप अधिक गहन गंभीर होते हुए भी सरल-तरल अनुभूत होता है। कवि ने सुक्ष्मातिसुक्ष्म अनुभूति को लयबद्ध करनेका गीतों के प्रवाह में बहाने का प्रशस्य प्रयत्न किया है और उसमें पूर्णतः सफल हुए हैं।

"हंसा मारा" और "आभनो खेडैयो" में पुरानी तर्ज के भजन की लय में ढालने का प्रयास सफल हुआ है। "हंसा मारा" गीत में परंपरित प्रतीक हंस (जीव) जो शरीर में सूक्ष्म रूप से निवास कर रहता है। हंस आत्मा का प्रतीक है और आत्मिक ऊर्ध्वीकरण की बात कवि यहाँ करते है। आत्मा की उन्नति के महत्व को प्रतिपादित करने का भरसक प्रयास है। कवि की अभिप्सा और ईश्वर के प्रति श्रद्धा की इस रचना में सुंदर अभिव्यक्ति हुई है। आत्मा को उद्बोधित करते हुए कवि कहते है:

"हंसा मारा रे चल रे मानसनां मोती चरवा,
हेमाळी टूंको टोचे सोनां झगमगतां,
मळता मारगडे मीठा भेरु भड वायरा,
हीरकज्योताळा नयणां आभे तगतगतां।"3

अर्थात इस शरीर के अंतर्गत स्थित आत्मा को अकेले ही बिना रुके, अनवरत रूप से अंबर पर भ्रमण करना है, विचरण करना है, ऊड़ना है। इसी प्रक्रिया में दिव्यता की झाँकी करनी है। ख़ुद ईश्वर ने ही तो मनुष्यात्मा को दिव्यता की झाँकी कराने हेतु श्री अरविंद और श्री माताजी के समर्थ युगल को इस पृथ्वी पर भेजा है। हंस रूपी आत्मा की ये ऊर्ध्वयात्रा ईश्वर कृपा से ही सफलता प्राप्त कर पाती है। परंपरित भजनों के प्रतीक औऱ शब्दों को लेकर कवि ने ईश्वर के भव्य स्वरूप को यहाँ प्रकट किया है।

"आभनो खेडैयो" का अर्थ है आसमान को खेने वाला, अंबर में विचरण करनेवाला। ये एक रूपक काव्य है। इसमें कवि ने ईश्वर के विराट-विशाल स्वरूप का चित्रण किया है। ईश्वर आदिकालीन खेवैया है, हिमालय पर उन्होंने अपनी सीमा बनायी है। उसके पैरों में पंख लगे है। ये आसमान को खेनेवाला खेवैया है हररोज़ नये-नये स्थानों को खेकर गूढ़ अंधकार चीर देता है। इस रचना में कवि ने परंपरित भजन की लय में तथा रूपकात्मक शैली में ईश्वर के व्यापक स्वरूप का वर्णन करके, ईश्वर मानव को तमस् में से प्रकाश की, ज्योति की दिशा में ले जाते है, इसका मार्मिक, हृदय स्पर्शी चित्रण है। यहाँ कवि की कवि-शक्ति औऱ कवि-प्रतिभा की प्रतीति होती है। इन दोनों काव्यों में सिर्फ शब्दों की रंगलीला ही नहीं अपितु शब्द और अर्थ के औचित्यपूर्ण सायुज्य द्वारा रसात्मकता भी आपूरित है।

"मेरे पिया" और "ढूंढढूंढ" दोनों ही ब्रजबानी में रचित रचनाएँ हैं। इसके अतिरिक्त "हे चकवा", "पूनमराणीने", "एक ज रटना", "भव्यसतार" आदि कवि सुंदरम् के भावसभर ऋजु गीत है और लघु भी है। इन लघु गीतों की भाषा, भाव और शैली हृदयस्पर्शी है। ये सारे गीत मीरांबाई की ईश्वर प्राप्ति की पिपासा को स्मृति पट पर अंकित किये बिना नहीं रहते। साधक सुंदरम् की भक्तिनिष्ठ आरज़ू यहाँ अभिव्यक्त होती है। "मेरे पिया" में ईश्वर का रसमधुर स्वरूप अभिव्यक्त हुआ है। कवि भाव विह्वल होकर गा उठते है:

"मेरे पिया, तुम कितने सुहावन,
तुम बरसो जिम मेहा सावन,
मैं तो चुपचुप नाह रही. मेरे पिया।"4

ये शब्द नहीं परंतु स्नेह की रसधार है जिसमें मिलन की अनहद ख़ुशी व्यक्त हो रही है, तो "ढूंढढूंढ" में जलानेवाली सुलगती विरहाग्नि की पीड़ा अभिव्यक्त हुई है। भक्त हृदय के कवि संवेदना से विगलित होकर गा उठते है:

"दरस दियो पिया! तरसत नैना, तुम बिन औऱ कहीं नहीं चैना
दिन भये रैन, रैन भइ दिना, ढूंढ ढूंढ तोह हो गई रतियां।"5

अपनी चरम वेदना को शब्दबद्ध करते हुए कवि कहते हैं कि दरसन दे दो हे पिया। पूरी काल की रचना उलट गई दिन, रात और रात दिन दिखने लगे है। अर्थात समय का पता नहीं चलता। निशा का अंधेरा घिर-घिर आया है। अब तो दरसन देकर उजियारा कर दो मेरे प्रभु। यहाँ आधुनिक मीरां से पहचानी जानेवाली हिंदी साहित्य की रहस्यवादी कवियत्री महादेवी का स्मरण सहज ही हो आता है, तो मध्य युग की मीरां के शब्द स्मरण पट पर ताज़ा होते है, "दरसन द्यो घनश्याम नाथ मोरी अँखियां प्यासी रे......।" यहाँ साधक की अनन्य साध की अनुभूति हुए बिना नहीं रहती। यही बात अन्य़ रूप में गीतांजली में टागोर ने भी कही है।

"हे चकवा" में "हंसा मारा" की तरह प्राचीन प्रतीक के माध्यम से पिया मिलन की उत्कटता को अभिव्यक्त किया गया है। पिया रूपी ईश्वर दर्शन की आतुरता औऱ उतावली कवि के मनोजगत को विह्वल बना देती है, पर ये प्राप्ति उतनी सरल-सहज नहीं है। अतः कवि चकवा को उद्बोधित करके कहते हैं:

"रात प्रहरनी चार, केवळ आडी ताहरे,
जुगजुगनी लंघार हुँ ने पिय भिच, बंधवा।"6

"पूनमराणीने" गीत में कवि अति दुष्कर तिमिर को नष्ट कर, पूनमराणी को आध्यात्मिक प्रकाश-तेज पुंज को हृदय के झूले पर झुलाने की बिनती करते हैं, अर्थात यहाँ प्रत्यक्ष एवं परोक्ष दोनों प्रकार के अंधकार को मीटा कर तेजपुंज बिखेरने की विज्ञप्ति करते हैं। उनका मानना है कि ईश्वर की दिव्यता अमृत समान शीतल है। अतः सृष्टि में उठनेवाली आँधी, झंझावात पर बरसे तो जगत के त्रिविध ताप को शीतलता देती है। समग्र जगत उस तपिश से मुक्त हो सकता है अगर वे शीतलता की वर्षा कर दें।

"एक ज रटना" काव्य, सुंदरम् के समग्र आध्यात्मिक काव्य में व्यक्त विचारधारा के निष्कर्ष रूप अनुभूत होता है। कवि उत्तुंग शिखरों पर निवास करनेवाले अप्रतिम-अफाट तेजपुंज की राशि एवं परमानंद के जलधि रूप परमात्मा को भूतलवासी अर्थात् धरा पर उतरण करने के लिए प्रार्थना करते हैं। और एक ही रट अभिव्यक्त करते हुए कहते है:

"तुं मुजमां तुज धाम रची जा, ए शुभ घटना हो।"7

जब भी परमतत्व मनुष्य के चित में वास करता है तब ही मानव जीवन आध्यात्मिक ऊर्ध्वता को प्राप्त करता है और उसीके परिणाम स्वरूप उसका समग्र जीवन सफलता का वरण करता है। श्री अरविंद की श्रद्धा है कि परम तत्व की दिव्यता धरा के, अर्थात पृथ्वी पर के मनुष्यों के ज़हरीले दुःखों का प्राशन करके माने पीकर, पचा लेते हैं। समग्र रूप से विश्व के भविष्य को उजालते हैं, प्रकाशित करते हैं। कवि का जगत और जीवन को देखने का नज़रिया आशावादी है। वे ईश को विनती करते है—तू हमारे जीवन कलश को अपने रस से परिपूर्ण कर दे। हमारे बीच कोई पट न हो यही मेरी अभिप्सा है। तुम्हारी कृपा के बिना ये संभव नहीं। आगे कहते है कि हमारे अंतर मन में तुम्हारी दिव्यता का संचरण होगा तभी मनुष्य व्यष्टि से समष्टि अर्थात व्यक्ति की सीमा को लाँघकर विशालता, समग्र में परिहार करेगा। "यात्रा" के इस प्रकार के काव्यों में अर्थ गांभीर्य से अतिरिक्त हृदय को स्पर्श करनेवाला संवेदन भी है। इन रचनाओं में कवि, जगत की स्थूल और विषमता से उपर ले जाकर दृष्टि को ऊर्ध्व में स्थित करते हैं। वे साधक बनकर आध्यात्मिक भूमि पर अनूठे यात्री के रूप में विहार कर रहे हैं।

"भव्य सतार" का अर्थ है भव्य सितार जिस पर हृदय तंत्री की राग-रागिनियाँ झंकृत होती रहती हैं। इस रचना में कवि ने ईश्वर की भव्यता एवं अगम्यता का सुंदर वर्णन किया है। रचनाकार इन्द्रधनुषी सप्त तेज की प्रतीकात्मकता को दृष्टिगत करके कहते हैं कि सात सुरों के तंतु में पिरोकर सितार पर कामोद राग छेड़ते हुए कहते हैं:

"दूर दूर भीतरनी भीतर, ए ज एक झंकार,
कैंक कळ्यो, कैं अकळित तो ये मीठो तुज मल्हार।"8

मेरे मन के अंतर तम में एक ही झंकृति, ध्वनि, मधुरी तान उठती, बजती रहती है। कभी कुछ समझ में आता है तो कभी पता भी नहीं चलता कि ये कौन-सा राग या तान है, पर फिर भी वो मीठी मल्हार राग के समान महसूस होती है। जिसकी रागिनी में अंतस्तल ओतप्रोत हो जाता है।

"तव चरणे", "अहो गगनचारि", "जाग अगनी" में कवि ईश को मिन्नतें करते हैं, हे ईश्वर, हे गगनचारि, हमारे हृदय में तव पद धरकर अर्थात प्रवेश कर, औऱ हमें आपके चरणों में स्थान देकर, हमारे मनोहृदय में छाये तमसवन को भस्मीभूत करके तुम्हारा सारा वैभव हमें दे देना। धरा के अंधकार मे मग्न हम मनुष्य कीटक पर आपका चैतन्यमय हाथ फेरकर, उस अगम्य (भोम) जमीं पर ले जाना।

"प्रतिपदा", "अंगुलि हे", "वसो ऊंचे", "आकर्षणो और नौका" आदि काव्यों में कवि ईश्वर को उद्बोधित करके कहते है---मैं क्षुद्र नौका हूँ और तूं ही मेरा नाखुदा—खेवनहार है। तुम्हारी मृदुल हीरक ज्योत की प्रभा, मेरे हृदय में गूँथ रहे तम के जाल को ध्वंस करेगी, जैसे रत्न को बींधने वाला तेज, चमकीली दृष्टि मुझे तुम दोगे ये मेरी श्रद्धा है। इस दृष्टि को पाने हेतु, मैं अपना सब कुछ आपके चरणों में समर्पित करूँगा। ईश की सर्वोतम झाँकी के लिए मनुष्य को सर्वस्व का त्याग करना ही पड़ेगा। संसार की माया में लिपटे रहने पर उस अगम की झाँकी कभी संभव नहीं। अगर अनकी कृपा दृष्टि रही तो ही जगत का उद्धार होता है। अतः मनुष्य को चाहिए कि उस अगम्य ज्योत की चैतन्यधारा को प्राप्त करने हेतु खुद के अहं को त्यागना या गलाना पड़ता ही है।

कवि को उस सर्व शक्तिमान, ईश्वर पर अडिग श्रद्धा है। उनका कहना है कि इस सृष्टि की मोह माया को हरकर याने छोड़कर ईश्वराभिमुख होना चाहिए। ऐसे भक्तों की वे राह देखता है। "चल" में कवि कहते हैं:

"सुने घाटे बेठो एकल सांवरो, अवळी वाट निहाळे,
अम सरिखा एने झाझाँ मळे ना, बीजा कोने ए पार उतारे रे।"9

कवि का साधक मन पृथ्वी के पट पर की स्थूलता में कहीं नहीं मानता, उन्हें तो अमरज्योत, मुद-सागर और ऋत-मेरू की प्यास, झंखना है। इसीलिए कवि जागृत अवस्था में ही जगत में विचरण-विहार करना पसंद करते हैं। कवि को ये करते हुए ईश्वर की अमर ज्योति का स्पर्श हो चुका है, उनके जीवन में ज्ञान का सुरम्य प्रभात विकसित हो चुका है। व कहते है हरि कृपा ही अजीब शस्त्र है, उसी औजार से मनुष्य विजय प्राप्त कर पाता है। सुंदरम् के गीत अध्यात्मभाव से सभर और ओतप्रोत है।
इन गीतों में विनती, लालसा, मिलन की उत्सुकता, श्रद्धा, भक्ति, परम चित की शांति एवं अरविंद दर्शन की झाँकी प्रस्तुत होती नज़र आती है। इन छोटे-बड़े गीतों में कवित्व और लचीली शैली में ये भाव और मृदु बन पड़े है।

"मनुज-प्रणय" और "ध्रुवपद क्यहीं" जैसे लंबे काव्य प्रमुख भावना के प्रतिनिधि रूप दिखाई देते हैं। "यात्रा", "काव्यमंगला" और "ध्रुवपद क्यहीं" का पाठ करने पर ये प्रतीत होता है कि सुंदरम् का निराशावाद कैसे आशावाद में परिवर्तित हो जाता है। श्री अरविंद की दृष्टि से मानव और जगत का भावी उज्जवल ही है, क्योंकि जो दिव्यता है वह एकदा धरा पर अवतरित होकर खुद की दिव्यता में सब कुछ रंग ही डालेगी। अतः मनुष्य को हताश-निराश होने की आवश्यकता नहीं है। मनुष्य को दिव्यता का संस्पर्श अवश्य होगा। इसी श्रद्धा को आधार मानकर "मनुज-प्रणय" में कवि पुकार उठते हैं:

"हती स्वप्नावस्था? अह सुखद ए केवीक दशा !
मने अंगे अंगे अणुं अणुं महीं को परसतुं
गयुं, एवा शैत्ये झरमर रसों को वरसतुं
रह्युं, एवा जेवा मनुज जगमां क्यां य न वस्या!"10

"ध्रुवपद क्यहीं" में कवि को जीवन का ध्रुवपद प्राप्त हुआ है। उसने ही ऊर्ध्वगति भी की है। उसे ही चैतन्य का स्फुरण हुआ है। उसी ने ही ब्रह्म सुरखी प्राप्त करने का सामर्थ्य पाया है। इस प्रकार कवि का आशावाद चमकता है, जिसमे हृदय का विषाद, उचाट, निराशा भाव विगलित हो चुका है।

"नाचीजनी कहाणी" और "कत्ल की रात" जैसे कथनात्मक काव्यों में कवि कहते हैं कि यदि मनुष्य अपने अहं का त्याग करके ईश्वर पर श्रद्धा रखें तो जीवन रसमय बन पाता है। उनकी जीवनदृष्टि दिव्य एवं उन्नत बन जाती है। "नाचीजनी कहाणी" में कवि कहते हैं:

"ने आंखथी हुँ सृष्टि जोई रह्यो।"11

जहाँ नज़र जाती वहाँ बाग में बाग ज वह्यो, इस पंक्ति में कवि की जगत को निहार ने की उन्न्त जीवन दृष्टि की झाँकी होती है। तो "कत्ल की रात" में कवि ये भी कहते हैं कि जो व्यक्ति विनम्र होकर प्रभु चरण में सर्व समर्पित कर देता है, उसके मस्तक पर ईश्वर कनक मुकुट आरोपित करता है, और उसी क्षण धरा पर सुनहरा प्रभात खिल उठता है।

"दीठी तने" और "तुं आवजे" तथा "हे स्वप्न सुंदर," रचनाओं में कवि की दिव्य तत्व की मधुर छवि का आलेखन किया है। "चित्तपूर्णता" में कवि ने चंपा के सुमन का रहस्य वर्णित किया है। चंपा के पुष्प की पाँच पंखुरियाँ अंतरात्मा को पूर्णता की ओर ले जाती हैं, अभिप्सा, श्रद्धा, समर्पण, भक्ति, सत्यनिष्ठा उसके प्रतीक रूप है। ये पंच तत्व कवि के अध्यात्म विषयक काव्य में दृष्टिगत होते है। और मानव को दिव्यता की झाँकी करवाते हैं।

कुल मिलाकर कह सकते हैं कि "यात्रा" के काव्यों में अध्यात्मवाद की उतकृष्ट भूमिका को निरूपित किया है। परम तत्व को केंद्र में रखकर श्री अरविंद के तत्वचिंतन को प्रशिष्ट काव्यों के माध्यम से रसपूर्ण आस्वाद करवाया है। कवि ने गहन चिंतन पर कवित्व का रंग चढ़ाया है। इससे ये चिंतन गम्य-बोधात्मक बना है। कवि ने अपने अंतर का द्वार खोल कर, संत कवि की, साधक कवि की रूपकात्मक भाषा में ईश्वर की चैतन्यमय दिव्यता को स्पष्ट करने का, समझाने का प्रयत्न किया है। इन रचनाओं का प्रमुख शांत रस है, उसमें निर्मलता, स्वस्थता और सघनता है, शैली प्रवाही, भाषा शिष्ट, संस्कृतनिष्ठ है। "यात्रा" में आनंदलक्षी दर्शन एवं चिंतन है जिसके परिणाम स्वरूप कवि खुद स्थूल से सूक्ष्म में सरक गये हैं। अप्रतिम आनंद, आत्मिक आनंद, ब्रह्मानंद सहोदर आनंद की भी अनुभूति में निमग्न हो गये है।

"यात्रा" के एक-एक पड़ाव पर जो आध्यात्मिक एहसास साँसों के माध्यम से तन के कण-कण में समाया है, जिसने जीवन की ऊर्ध्वगति का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। दैहिक नहीं अपितु ऐहिक आनंद की वर्षा में मैं सराबोर हो गयी हूँ। इसी के परिणाम स्वरूप मेरे जीवन के चिंतन और सोच की दिशा ही बदल गयी है। करुणता अगं-अंग से बरस रही है। यही जीवन की सानंद सार्थकता की अनुभूति, मैं क्षण-क्षण कर रही हूँ। जो भी इस यात्रा के सफ़र पे कदम रखेगा अवश्यमेव चरम आनंद की परिणति करेगा।

आधार ग्रंथ

चुंटेली कविताः सुंदरम—संपा. चंद्रकांतभाई शेठ

संदर्भ ग्रंथ

1. सुंदरम् एटले सुंदरम्, भूमिका (फ्लेप) --- संपा. रामजी कडिया
2. साहित्य स्पर्श, पृ-104---संपा.नवनीत शाह
3. वही,पृष्ठ-107
4. चुंटेली कविताः सुंदरम,पृ-116
5. वही,पृ-108
6. वही,पृ-101
7. वही,पृ-107
8. वही,पृ-110
9. साहित्य स्पर्श, पृ-111
10. चुंटेली कविताः सुंदरम,पृ-84
11. साहित्य स्पर्श, पृ-114

प्रो. जया पटेल
एफ.डी.आर्ट्स कॉलेज, जमालपुर, अहमदाबाद.
संपर्क सूत्र: 9879461479


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