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03.13.2014


गुल की फ़ितरत भी ख़ार सी क्यूँ है

गुल की फ़ितरत भी ख़ार सी क्यूँ है
हर ख़ुशी अश्कबार सी क्यूँ है

उसको पाकर भी रहे हम तन्हा
लग रही जीत हार सी क्यूँ है

पूछती हैं ये धड़कनें मुझसे
बेक़रारी क़रार सी क्यूँ है

दूरियाँ मिट गईं, दिलों में मगर
अब भी कोई दरार सी क्यूँ है

तर्के-ताल्लुक़ किए ज़माना हुआ
ज़िंदगी इंतज़ार सी क्यूँ है

इश्क़ में धूप तो सुहाती है
चाँदनी नागवार सी क्यूँ है

मेरी खामोशियों में रह-रह कर
गूँजती इक पुकार सी क्यूँ है

सारी साँसें नगद ही पाई हैं
फिर भी लगती उधार सी क्यूँ है

दिल ने पूछा है दर्द से 'नर्गिस'
ये ख़लिश ख़ुशगवार सी क्यूँ है


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