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ISSN 2292-9754

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10.20.2017


एक दीप इस दीवाली पर

क्या होता किरनों का होना, कभी नहीं जिसने जाना
एक दीप इस दीवाली पर उस दर पर भी रख आना!!

हँसते-हँसते जिसने अपने सीने पर खायी गोली,
दुश्मन की छाती पर चढ़ कर जय-माँ की जय-जय बोली
संगीनों ने हर मौसम सरहद पर जिसे सलाम किया -
सरहद पर ही मनी उम्र-भर जिसकी दीवाली - होली..
सोया है चिर-मौन जहाँ पर आज़ादी का दीवाना-
एक दीप इस दीवाली पर उस दर पर भी रख आना!!

लिक्खा पुण्य पसीने से जिसने अपना जीवन-लेखा
श्रम की स्याही से निर्मित है जिन हाथों की हर रेखा
भूखा रहा स्वयं, लेकिन जिसने दुनियाँ का पेट भरा -
बुनियादों का पत्थर बन जो रहा हमेशा अनदेखा .
शीश महल के दीप्त-दर्प ने कभी न जिसको पहचाना -
एक दीप इस दीवाली पर उस दर पर भी रख आना!!

युग-युग से जिसके हिस्से मे आयीं हैं केवल रातें
सूरज ने दीं उजियारों की जिसको छूंछी सौगातें
अपने-सा ही समझा जिसने इनको और कभी उनको-
पग-पग मिलती रहीं किन्तु जिसके विश्वासों को घातें .
नई सुबह के इंतज़ार मे भूल गया जो मुस्काना-
एक दीप इस दीवाली पर उस दर पर भी रख आना!


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