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ISSN 2292-9754

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01.27.2015


ज़िंदगी की आँच में तपे हुए मन की अभिव्यक्ति

स्तक : आँख यह धन्य है
अनुवादकर्ता : डॉ. अंजना संधीर
मूल लेखक : नरेन्द्र मोदी
प्रकाशक : विकल्प प्रकाशन
२२२६/बी, प्रथम तल
गली न. ३३ पहला पुस्ता सोनिया विहार, दिल्ली -११००९४
पृष्ठ : ९६
रु : २५०/-

ज़िंदगी की आँच में तपे हुए मन की अभिव्यक्ति है - "आँख ये धन्य है"। गुजराती में यह संकलन "आँख आ धन्य छे" के नाम से २००७ में प्रकाशित हुआ था। हिंदी में इसे आने में यदि सात वर्षों का लंबा समय लगा तो इसकी अनेक वज़हें हो सकती हैं किन्तु इतना निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि नरेंद्र मोदी की ६७ कविताओं की इस किताब में कई कवितायें हैं जो काव्य कला की दृष्टि से अच्छी कही जा सकती हैं। उनके बिम्ब आकर्षक हैं और भाषा सरल। इन कविताओं को पढ़ कर यह भी सहज ही समझ में आ जाता है कि ये नरेंद्र मोदी के जीवन के एक बृहद काल खंड का प्रतिनिधित्व करती हैं। उनका जीवन जिन संघर्षों से गुज़रा उसकी छाया भी इन कविताओं में है। व्यक्ति नरेंद्र मोदी के नेता नरेंद्र मोदी बनने की यात्रा की कथा हैं ये कवितायें। समय के साथ व्यक्ति की सोच बदलती है किन्तु कुछ मूल स्वर बने रहते हैं। हालाँकि उनकी कविताओं ने जीवन के हर पहलू को छुआ है किन्तु मूल स्वर देशभक्ति और मानवता ही है। ये कवितायें एक वीतराग मन का आभास देती हैं, एक ऐसे व्यक्तित्व का भी- जो उच्च आदर्शों को समर्पित है। कविताओं में उनका आत्मविश्वास भी साफ़ झलकता है किन्तु यह आत्मविश्वास ईश्वर पर भरोसा रखने से पैदा हुआ है।
पुस्तक के फ्लैप पर उद्धृत कविता से ही इसका परिचय मिल जाता है -

सर झुकाने की बारी आये
ऐसा मैं कभी नहीं करूँगा
पर्वत की तरह अचल रहूँ
व नदी के बहाव सा निर्मल
........
श्रृंगारित शब्द नहीं मेरे
नाभि से प्रकटी वाणी हूँ
...............

मेरे एक-एक कर्म के पीछे
ईश्वर का हो आशीर्वाद
............
(प्रयत्न, पृष्ठ 69)

भले ही वे राजनीतिक जीवन में प्रवेश कर चुके थे किन्तु प्रधानमंत्री बनाने के पहले लिखी गई हैं ये कविताएँ, अन्यथा उन्हें आश्चर्य न होता! कवि को ख़ुद आश्चर्य है -

अभी तो मुझे आश्चर्य होता है
कि कहाँ से फूटता है यह शब्दों का झरना
कभी अन्याय के सामने
मेरी आवाज़ की आँख ऊँची होती है
तो कभी शब्दों की शांत नदी
शांति से बहती है
(सनातन मौसम, पृष्ठ ९४)

रोज़-रोज़ की ये सभा, लोगों की भीड़, फोटोग्राफरों का समूह, भाषण - इन सबके बीच भी कवि अपना एकांत बचा लेता है -

इतने सारे शब्दों के बीच
मैं बचाता हूँ अपना एकांत
तथा मौन के गर्भ में प्रवेश कर
लेता हूँ आनंद किसी सनातन मौसम का।
(सनातन मौसम, पृष्ठ ९५)

सनातन मौसम - आतंरिक मौन का मौसम ही हो सकता है, अपने "स्व" भाव में स्थित व्यक्ति न तो बाह्य कारणों से विचलित होता है, न प्रभावित। यह भाव किसी योगी मन के पास ही होता है जो बहुत साधना के बाद प्राप्त होता है।

उन्होंने स्वीकार किया है-

दिल में तो देशभक्ति की ज्वाला
है समुद्र में जलती
अग्नि की तरह।
("मल्लाह" शीर्षक कविता पृष्ठ-97)

इस कवि का जीवनधर्म/ कर्म क्या है? जानना चाहेंगे -

भीड़ को मेले में बदल डालना
ही है मेरा जीवन धर्म
-मेरा जीवन कर्म।
...........
(मिलने दो मेले में, पृष्ठ-83)

ऐसा भी नहीं है कि यह व्यक्ति कभी निराश नहीं हुआ, दुखी नहीं हुआ, घबराया नहीं -

ठंडे हुए आँसू में पत्थर का भार है,
कोने पे सितार जिसके टूटे सब तार हैं।
(एकाध आँसू, पृष्ठ ३५)

या फिर

ऊँचे पहाड़ को पाने की कशमकश की
लेकिन पत्थर मिले अंत में जी
..............
सदियों से चाहा नदी को पाना
लेकिन मिले मुझे बुलबुले जी
(कशमकश, पृष्ठ ७३)

प्रेम जीवन में आया और गया। इस कवि का प्रेम मनुष्य मात्र से जुड़ा था इसलिए सीमित नहीं हो पाया -

जल की जंजीर जैसा मेरा ये प्रेम
कभी बांधने से बंधा नहीं .....
(प्रेम, पृष्ठ ७२)

सौंदर्य चाहे प्रकृति का हो, या व्यक्ति के गुणों का, या नारी का, इस कवि ने जीवन के सौंदर्य का अनुभव किया है, उसे सराहा है - धन्य, मन्त्र, विषम सौंदर्य आदि कवितायें इस श्रेणी में रखी जा सकती हैं। अधिकांश कविताओं में स्पष्टवादी कवि की स्पष्ट भाषा के दर्शन होते हैं किन्तु तब भी कई बिम्ब सराहनीय हैं। उदाहरण के तौर पर "प्रतीक्षा" कविता को लिया जा सकता है। सूरज के फूल बन कर उगने की प्रतीक्षा भला किसे न होगी जब तपता सूरज जीवन की गति रोक रहा हो -

आकाश में पत्थर जैसा सूरज उगा
जूट जैसा सारा दिन
बिलकुल खुरदुरा .......
-----
सारी रात सूरजमुखी करती है प्रतीक्षा
आने वाले कल के सूरज की
कि कभी तो सूरज फूल बनाकर उगे !
(प्रतीक्षा, पृष्ठ-67)

नरेंद्र मोदी की कविताओं का फलक विस्तृत है जो जीवन के विविध रंगों - हर्ष-विषाद, जय-पराजय, प्रकृति और मानव प्रेम के बीच फैला हुआ है किन्तु पुन: दुहराना चाहूँगी कि इस पूरी किताब में जो दो स्वर सर्वोपरि हैं वे हैं देशप्रेम और आस्था के। आस्था- ईश्वर के प्रति, जीवन के प्रति, आस्था मनुष्य मात्र को लेकर। इन कविताओं में एक दृढ़ संकल्पवान व्यक्ति के दर्शन होते हैं जो एक विशिष्ट लक्ष्य को लेकर वीतराग भाव से गतिमान है।

वह अपनी कविता में पहले ही कह चुका है -

तुम मुझे मेरी तस्वीर या पोस्टर में
ढूढने की व्यर्थ कोशिश मत करो
मैं तो पद्मासन की मुद्रा में बैठा हूँ
अपने आत्मविश्वास में
अपनी वाणी और कर्मक्षेत्र में।
तुम मुझे मेरे काम से ही जानो
----
तुम मुझे छवि में नहीं
लेकिन पसीने की महक में पाओ
योजना के विस्तार की महक में ठहरो
मेरी आवाज़ की गूंज से पहचानो
मेरी आँख में तुम्हारा ही प्रतिबिम्ब है।
(तस्वीर के उस पार, पृष्ठ ५६)

और अब हम क्योंकि जानते हैं कि यह कवि भारत का प्रधान मंत्री है तो उसकी आँख में भारत की आम जनता का प्रतिबिम्ब मात्र बना ही न रहे वरन सुस्पष्ट हो, यही कामना की जा सकती है।

कविताओं में अनुवाद की गंध नहीं आती तो उसका श्रेय अंजना संधीर जी को जाता है, जो ख़ुद एक समर्थ कवियित्री हैं। बहु भाषाविद अंजना संधीर से यही अपेक्षा भी थी कि वे सहजता से गुजराती में लिखी इन कविताओं की आत्मा में उतर जाएँगी। यह हुआ है!

पुस्तक का कवर सुन्दर है और साज सज्जा आकर्षक। प्रूफ रीडिंग की अशुद्धियों से कोई भी किताब मुक्त नहीं होती किन्तु इस किताब में बहुत कम अशुद्धियाँ हैं, इसके लिए विकल्प प्रकाशन बधाई के पात्र हैं।

विकल्प प्रकाशन २२२६/बी, प्रथम ताल, गली न. ३३ पहला पुस्ता, सोनिया विहार, दिल्ली -११००९४ से प्रकाशित १०४ पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य २५० रुपये है।


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