अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
05.12.2016


यथार्थ के धरातल की कविताएँ और उसकी विविधता : नारायण सुर्वे

"अकेला नहीं आया युग का भी साथ है
सावधान रहना तूफान की यह शुरूआत है
मज़दूर हूँ मैं दमकती तलवार हूँ
सारस्वतों‼ थोड़ा गुनाह करने वाला हूँ।"

(निवडक नारायण सुर्वे- संपादक, कुसुमाग्रज पृ.सं.1)

मज़दूर हूँ मैं दमकती तलवार हूँ की घोषणा करते हुए मराठी कविता में अपनी अलग पहचान बनाने वाले कवि नारायण सुर्वे का जन्म मुंबई में 1926 को हुआ था। जन्म देते ही माँ ने उन्हें कचरे के ढेर के पास मरने के लिए छोड़ दिया। उस अनाथ बालक को गंगाराम सुर्वे नामक मिल मज़दूर ने रास्ते से उठाकर अपने घर में पनाह दी, अपना नाम भी दिया। जन्म से ही संघर्षपूर्ण जीवन जीने वाले नारायण सुर्वे की कविताओं में भी एक प्रकार का संघर्ष और स्थापित व्यवस्था के प्रति आक्रोश दिखाई देता है। उनकी कविताओं में मज़दूरों का संघर्ष है। भूख को मिटाने के लिए बचपन में ही कवि को बाल गिरनी कामगार (मिल मज़दूर) बनना पड़ा। इस प्रकार के संघर्ष भरे जीवन में किसी प्रकार सातवीं कक्षा तक ही पढ़ाई हो पाई। अत्यल्प शिक्षित कवि ने मराठी कविता को नई दिशा देने का कार्य किया। सुर्वे के "ऐसा की मैं ब्रह्‍म", "मेरा विश्वविद्यालय" और "जाहिरनामा" नामक तीन कविता संग्रह प्रकाशित हुए हैं।

प्रगतिशील साहित्य के माध्यम से साहित्य में जो एक नई काव्यधारा चल पड़ी थी, उसका परिणाम यह हुआ कि सर्वहारा, शोषित, पीड़ित, मेहनतकश जनता की संघर्षों-भावनाओं की अभिव्यक्ति साहित्य में होने लगी। चेतन एवं प्रबुद्ध रचनाकार इसी मेहनतकश वर्ग से आते थे जो स्वयं व्यक्तिवाद, शोषण, उत्पीड़न के शिकार थे। अनुभव की प्रमाणिकता पर बल देने वाले इन रचनाकारों में हिन्दी में नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल, मुक्तिबोध, तो मराठी में केशवसुत, मर्ढेकर, करंदीकर, बोरकर, कुसुमाग्रज, शरदचन्द्र मुक्तिबोध आदि। कबीर-नागार्जुन जैसा अक्रोश, व्यंग्य अनुभवों की तल्ख़ अभिव्यक्ति नारायण सुर्वे की कविताओं में मिलती है। सर्वहारा वर्ग के प्रति एक गहरी पक्षधरता तथा ईमानदारी कवि सुर्वे की कविता की विशेषता है। मर्ढेकर और कुसुमाग्रज की परम्परा से अलग कवि की परम्परा है, जिसमें मज़दूरों की दुनिया में पाठक को ले जाकर उसकी पहचान कराती है।

अनेक साहित्यिक आंदोलन उठे और काल की गर्त में समा गए, लेकिन प्रगतिशील साहित्य आज भी अस्तित्व में है, क्योंकि इसमें अनुभव की वह प्रमाणिकता दिखाई देती हैं, जो साहित्य को यथार्थ की धरातल पर खड़ा करती है तथा समाज में व्याप्त विसंगतियों को बिना किसी हिचकिचाहट के साथ अभिव्यक्त करती है। इसीलिए कहा जाता है, वही साहित्य स्थायी होता है, जो समाज को असत्य से सत्य की ओर ले जाता है। प्रगतिशील कविता ने किसानों, मज़दूरों के सामाजिक जीवन को कविता की विषय वस्तु के रूप में प्रतिष्ठित किया और शोषितों की व्यथा, वेदना को वाणी देने का सार्थक प्रयास किया। मराठी कविता में यह कार्य नारायण सुर्वे ने विशिष्टता के साथ किया है। इनकी कविता ने कविता को एक सशक्त सामाजिक दायित्व से जोड़ने का सार्थक प्रयास किया। कैलाशचंद्र पंत कहते है कि "कवि नारायण सुर्वे ने मुंबई के मज़दूर वर्ग, उसकी निर्धनता, वेश्यालय, स्वार्थी दुनिया का व्यवहारीक हिसाब-किताब, फुटपाथ का यथार्थ, झोपड़पट्टियों का नारकीय जीवन, महानगर की संवेदनहीनता, श्रमिकों का होने वाला शोषण, अन्याय, अत्याचार अपनी खुली आँखों से देखा और इसी कारण इन समस्याओं का यथार्थ चित्रण उनकी कविताओं मिलता है। दलित पीड़ित मज़दूर के समूचे जीवन को उन्होंने अपनी कविता में अभिव्यक्ति दी है। निर्धन और साधनहिन, बहिष्कृत, उपेक्षित वर्ग की समस्याओं का प्रतिबिंब उनकी कविता में दिखाई देता है।"

कवि के अनुभव के साथ इन कविताओं के अपने अनुभव हैं। इसीलिए तो "मेरा विश्वविद्यालय" नामक काव्य संग्रह में कवि सुर्वे लिखते हैं "इस संग्रह की कविताएँ सब कुछ बताऐगी, उन्हें ख़ुद का अनुभव है।" अर्थात् कविता को लेकर और कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है। उनकी सत्यता को लेकर कोई प्रमाण देने की, किसी के प्रमाणपत्र की आवश्यकता कवि महसूस नहीं करता है। प्रमाण के लिए प्रमाण देने की क्या आवश्यकता है। जीवन के सड़क पर चलते हुए कवि ने जो दुनिया देखी, समझी उस की अभिव्यक्ति "मेरा विश्वविद्यालय" कविता में होती है

"कितने ही चहरे पढ़े
कितने ही अक्षरों का अर्थ मन में उतारा
पर देखा अनुभव ही सत्य है
जिसके सामने
ग्रंथों के ढेर टिक नहीं पाते हैं
भर-भराकर ढह जाते हैं।"

(निवडक नारायण सुर्वे- संपादक, कुसुमाग्रज पृ.सं.13)

दुःख के कड़वे घूँट पीते हुए कवि ने इसी पाठशाला में यह भी सीख लिया की दुखों को कैसे सहना है। यही कारण है कि सुर्वे की कविता में दुख, व्यथा, वेदना, पीड़ा की मार्मिक अभिव्यक्ति साकार हो उठी है। मुंबई के भीड़ भरे माहौल में मनुष्य अपने आप से ही अजनबी होता जा रहा है। जिनके जीवन में अभाव ही अभाव होता है, जिनकी प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति तक नहीं होती है। ऐसे लोगों के लिए ज़िंदगी बोझ बन जाती है। वे इसलिए जीते हैं कि मृत्यु नहीं आती है। बोझिल और उबाऊ जीवन देखकर लगता है कि ज़िंदगी उन पर थोपी गई है। ऐसे गरीब, निर्धन लोगों के बीच ज़ंग लगी ज़िंदगी जीने वाले रोटी से जले हुए उदास लोगों की "बादेवाही बस्ती" में कवि सुर्वे का जीवन बीता है। कवि का सम्पूर्ण जीवन रोटी-रोज़ी की तलाश में ही बीत गया है। इसीलिए कवि बड़े ही सहज ढंग से कहता है –

"सैंकड़ों बार चाँद उगा, तारे खिले, रात मतवाली हो आई
रोटी का चाँद ढूँढने में ही ज़िंदगी बरबाद हो गई
भट्टी में सेंका जाए फ़ौलाद वैसे ज़िंदगी क्या खूब सेंकी गई
दो दिन राह देखते गुज़र गए : दो दुख में बीत गए।"

(नारायण सुर्वोच्या सम्पूर्ण कविता, पॉप्युलर प्रकाशन, मुंबई)

सुर्वे के अनुभवों से उपजी इन कविताओं को पढ़ते-पढ़ते पाठक मुंबई की बस्तियों, चालों, मुहल्लों और मिलों में पहुँच जाता है। तो कभी जुआरियों के बीच फँस जाता है। कभी वह कवि के स्वर में स्वर मिला कर क्रांति के गीत गाता है, तो कभी पश्‍चाताप में अपने ही बाल नोचने-खींचने लगता है। तो कभी वह वेश्याओं के मुहल्ले में पहुँच जाता है। "नेहरू गए तब की बात" कविता को देख लीजिए, जिसमें वेश्याओं के जीवन को चित्रित किया गया है, जो वास्तविकता के स्तर पर है, क्योंकि कवि जिस मुहल्लों से गुज़रता, जिस समाज में जीवन जीता है, तो वह इस दुनिया से कैसे ख़ुद को अलग कर सकता है। क्योंकि वेश्याएँ भी एक प्रकार से मज़दूरी ही तो कर रही हैं, अपना पेट पालने के लिए। "ला पानी" नामक कविता में वेश्यालय की वेश्याओं का चित्रण किया है। इस कविता में कवि ने वेश्याओं की अपने ग्राहक के प्रति जो ईमानदारी दिखाती हैं, उसे भी दर्शाया है। हर एक ग्राहक के बाद वेश्याऐं स्नान कर लेती है और ख़ुद को शुद्ध करके ही दूसरे ग्राहक के पास जाती हैं। इस संदर्भ में बात करते हुए कवि कहता है कि "मैं वेश्याओं की बस्ती में जाकर, रहकर आया हूँ। वेश्याओं के कमरे में पाँच-पच्चीस देवताओं के फोटो लगे रहते हैं। वे धंधा शुरू करने से पहले उन देवताओं की पूजा करती हैं और फिर जिस्म बेचती हैं।" (सुर्वे यांचे विद्यापीठ,सं.प्रा.पुष्पा राजपुरे,संदर्भ प्रकाशन,ठणे,प्रथम आवृत्ती1993,पृ.सं.278) किस प्रकार से वेश्याएँ अपने ग्राहक को रिझाती हैं। इस की प्रमाणिक प्रस्तुति यहाँ होती है

"चल रे सैंया उधर....
नाच दिखाती रे मिठ्ठू मेरा
मैं रानी और तू बाजा मेरा
वापिस कब आएगा रे तू दिलदारा
छुपके-छुपके
कन्हैया बाँके।"

(माझे विद्यापीठ- नारायण सुर्वे)

"जाहिरनामा" कविता में कवि ईश्वर की सत्ता को अह्वान ही नहीं देता बल्कि ईश्वर का नामों-निशान मिटा देना चाहता है। यहाँ किसी को इन्साफ़ नहीं मिल रहा है। न्याय के स्थान पर सभी धोखेबाज़ बैठ गए हैं और धर्म के नाम पर अपनी झोली भर रहे हैं। हम लोग महाजन की कोठी में जमा होकर कितनी बार ईश्वर के नाम पर लुटते रहेंगे। इसीलिए कवि कहता है

"धर्म : एक झबरीला कुत्ता, टहलता है गली कूचों में
रक्त मेरा; बूँद-बूँद रिसता, फैल रहा है दो ध्रुवों के बीच से।"

(जाहिरनामा- नारायण सुर्वे)

समाज की दुर्दशा को देखकर नारायण सुर्वे कहते हैं कि संसार में हर कोई अपने आदर्श को निर्मित करता है, किन्तु उस आदर्श का ज़िंदगी में आचरण नहीं करता। अपने आप को गाँधीवादी समझनेवाले हर क्षण, पग-पग पर गाँधी के विचारों की हत्या करते हैं। इसी सिद्धांत और व्यवहार के अंतर को कवि ने अपनी कविता में अभिव्यक्त किया है। किस प्रकार से साम्प्रदायिक दंगों में ख़ुद को गाँधीवादी कहने वाले नेताओं ने गाँधी के अहिंसा के सिद्धांत को हिंसा में बदल दिया है। इसे कवि ने सौराज पात्र के माध्यम से चित्रित किया है। साम्प्रदायिक दंगों में हर बार मानवता के पक्षधरों की बली जाती रही है। लाखों बेग़ुनाहों का क़त्ले-आम किया जाता है। यह सब देखकर लगता है –

"अब आदमी हो गया सस्ता, बकरा महँगा हो गया
ज़िंदगी में बेटे, पूरा अँधेरा छा गया
और शब्द को जिलाए रखें
ऐसा है कोई दिलवाला।"

(निवडक नारायण सुर्वे- संपादक, कुसुमाग्रज पृ.सं.27)

नारायण सूर्वे मिल मज़दूर थे। साथ ही वे मज़दूर यूनियन से जुड़े थे, जिस कारण उनका गहरा परिचय कॉ. डांगे के साथ था। उन्हीं के साथ रहकर और यूनियन की सभाओं में कवि कार्ल मार्क्स को समझने लगा। रमेश तेंडुलकर सुर्वे के कविताओं के संदर्भ में लिखते हैं - "नारायण सुर्वे को मार्क्स की पहली पहचान हड़ताल के समय जानकी अक्का के द्वारा "मार्क्सबाबा" ऐसी अर्थात् मार्क्स के ग्रंथों से नहीं, मार्क्स पर दिए गए भाषणों से नहीं, नेताओं के द्वारा भी नहीं, बल्कि एक सर्वसामान्य प्रौढ़, जागरूक स्त्री मज़दूर के माध्यम से होती है।" (सुर्वे यांचे विद्यापीठ, सं. प्रा. पुष्पा राजपुरे, संदर्भ प्रकाशन, ठणे, प्रथम आवृत्ती 1993, पृ.सं.192) अनेक सभाओं को संबोधित करते हुए कवि को कार्ल मार्क्स का प्रतिबिंब उन मज़दूरों में दिखाई देता है। जब भी जुलूस निकाले तब उसी कार्ल मार्क्स का बैनर लेकर कवि चलता है, जिसकी पूरी ज़िंदगी साम्यवादी समाज व्यवस्था और मज़दूरों की आवाज बुलंद करने में बीत गई। अब कार्ल मार्क्स नहीं है, इस समय में हमें ही अब नायक का सूत्र हाथ में लेना होगा। अब अपने प्रश्‍नों को हमें ही मुख वाणी देनी है, क्योंकि

"अब इतिहास के नायक हम ही हैं
अगले सभी चरित्रों के भी।
तभी जोर से ताली उसने ही बजाई
खिलखिलाकर हँसते हुए।"

(निवडक नारायण सुर्वे- संपादक, कुसुमाग्रज पृ.सं.35)

ऐसी बात नहीं है कि कवि किसानों को भूल गया है। जिस प्रकार से कवि ने मिल मज़दूरों की समस्याओं का चित्रण किया है, ठीक उसी प्रकार से किसानों की दयनीयता का चित्रण भी अपनी कविताओं में पूरे यथार्थ के साथ किया है। किस प्रकार से एक किसान कर्ज़ में डूब कर मर जाता है तो उसे कफ़न भी चंदे के पैसे से नसीब होता है। एक कहावत है कि "किसान कर्ज़ में ही जन्म लेता है, कर्ज़ में ही जीता है और कर्ज़ में ही मरता है।" इसी कहावत को इस कविता में चरित्रार्थ रुप से देखा जा सकता है

"एक पुण्य रात में जनमा, एक खकार में ही मर गया
चंदे के कफ़न में लपेट कर चला गया
आगे अक्रंदन करते झाज, पीछे हम कर्ज़ पुत्र
पूरी तरफ पूरे बचे रहे ऋणदाता पुण्य श्‍लोक
समझ पाया तेरहवीं में छू न सका पिण्ड काक..."

(नारायण सुर्वोच्या सम्पूर्ण कविता, पॉप्युलर प्रकाशन, मुंबई)

सूर्वे ने कभी किसी तरह का समझौता कभी नहीं किया। अनेक ठोकरें खा कर भी कभी अपने ईमान का सौदा नहीं किया। और न ही कभी किसी के सामने कभी झुकना कबूल किया। न कभी किसी को फिजूल में काम बनाने के लिए या पुरस्कारों के लिए सलाम किया। कवि ने कभी अपने उसूलों को नहीं छोड़ा, चाहे हाथों बेड़िया पड़ें या ठुकराया जाए। अपने पथ से वे कभी विचलित नहीं हुए। विपरीत स्थितियों में भी अपने लक्ष्य से विचलित न होने वाला व्यक्ति ही दूसरों के जीवन में प्रकाश फैला सकता है। एक समाज सुधारक की भाँति दीन-दुखियों, शोषितों, पीड़ितों में मुक्ति की चाह उत्पन्न करने, उन्हें जगाने का बीड़ा नारायण सुर्वे ने उठाया है। उनकी कविताएँ पाठक से संवाद स्थापित करती हैं। कही कोई शब्दों की छेड़छाड़ नहीं और न ही कोई आडम्बर उत्पन्न करती हैं। इन कविताओं का भाव और कला पक्ष इतना अधिक सशक्त है कि शेष उपादान गौण हो जाते हैं।

हसन पठान
शोधार्थी, हिन्दी विभाग,
कर्नाटक केन्द्रीय विश्वविद्यालय, गुलबर्गा
मो.सं.9480625080,
Email: hasanpathan09@gmail.com


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें