अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
03.05.2018


परदुख कातर

भूख लगी,
मिले न रोटी
घास हरी चरते हैं
झरते आँसू पी पी कर, दिल हल्का करते हैं।

मिली बिछावट काँटों की
लगी चुभन कुछ ऐसे
फूल बिछाते रहे, दर्द
छूमंतर सब कैसे
भूले पीड़ा, औरों का संकट हर लेते हैं
झरते आँसू पी पी कर, दिल हल्का करते हैं।

खटिया खड़ी हमारी की
समझ लिया क्यों दुश्मन
पकड़े गला नासमझी में
छोड़ सका ना दामन
परदुखकातर, औरों की, खुशियों पर मरते हैं
झरते आँसू पी पी कर, दिल हल्का करते हैं।

गिद्ध घूमते,
भले गिरा
कतरा कहीं खून का
हम तो सोये अभी मान
लिपस्टिक नाखून का

नरक मिले पर स्वर्गलोक में कहीं विचरते हैं
झरते आँसू पी पी कर, दिल हल्का करते हैं।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें