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ISSN 2292-9754

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10.14.2018


अन्तर्जाल पर हिन्दी भाषा एवं उसके प्रयोग की समस्याएँ

प्रस्तावनाः

भाषा मनुष्य के समूचे जीवन को अभिव्यक्त करने का माध्यम है। मानव सभ्यता की विकास यात्रा के कई पड़ावों में सूचना प्रौद्योगिकी भी एक पड़ाव है। ज्ञान-विज्ञान का कोई भी क्षेत्र क्यों न हो, उसके केन्द्र में मानव ही है। और इस ज्ञान-विज्ञान को भाषा के माध्यम से ही समझा जा सकता है। भौगोलिक विविधता के कारण बहुभाषी विश्व में एक भाषा में उपलब्ध ज्ञान-विज्ञान दूसरी भाषा के लोगों को कैसे प्राप्त हो, यह एक चुनौती है। इसके समाधान हेतु अनुवाद की भूमिका महत्वपूर्ण है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है अपनी भाषा को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में जीवित रखना।

सूचना प्रौद्योगिकी के केन्द्र में कम्प्यूटर है। कम्प्यूटर के युग में किसी भाषा का विकास कम्प्यूटरीकरण के बिना सम्भव नहीं है। उदारीकरण, भूमण्डलीकरण, निजीकरण, बाज़ारवाद तथा कम्प्यूटरीकरण ने भारतीय सामाजिक व आर्थिक परिवेश, संरचना व भाषाई व्यवहार को प्रभावित किया है। इस परिवर्तन के अनुरूप हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं ने अपने स्वरूप को ढाला है। क्योंकि सूचना प्रौद्योगिकी के दौर में कम्प्यूटर व इंटरनेट के अनुरूप हुए बिना किसी भाषा के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लग सकता है। भाषाई कम्प्यूटिंग की दुनिया में हिन्दी ने बहुत तरक्क़ी की है। अस्सी के दशक में कम्प्यूटिंग की दुनियाँ में प्रवेश से लेकर आज तक हिन्दी ने इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण स्थान बना लिया है। इसके पीछे एक कारण बाज़ार भी है।

हिन्दी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अंग्रेज़ी के विकल्प के रूप में विकसित हो रही है। “इंटरनेट पर हिन्दी अपनी उपस्थिति दर्ज कर चुकी है। यह सिद्ध हो चुका है कि हिन्दी किसी भी उच्च भू-तकनीक के अनुकूल है। हिन्दी की वेबसाइटों की संख्या जिस अनुपात में बढ़ रही है उसी अनुपात में इसके पाठकों की संख्या भी बढ़ रही है। लेकिन अभी हिन्दी को नेट पर बहुत लम्बा सफ़र तय करना है। इसके मार्ग में अनेक तकनीकी बाधाएँ हैं।” (हिन्दी के भविष्य में इंटरनेट की भूमिका) वैश्विक ग्राम की अवधारणा के पीछे सूचना क्रांति की शक्ति ही है। इंटरनेट के माध्यम से हिन्दी का नया तकनीकी भाषाशास्त्र निर्मित हुआ है। इस भाषाशास्त्र के स्वरूप को तकनीकी रूप में विकसित किया गया है। ऐसा नहीं कि इस भाषा के तकनीकी विकास से हिन्दी भाषा की मूल संरचना विघटित हुई हो, भाषा का शास्त्रीय स्वरूप वही है। जैसे उसकी शब्द संरचना, वाक्य संरचना इत्यादि। कहने का भाव यह है कि हिन्दी भाषा की इलैक्ट्रॉनिक लिपि का विकास हुआ है। इस तकनीकी लिपि को विकसित करने में कई लिपिकारों का सराहनीय योगदान है। उन्होंने हिन्दी भाषा को इंटरनेट के माध्यम से वैश्विक पहचान दिलाने के लिए अनेक सॉफ़्टवेयरों का निर्माण किया। इनमें प्रमुख हैं विनय छलजानी, हेमन्त कुमार, वासु श्रीवास्तव, बालेन्दु शर्मा दाधीचि, देवेन्द्र पारख, प्रो. रघुनाथ कृष्ण जोशी, अभिषेक चौधरी और श्वेता चौधरी, हरिराम पंसारी, आलोक कुमार, कुलप्रीत सिंह, राघवन एवं सुरेखा, रमण कौल, रवि रतलामी, श्रीश बेंजवाल, पूर्णिमा वर्मन, आलोक कुमार, विनय जैन, देबाशीष, पंकज नरूला, संजय बेंगाणी, प्रतीक पाण्डे, हर्षित वाणी, वनागार्जुन वेन्ना, जी. करुणाकर, मितुल पटेल, नारायण प्रसाद एवं अनुनाद सिंह, ईस्वामी, हिमांशु सिंह, रजनीश मंगला, राजेश रंजन, ललित कुमार, मैथिली गुप्त, गोरा महंती, सचिन जोशी तथा जीतेन्द्र शाह सहित अनेक तकनीकी संस्थानों व भारत सरकार का महत्वपूर्ण योगदान है।

अन्तर्जाल पर हिन्दी भाषा की विकास यात्राः

अस्सी के दशक में हिन्दी भाषा ने कम्प्यूटर की दुनियाँ में प्रवेश किया था। तब से लेकर आज तक की उसकी तकनीकी यात्रा का संक्षिप्त ब्यौरा इस प्रकार से है। सन् 1983 में डॉस के माध्यम से हिन्दी ने कम्प्यूटर की दुनियाँ में प्रवेश किया था। इस समय अक्षर, शब्द रत्न जैसे वर्ड प्रोसैसरों का निर्माण किया गया। इसी वर्ष सी. डैक द्वारा जिस्ट का विकास किया गया। वर्ष 1986 में भारतीय भाषाओं के लिए इनस्क्रिप्ट कुंजीपटल का मानक रूप स्वीकृत किया गया।

1991 में यूनिकोड का अविर्भाव हुआ। जिसमें नौ भारतीय लिपियों देवनागरी, बंगाली, गुजराती, गुरुमुखी, तमिल, तेलगु, कन्नड़, मलयालम तथा उड़िया शामिल थी। यूनिकोड के आगमन से अंग्रेज़ी आदि यूरोपीय भाषाओं की तरह कम्प्यूटर पर सभी एप्लीकेशन्स में हिंदी का प्रयोग संभव हो सका। विंडोज़ 1997, माइक्रोसॉफ़्ट ऑफ़िस 1990 तथा माइक्रोसॉफ़्ट ऑफ़िस प्रोफ़ेशनल 1993 आने के बाद 8-बिट हिंदी फ़ॉण्टों से विन्डोज़ में हिंदी में वर्ड प्रोसेसिंग संभव हो सका।

वर्ष 2000 में लीप ऑफ़िस से सम्पूर्ण भारतीय भाषी सॉफ़्टवेयरों का निर्माण हुआ। 1994 के आस पास इंटरनेट पर रोमन, इमेज फ़ाइल्स और बाद में डायनेमिक फ़ॉण्टों के माध्यम से हिंदी का पदार्पण हुआ। इसी वर्ष सी. डेक. लीप ऑफ़िस, श्रीलिपि तथा अक्षर फ़ॉर विंडोज़ आदि वर्ड प्रोसैसरों का आगमन भी हुआ। 14 सितम्बर 1996 में हिंदी दिवस के अवसर पर तत्कालीन रक्षामंत्री मुलायम सिंह यादव ने पी.सी. डॉस के हिंदी संस्करण का विमोचन किया। जिसमें हिंदी प्रोग्रामिंग भाषा भी शामिल थी।

सन् 2000 के आसपास हिंदी समाचार पत्रों ने यूनिकोड के माध्यम से इंटरनेट पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। सी. डेक के हिंदी ऑपरेटिंग सिस्टम की शुरूआत भी इसी वर्ष हुई। विंडोज़ 2000 और माइक्रोसॉफ़्ट ऑफ़िस के दक्षिण एशिया संस्करण में हिंदी समर्थन प्रदान किया गया। सन् 2002 में लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम और अन्य प्रोग्रामों के हिन्दीकरण की शुरूआत हुई इसी के साथ जुलाई 2003 में विकीपीडिया की शुरूआत भी हुई। इसी वर्ष हिंदी (बहु भाषाई) लीनिक्स ऑपरेटिंग सिस्टम जारी किया गया। तथा हिंदी वर्तनी जाँच सुविधायुक्त माइक्रोसॉफ़्ट ऑफ़िस सूईट हिंदी में जारी किया गया। इसी के साथ ओपन ऑफ़िस का हिदी इंटरफ़ेस युक्त संस्करण 1.1 भी प्रयोग में लाया गया। श्रीलिपि, अक्षर नवीन ने यूनिकोड संस्करणों के साथ-साथ एकाउंटिंग सॉफ़्टवेयर टैली का हिंदी संस्करण जारी किया।

2003 से इंटरनेट पर हिंदी के ब्लॉग्स की शुरूआत होती है। जी-मेल के माध्यम से हिंदी में ई-मेल की शुरूआत इसी वर्ष हुई। सन् 2004 मे रैड हैट ने पाँच भारतीय भाषाओं के लिए लोहित फ़ॉन्ट जारी किए। 2005 में माइक्रोसॉफ़्ट एक्सपी ऑपरेटिंग सिस्टम का विशेष हिन्दी का स्टार्टर संस्करण जारी किया गया, तथा 2006 में माइक्रोसॉफ़्ट, एम.एस.एन. तथा याहू हिन्दी में अवतरित हुए। जनवरी 2007 में विंडोज़ विस्ता का पहला संस्करण जारी किया गया। जिसमें हिन्दी सर्मथन भी शामिल था। यह बाई डिफ़ाल्ट लागू रहता है, तथा इसके लिए अलग से कोई सेटिंग नहीं करनी पड़ती है। टंकण करने के लिए केवल की बोर्ड जोड़ना पड़ता है। मार्च 2007 में गूगल हिन्दी समाचार सेवा का शुभारम्भ हुआ। इसी वर्ष जुलाई माह में सी. डैक पर हिन्दी का श्रुतिलेखन सॉफ़्टवेयर का विमोचन किया गया और अक्टुबर माह में गूगल ट्रांसलेशन तकनीक से गूगल सर्च में रोमन शब्द टाइप करने से हिन्दी में परिणाम प्राप्त होने लगे। मई 2008 में गूगल ट्रांसलेट से हिन्दी भाषा से व हिन्दी भाषा को अन्य प्रमुख विदेशी भाषाओं में अनुवाद की सुविधा प्राप्त हुई। अगस्त 2009 में हिन्दी विकीपीडिया पर 40 हज़ार लेख प्रकाशित या संपादित हो चुके थे। इसी वर्ष आइकैन (ICANN) ने सिनोल में देवनागरी सहित कुछ अन्य विदेशी लिपियों का यूआरएल में प्रयोग करने की अनुमति दे दी। सन् 2010 में ब्लैकबेरी ओएस संस्करण 6 में हिन्दी प्रदर्शन समर्थन एवं हिन्दी वर्चुअल की बोर्ड आया। 3 मई 2011 को टचस्क्रीन डिवाइसों पर हिन्दी टंकण हेतु टचनागरी नामक ऑनलाइन हिन्दी की बोर्ड जारी किया गया। इसके साथ ही आइओएस 4 में पूर्ण हिन्दी प्रदर्शन आया। अक्टुबर 2010 में हिन्दी रुपया चिह्न यूनिकोड में शामिल किया गया। सन् 2011 से गूगल बुक्स हिन्दी में उपलब्ध होती हैं तथा अरविन्द कुमार ने हिन्दी-अंग्रेज़ी-हिन्दी समानान्तर कोश अरविन्द लैक्सिकन ऑनलाइन किया। अपै्रल 2011 में भारत सरकार के वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग ने हिन्दी शब्दावलियाँ ऑनलाइन जारी कीं।

जून 2011 को इन्स्क्रिप्ट की बोर्ड ले आउट द्वारा चाण्क्य, कुर्तिदेव, मुगल इत्यादि नॉन-यूनिकोड फाण्टों में टाइप करने के लिए पहली इनपुट विधि ई-पण्डित आइएमई जारी की गई। यह हिन्दी के प्रति हमारी प्रतिबद्धता ही थी कि 30 अगस्त 2011 तक हिन्दी विकीपीडिया पर लेखों की संख्या एक लाख से ऊपर पहुँच चुकी थी। 2011 को हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में ट्विटर हिन्दी में जारी किया गया, तथा अक्टुबर 2011 तक एण्ड्राइड 4.0 में काफ़ी हद तक हिन्दी, तमिल तथा बंगाली समर्थन आया। इसके साथ ही लोहित देवनागरी हिन्दी फ़ॉन्ट भी शामिल किया गया। 2012 में फ़ायरफ़ॉक्स का मोबाइल ब्राउज़र हिन्दी में जारी हुआ। इंटरनेट पर हिन्दी की इस दीर्घ विकास यात्रा का क्रम निरंतर जारी है।

आज इंटरनेट पर हिन्दी का साम्राज्य विकसित होता जा रहा है। इंटरनेट पर हिन्दी में काम करने के लिए अनेक साधन मौजूद हैं। जैसे-ई कलम, गूगल इण्डिक ट्रांसलेटर, गमभन, हाई-ट्रांस, भोजपत्र, यूनिनागरी, यूनिस्क्रिप्ट, हिन्दी कलम, माध्यम, सलेटी, शिवालय हिन्दी वर्तनी लेखनी, राइट क, कुशीनारा, हिन्दी तूलिका, लूकीज, तख्ती, हिन्दी टूलकिट इत्यादि। इनके माध्यम से हिन्दी भाषा का विकास कम्प्यूटर के अनुरूप या इंटरनेट के अनुरूप हुआ है।

अन्तरजाल पर हिन्दी साहित्यः

आज इंटरनेट पर हिन्दी के कई समाचार पत्र एवं पत्रिकाएँ प्रकाशित हो रही हैं। समाचार पत्रों में ट्रिब्यून, दैनिक भास्कर, अमर उजाला, नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान दैनिक, नव भारत अखबार, वेब दुनिया, राष्ट्रीय सहारा, दैनिक जागरण, पंजाब केसरी, राजस्थान पत्रिका, यूनीवार्ता, लोकमंच, सरस्वती पत्र, हरिभूमि, आज, उत्तरांचल टाइम्स, हिन्दी लोक, हिन्दी टाइम्स, रविवार, प्रभात खबर, गूगल हिन्दी समाचार, तथा पत्रिकाओं में अक्षर पर्व, अनुभूति, सृजनगाथा, गर्भनाल, हिन्दी समय, साहित्य कुंज, अन्यथा, अभिव्यक्ति, कलायन, कृत्या, गृहलक्ष्मी, तरकश, ताप्तीलोक, पाखी, प्रवक्ता डॅाट कॉम, भारत दर्शन, मधुमती, रंगवार्ता, वागर्थ, हंस, शोध संचयन, शब्द ब्रह्म इत्यादि साहित्यिक व ग़ैर साहित्यिक प्रमुख हैं। इनके अतिरिक्त ब्लॉग्स, फ़ेसबुक, यू टयूब इत्यादि सोशल साइट्स भी हिन्दी भाषा में विचारों के आदान-प्रदान का माध्यम बन रही हैं। इंटरनेट पर हिन्दी साहित्य की बात की जाए तो हिन्दी में गुणात्मक साहित्य या सामग्री का औसतन अभाव ही है। जैसे यदि हम किसी विषय पर कोई सामग्री प्राप्त करना चाहें तो बहुत कम सामग्री उपलब्ध होती है। हिन्दी भाषा की अपेक्षा अंग्रेज़ी में अधिक साहित्यिक सामग्री उपलब्ध होती है। हिन्दी समय डॉट कॉम, हिन्दी कविता कोश, हिन्दी गद्य कोश, राजभाषा आयोग सहित तमाम वेब साइट्स हिन्दी साहित्य के संरक्षण एवं संवर्धन में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। चाहे अमीर खुसरो हों, तुलसीदास हों, रहीम हों, प्रसाद हों या संस्कृत साहित्य के ग्रंन्थ हों लगभग सभी का ऑनलाइन संस्करण आज उपलब्ध हो जाता है।

अन्तरजाल पर हिन्दी के प्रयोग की चुनौतियाँ बनाम समस्याएँ:

इंटरनेट पर हिन्दी का प्रयोग तभी सम्भव है जब तक हम उन बुनियादी चुनौतियों या तकनीकी बारीकियों से अवगत नहीं होंगे। इसके लिए सबसे आवश्यक चीज़ है किसी भी व्यक्ति को कम्प्यूटर का ज्ञान। तत्पश्चात् उसके तकनीकी दाँवपेचों से अवगत होना। यदि हम इस कड़ी को पार कर भी जाएँ तो और भी कई समस्याओं का सामना इंटरनेट प्रयोगकर्त्ता को करना पड़ता है।

  1. हिन्दी में विकसित अनेक लिपियों यथा चाणक्य, कुर्तिदेव, मुगल, शुषा इत्यादि में मानकता नहीं है। एक लिपि के लिए प्रयुक्त अक्षर चिह्न दूसरी लिपि में कुछ और बन जाता है। जबकि रोमन लिपि में इस प्रकार की अव्यवस्था नहीं रहती है। हिन्दी भाषा के यूनिकोड का अविष्कार तो किया गया है लेकिन जब तक इसका समुचित ज्ञान प्रयोगकर्त्ता को नहीं हो जाता तब तक यह एक चुनौती ही है।

  2. किसी विशेष फ़ॉण्ट में प्रेषित सामग्री प्राप्तकर्त्ता के कम्प्यूटर में तभी पठनीय होगी जब उसके कम्प्यूटर में वही फ़ॉण्ट इन्सटॉल होगा जिसमें प्रेषक ने टंकण किया है। अतः हिन्दी में मानक फ़ॉण्ट की आवश्यकता है। मंगल, कृर्तिदेव, शुषा इत्यादि फ़ॉण्ट एक दूसरे के पूरक नहीं हैं। इनके की बोर्ड में मानकता नहीं है।

  3. इसके अलावा कई संयुक्त अक्षरों जैसे ड्ढ ्य द्द ह्न ट्ट ट्ठ ड्ड न्न द्भ त्त्‍ इत्यादि के लिए की बोर्ड पर कोई संकेत नहीं होता है। इसके लिए इन्सर्ट में जाकर सिम्बल क्लिक करके उस अक्षर या चिह्न को सलेक्ट कर लिखा जाता है। या फिर शॉर्टकट की बनाई जाती है। इससे समय बर्बाद होता है। कम्प्यूटर का सामान्य ज्ञान रखने वाले लोगों को यह मुश्किल भरा काम है।

  4. इंटरनेट पर हिन्दी का प्रयोग या हिन्दी में काम करना तभी सम्भव है जब कम्प्यूटर पर हिन्दी से सम्बन्धित उपयुक्त सॉफ़्टवेयर इंस्टॉल हों, या इनकी जानकारी उपलब्ध हो। शुरू में कम्प्यूटर की भाषा अंग्रेज़ी थी आज भी है। व उसमें उपयोग की विधि Help अंग्रेज़ी भाषा में ही है। अंग्रेज़ी का ज्ञान रखने वाला operator manual द्वारा कम्प्यूटर का उपयोग करना सीखता है। यदि यह manual हिंदी भाषा में उपलब्ध हो या कम्प्यूटर की मूल भाषा हिन्दी हो तो इसे सीखने में कोई कठिनाई नहीं होगी। आज हिन्दी के अनेक सॉफ़्टवेयर या फ़ॉण्ट्स की बात की जाती है। लेकिन उसका मानक रूप नहीं है। किसी भी पीढ़ी के कम्प्यूटर में अंग्रेज़ी भाषा में कोई भी फ़ाइल खोली जा सकती है। उस पर टाइप किया जा सकता है। लेकिन अधिकांशतः यूनिकोड को पुरानी पीढ़ी के कम्प्यूटर स्पोर्ट नहीं करते हैं अगर हम इंटरनेट पर उपलब्ध किसी हिन्दी की सामग्री को कॉपी करके नई फ़ाइल में पेस्ट करें तो वह हिन्दी लिपि में नहीं दिखता है। मात्र चौकोर डब्बे दिखाता है। पूरे के पूरे बेब पेज को सेव ऐज़ करके सेव तो किया जा सकता है लेकिन कॉपी पेस्ट नहीं कर सकते।

  5. तकनीकी विकास की प्रक्रिया इतनी तीव्रतर है कि एक के बाद एक उच्चतम मॉडल बाज़ार में पहुँच जाते हैं। आम आदमी के पास इतना पैसा नहीं होता कि वह हर वर्ष या नया कम्प्यूटर ख़रीद सके। उसे तो अपने पुराने कम्प्यूटर में ही उच्च तकनीकी सुविधाएँ उपलब्ध होनी चाहिएँ। जो अक्सर असम्भव होती हैं।

  6. भारत सूचना और प्रौद्योगिकी उद्योग में अग्रणी स्थान पर है। हर साल देश को आई. टी. के खाते में अरबों रुपये का राजस्व प्राप्त होता है। लेकिन कम्प्यूटर के किसी भी पाठ्यक्रम में आज तक सूचना विनिमय के लिए भारतीय मानक और अन्तर्राष्ट्रीय स्तरीय लिपि मानक यूनिकोड को भी एक विषय के रूप में शामिल नहीें किया गया है।

  7. भारतीय परिवेश में कम्प्यूटर का शिक्षण हिन्दी माध्यम से नहीं किया जाता है। क्योंकि जब तक साहित्य के अतिरिक्त चिकित्सा, विज्ञान, तकनीकी, विधि इत्यादि विषयों का अध्ययन अंग्रेज़ी की बजाय हिन्दी माध्यम नहीं हो जाता तब तक हिन्दी का तकनीकी रूप से सम्पूर्ण विकास सम्भव नहीं है। हमें अंग्रेज़ी के लबादे को त्यागना होगा। अंग्रेज़ी मानसिकता को बदलना होगा।

  8. हिन्दी भाषा का साहित्यिक रूप के अतिरिक्त प्रयोजमूलक दृष्टिकोण से प्राथमिक स्तर से ही अध्यापन किया जाना चाहिए। इस दिशा में सी.बी.एस.सी. के पाठ्यक्रम में 11वीं एवं 12वीं कक्षाओं में प्रयोजनमूलक हिन्दी को पढ़ाया जा रहा है। हिन्दी का प्रयोजमूलक अध्ययन ही उसे रोजगार परक बना सकता है।

  9. कम्प्यूटर को अपडेट करने के लिए प्रचलित नये सॉफ़्टवेयर इंस्टाल करते समय परेशानी का सामना करना पड़ता है। कई बार कम्प्यूटर उन्हें स्पोर्ट ही नहीं करते हैं।

इंटरनेट अब हमारे जीवन का एक अहम हिस्सा बन चुका है। आज हर काम ऑनलाइन हो रहा है। ई-बैंकिंग, ई-कॉमर्स, ई-गवर्नेंस, ऑन लाइन एडमिशन, नौकरी के लिए आवेदन, हवाई जहाज़ की टिकट, रेलवे की टिकट बुक कराना इत्यादि सुविधाओं ने श्रम और समय की बचत की है। इंटरनेट के माध्यम से कई विश्वविद्यालयों द्वारा दूरस्थ शिक्षा ऑन लाइन शिक्षा दी जा रही है। कई सरकारी, अर्ध सरकारी व निजी संस्थानों की वेबसाइट्स भी हिन्दी में उपलब्ध हैं। आज भी भारतवर्ष में ऐसे कई गाँव हैं जहाँ तक अख़बार की पहुँच नहीं है, ऐसे में इंटरनेट की बात कैसे की जाएँ। टी.वी. और रेडियो उसका विकल्प हैं। हाँ, मोबाइल ने कुछ हद तक यह कमी पूरी की है। भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय तथा राजभाषा विभाग ने हिन्दी के विकास मेें महत्वपूर्ण काम किया है। राजभाषा विभाग की वेबसाइट्स पर हिन्दी शिक्षण तथा अनुवाद, श्रवणलेखन तथा यूनिकेाड इत्यादि सॉफ़्टवेयर उपलब्ध हैं।

इंटरनेट पर हिन्दी के पोर्टल अब व्यावसायिक रूप से आत्मनिर्भर हो रहे हैं। कई दिग्गज आई.टी. कम्पनियाँ चाहे वह याहू हो, गूगल हो, या कोई और ही, सभी हिन्दी को अपना रही हैं। इसके पीछे मुख्य कारण बाज़ार है। लेकिन परोक्ष रूप से यह हिन्दी के लिए अच्छा ही है। माइक्रोसॉफ़्ट के डेस्कटॉप उत्पाद हिन्दी में उपलब्ध हैं। IBM सन माईक्रो सिस्टम, ओरक्स आदि ने भी हिन्दी को अपनाना शुरू कर दिया है। इंटरनेट एक्सप्लोरर, नेटस्केप, मोज़िला, क्रोम आदि इंटरनेट ब्राउज़र भी खुलकर हिन्दी का समर्थन कर रहें है। आम कम्प्यूटर उपभोक्ताओं के लिए कामकाज से लेकर डाटाबेस तक हिन्दी में उलब्ध हैं। (समिधा फ़ाउण्डेशन, सूचना प्रौद्योगिकी युग और हिन्दी का वर्चस्व)

सबसे बड़ी बात है इच्छाशक्ति की। जहाँ चाह वहाँ राह। एक मोबाइल सेट का प्रयोगकर्त्ता एक दो दिन में ही पूरी तरह उसका उपयोग करना सीख जाता है। क्योंकि वह उसके सभी फ़ंक्शनों को ध्यान से करने की कोशिश करता है। यही जिज्ञासा इंटरनेट पर हिन्दी के प्रति भी होनी चाहिए, तभी हिन्दी वैश्विक चुनौतियों का खुलकर सामना कर सकेगी।

संदर्भः इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री।

डॉ. हरेन्द्र सिंह
मकान नंबरः 164, ब्लॉक-सी
पंजाब विश्वविद्यालय परिसर,
सेक्टर-14, चण्डीगढ़।
ई-मेल: hsnegi08@yahoo.co.in


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