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ISSN 2292-9754

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06.14.2016


वृद्धावस्था

समीक्ष्य पुस्तक : वृद्धावस्था विमर्श
लेखक : चंद्रमौलेश्वर प्रसाद
संपादक : ऋषभदेव शर्मा
प्रकाशक : परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद
संस्करण : 2016
पृष्ठ : 96
मूल्य : ₹ 100

काल की गति क्षिप्र है। वह इतनी शीघ्रता से चला जाता है कि उस पर किसी की दृष्टि नहीं जाती। एक नवजात शिशु कब अपनी शैशवावस्था छोड़कर युवावस्था में पहुँचा और कब वृद्धावस्था में, यह पता ही नहीं चलता। मानव विकास मनोविज्ञान के अनुसार 0-3 वर्ष की आयु शैशवकाल है, 4–12 वर्ष की आयु बाल्यकाल, 13–20 वर्ष की आयु युवावस्था, 20–40 वर्ष की आयु जवान युवावस्था, 40–65 वर्ष की आयु माध्यमिक युवावस्था तथा 65 वर्ष से वृद्धावस्था है। वृद्धावस्था से कोई बच नहीं सकता। यह जीवन का सत्य है लेकिन मनुष्य वृद्धावस्था की कल्पना मात्र से ही डर जाता है, निराश हो जाता है और सब चीज़ों से कटा हुआ महसूस करता है। कहा जाए तो वह केंद्र से परिधि की ओर चला जाता है। उपेक्षित हो जाता है; समाज से, परिवार से और यहाँ तक कि अपने आप से।

वस्तुतः वार्धक्य कोई अभिशाप नहीं, बल्कि वह जीवन की चरम स्थिति है। अर्थात जीवन के विकास की चरमावस्था है वृद्धावस्था। पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का कथन है कि "इस अवस्था में लोगों के सभी भाव रस के रूप में परिणत होकर आनंदमय हो जाते हैं।" युवावस्था में प्रायः आडंबरप्रियता और प्रदर्शनप्रियता को देखा जा सकता है लेकिन वृद्धावस्था में यह सब नहीं रह जाते। वृद्धावस्था का सच्चा आनंद आत्मसंतोष है। जिस व्यक्ति को भविष्य की कोई चिंता नहीं रहती वे वृद्ध होते हैं। कहने का आशय है कि 75-80 वर्ष के होने पर भी जिस व्यक्ति को भविष्य की चिंता होती है वह युवा ही है, क्योंकि उसे कार्यों को पूर्ण करने की चिंता जीवन में कुछ और बेहतर करने के लिए प्रेरित करेगी।

जैसे-जैसे मनुष्य अपने आपको वृद्ध मानने लगता है, वह कमज़ोर महसूस करने लगता है तथा सहानुभूति अर्जित करने की इच्छा रखता है। धीरे-धीरे वह परिधि की ओर जाने के लिए विवश हो जाता है। केंद्रापसारी हो जाता है। यहाँ तक कि उसका अस्तित्व भी ख़तरे में पड़ जाता है। प्रायः यह देखा जाता है कि जब तक व्यक्ति परिवार के लिए कमाने का यंत्र है तब तक उसकी चलती है लेकिन जैसे ही उसका शरीर उसका साथ देना छोड़ देता है वैसे ही परिवार के सदस्यों के लिए वह एक "बेकार चीज़" बन जाता है। ऐसे में उसका अस्तित्व भी ख़तरे में पड़ जाता है। ऐसी स्थिति में उनका कुंठित होना स्वाभाविक है। भारत के परिप्रेक्ष्य में वृद्धों की स्थिति दयनीय नहीं है। यहाँ बड़ों का मान-सम्मान किया जाता है। इसीलिए कहा गया है, "अभिवादन शीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः / चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्"। अर्थात प्रतिदिन बुज़ुर्गों को प्रणाम करने और उनकी सेवा करने वाले व्यक्ति की आयु, विद्या, कीर्ति और शक्ति की वृद्धि होगी। लेकिन आजकल यहाँ भी स्थितियाँ बदल रही हैं। मूल्य बदल रहे हैं। परिवार का विघटन हो रहा है। वार्धक्य समस्या बनने लगी है। जैसे-जैसे मनुष्य बुढ़ापे की ओर चलता है वैसे-वैसे अकेलापन, संत्रास, भय और असुरक्षा आदि उसको घेर लेते हैं। दरअसल उन्हें सुरक्षा और स्नेह की आवश्यकता है। वृद्धों के मनोविज्ञान को समझना काफ़ी नहीं है बल्कि आज के परिप्रेक्ष्य में उनके पुनर्वास का प्रश्न प्रबल हो उठा है।

आज के उत्तरआधुनिक समय में लोगों की दृष्टि हाशियाकृत समुदायों पर पड़ी। स्त्री, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक के साथ-साथ अब वृद्धों पर भी ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। वृद्धावस्था विमर्श उभरकर सामने आया है। लेकिन सिमोन द बुआ (9 जनवरी, 1908–14 अप्रैल, 1986) ने 1950 से ही वृद्धावस्था पर चिंतन-मनन करना शुरू कर दिया था। 1970 में प्रकाशित उनकी शोधपूर्ण कृति "ला विएलेस्से" (फ्रेंच) इसका प्रमाण है। "ला विएलेस्से" का अंग्रेज़ी अनुवाद "ओल्ड एज" (पैट्रिक ओ ब्रेन) 1977 में प्रकाशित हुआ। "यह कृति वस्तुतः सिमोन की भविष्योन्मुखी विश्वदृष्टि का प्रमाण है और वृद्धावस्था विमर्श की गीता है।" (ऋषभदेव शर्मा, नहि नहि रक्षति डुकृञ करणे (संपादकीय), वृद्धावस्था विमर्श, चंद्रमौलेश्वर प्रसाद, पृ. 9)। चंद्रमौलेश्वर प्रसाद (7 अप्रैल, 1942–13 सितंबर, 2012) ने इस पुस्तक का सार-संक्षेप अपने ब्लॉग "कलम" (cmpershad.blogspot.in) में लिखना प्रारंभ किया। "इस सार-संक्षेप की पहली किस्त 18 अगस्त, 2010 को तथा अंतिम (दसवीं) किस्त 30 दिसंबर, 2010 को प्रकाशित हुई।" (वही, पृ. 12)।

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद "स्रवंति" के नियमित पाठक और लेखक थे। वे ऐसे पाठक थे जो निष्पक्ष भाव से, मुक्तकंठ से नए कलमकारों को सारहते थे और उन्हें प्रोत्साहित करते थे। और ऐसे लेखक जिनकी रचनाएँ पाठकों को गुदगुदाने के साथ-साथ सोचने पर बाध्य करती थीं। वे एम.कॉम. के विद्यार्थी थे। रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया में असिस्टेंट मैनेजर थे लेकिन हिंदी और अंग्रेज़ी साहित्य के प्रति उनका रुझान था। उन्होंने अनेक विदेशी भाषाओं की कहानियों को हिंदी में अनुवाद किया। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित उनकी समीक्षाओं के साथ-साथ, हास्य-व्यंग्य, संस्मरण, पैरोडी, रेखाचित्र, आलोचना, पत्र, कविता, हाइकु आदि को पाठकों ने ख़ूब सराहा है। ऋषभदेव शर्मा ने स्पष्ट किया कि उनकी "वृद्धावस्था विमर्श" को "पुस्तकाकार प्रकाशित करने की योजना बना ही रहे थे कि काल ने अकाल ही चंद्रमौलेश्वर जी को हमसे छीन लिया!" (वही)। अंततः उनके मृत्यु के चार वर्ष बाद अर्थात 2016 में नजीबाबाद के परिलेख प्रकाशन ने इसे पुस्तकाकार प्रकाशित कर पाठकों को और शोधार्थियों को उपलब्ध कराया है। मैं यह भी स्पष्ट करना चाहती हूँ कि "वृद्धावस्था विमर्श" स्तंभ के अंतर्गत "स्रवंति" अप्रैल 2011 में इसकी पहली किस्त प्रकाशित हुई तथा जून 2012 में अंतिम दसवीं किस्त। उन दस किस्तों/ अध्यायों के शीर्षक हैं – वृद्धावस्था विमर्श की पीठिका, वृद्धावस्था और जीवविज्ञान, वृद्धावस्था : मानवजाति विज्ञान, वृद्धावस्था : ऐतिहासिक समाजों में, वृद्धावस्था : आधुनिक समाजों में, वृद्धावस्था का भ्रम और सच, वृद्धावस्था : समय, क्रियाशीलता और इतिहास, वृद्धावस्था और दैनंदिन जीवन, वृद्धावस्था : कुछ उदाहरण और "वृद्धावस्था नीति" की ओर। शोधार्थियों ने इसका पूरा लाभ भी उठाया।

वृद्धावस्था में जब मनुष्य पहुँच जाता है तो उसकी सोच में परिवर्तन आना स्वभाविक है। जिन कार्यों को वह पहले आसानी से पूरा कर सकते थे उन्हीं कार्यों को पूरा करने में कठिनाई का अनुभव करता है। इसका एक कारण शारीरिक शिथिलता है तो दूसरा कारण है मानसिक शक्ति का क्षीण होना। वैज्ञानिक प्रगति के कारण एक ओर मानव की औसत आयु बढ़ती जा रही है तो दूसरी ओर वृद्धों की समस्याएँ भी बढ़ रही हैं। बचपन से युवावस्था में क़दम रखने की आयु तो निश्चित है लेकिन वृद्धावस्था में मनुष्य कब किस आयु में क़दम रखता है और किन परिस्थितियों में क़दम रखता है इसकी कोई निश्चित लकीर नहीं है। चिकित्सा के क्षेत्र में वृद्धों के मनोविज्ञान (जेरिंटोलोजी) का विकास हुआ। इसका विस्तार वस्तुतः तीन स्तरों पर होने लगा – जैविक, मानसिक एवं सामाजिक। "आधुनिक मनोविज्ञान यह मानता है कि वृद्धावस्था का कोई एक कारण नहीं है, यह जीव-प्रक्रिया का हिस्सा है। ××× बाहरी बदलाव के साथ शरीर में भीतरी बदलाव भी होते हैं। रक्त-चाप, मानसिक मंदता, हड्डियों और मांसल हिस्सों में बदलाव, श्रवण और दृष्टिशक्ति में क्षीणता – कुछ ऐसे लक्षण हैं जो वृद्धावस्था को प्रमाणित करते हैं। ××× आधुनिक विज्ञान का मानना है कि जब तक मानिसक बल और संतुलन है, तब तक व्यक्ति वृद्धावस्था को नहीं पहुँचता।" (चंद्रमौलेश्वर प्रसाद, "वृद्धावस्था और जीवविज्ञान", वृद्धावस्था विमर्श, पृ. 23-24)।

युवा पीढ़ी को पुरानी पीढ़ी की बातें दकियानूसी लगती हैं। पीढ़ी अंतराल के कारण युवा पीढ़ी वृद्धों को घृणित दृष्टि से देखती है, उनका मज़ाक उड़ाती है तथा बात-बात पर उनकी अवहेलना करती है। भले ही उनका तिरस्कार किया जाता है लेकिन "जिस समाज में सुरक्षा की भावना है, वहाँ के वृद्ध सम्मानपूर्वक रहते हैं क्योंकि यहाँ के युवा उनमें अपना भविष्य देखते हैं। जिस समाज ने संस्कार छोड़े और वृद्धों का तिरस्कार किया, उसका भविष्य भी अंधकारमय ही रहेगा।" (चंद्रमौलेश्वर प्रसाद, "वृद्धावस्था : मानवजाति विज्ञान", वृद्धावस्था विमर्श, पृ. 30)।
भूमंडलीकरण के दौर में संयुक्त परिवार बिखर कर एकल परिवार में बदल गए। मनुष्य का वस्तुकरण हो रहा है। यहाँ पूँजी ही सब कुछ है। आर्थिक रूप से जब तक मनुष्य सबल है तब तक वह उपयोगी है अन्यथा वह अनुपयोगी बन जाता है। वृद्धावस्था की भी यही "जैविक सच्चाई है कि जो व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से अनुत्पादक और अनुपयोगी हो जाता है वह समाज में कोई योगदान नहीं दे पाता। ऐसी अवस्था में वृद्धों की स्थिति क्या होती है, वही समाज का दर्पण माना जा सकता है।" (वही, पृ. 31)।

सेवानिवृत्ति का प्रभाव अलग-अलग वर्ग के लोगों पर अलग-अलग ढंग से पड़ता है। एक अधिकारी यह सोचता है कि सेवानिवृत्ति के बाद उसका अस्तित्व ही मिट गया। एक मज़दूर धनाभाव से चिंतित हो उठता है क्योंकि उन्हें पूछने वाला भी नहीं रहेगा। सत्ता और पैसा है तो सब कुछ है। पति की सेवानिवृत्ति का समय क़रीब आने पर पत्नी भी चिंतित रहती है चूँकि उसे अपनी गृहस्थी पर आने वाले वित्तीय संकट की चिंता सालती है। "सेवानिवृत्ति एक कठिन और जटिल समस्या है जिसमें व्यक्ति का मानसिक एवं शारीरिक क्षरण होता है और इसे रोकने के लिए निरंतर किसी कार्य में लगे रहना चाहिए" (चंद्रमौलेश्वर प्रसाद, "वृद्धावस्था : आधुनिक समाजों में", वृद्धावस्था विमर्श, पृ. 52) नहीं तो मानसिक संतुलन बिगड़ सकता है।

प्रायः यह भी देखा जाता है कि वृद्धों को अपने अधिकारों से भी वंचित किया जाता है। जब वे विरोध करते हैं तो उनका अनसुना करके उन्हें घर के कोने में रहने के लिए विवश किया जाता है। इस तरह के उदहारण समाज के साथ-साथ धार्मिक और साहित्यिक ग्रंथों में पाया जा सकता है। दरअसल वृद्धावस्था की बात होती है तो केवल पुरुषों को ही ध्यान में रखा जाता है। स्त्रियों की बात तो होती ही नहीं। स्त्री को बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक बंदिशों में ही रखा जाता है। अतः वह वार्धक्य को भी आसानी से "झेल" लेती है। फिर भी मानसिक रूप से वह भी कुंठित रहती है। ऐसे में यदि उन्हें वृद्धाश्रम का हवाला किया जाए तो वहाँ के जीवन को भी वे "झेल" लेती हैं। "वृद्धाश्रम के जीवन को महिलाएँ अधिक सफलता से अपना लेती हैं। महिलाएँ आपस में हँस-बोल लेती हैं और साफ़-सफ़ाई से लेकर पकाने तक के कामों से अपनी दिनचर्या बिता देती हैं। पुरुषों के लिए ऐसे कोई कार्य नहीं होते। वे दिन भर बिस्तर पर पड़े रहते हैं या जिनके पास कुछ पैसे हैं, वे शराब पीकर समय बिताते हैं।" (वही, पृ. 51)। वास्तव में वृद्धों को चाहिए थोड़ा सा स्नेह और आत्मीयता। उन्हें आश्वासन चाहिए कि वे सुरक्षित हैं। बस यही उनकी अपेक्षाएँ हैं।

वृद्धावस्था तक पहुँचते-पहुँचते व्यक्ति यह समझ जाता है कि उसने जीवन में क्या पा लिया है और पाने के लिए क्या शेष है। इस स्थिति में तो व्यक्ति अपने अधूरे कार्यों को पूरा करने का दायित्व भावी पीढ़ी को सौंप देता है। लेकिन युवा पीढ़ी उन्हें वृद्धाश्रमों के हवाले छोड़ देती है। वृद्ध भी परनिर्भर होने से बचना चाहते हैं अतः वृद्धाश्रमों में शरण लेना ही श्रेयस्कर समझते हैं। वृद्धों का पुनर्वास एक गंभीर समस्या है। वृद्धाश्रम इसका विकल्प नहीं हो सकता क्योंकि यह निष्कासन की प्रक्रिया को बढ़ावा देती है। "वृद्धावस्था में अपने को किसी उद्देश्य से संबंधित रखने, अपने को किसी कार्य में व्यस्त रखने और एक ध्येय की ओर बढ़ते रहने की कामना से ही वृद्ध व्यक्ति का भविष्य प्रकाशमय हो सकता है, वरना वह किसी ऐसी बीमारी का शिकार हो सकता है जिससे उबार पाना कठिन हो और उसके परिवार के लिए अधिक चिंता का विषय बन जाए।" (चंद्रमौलेश्वर प्रसाद, "वृद्धावस्था और दैनंदिन जीवन", वृद्धावस्था विमर्श, पृ. 81)। अतः कुकुरमुत्तों की तरह पनप रहे वृद्धाश्रमों का आश्रय लेने के बजाए इन वरिष्ठ और अनुभवी नागरिकों को मान-सम्मान दें तो ये हमारे लिए वरदान सिद्ध होंगे।

मनुष्य का जीवन तभी अर्थवान है जब वह प्रेम और सौहार्द के माध्यम से अन्य के जीवन से जुड़े। शोषित वृद्धों के जीवन में सुधार लाना चाहिए न कि उन्हें वृद्धाश्रमों के हवाले करके उन्हें और कुंठित करना। यदि वृद्धों को "बेकार वस्तु" के बजाए मनुष्य समझा जाए तो सब कुछ ठीक हो सकता है। मनुष्य और मनुष्य के बीच परस्पर संबंध की आवश्यकता है। ऐसा न होने के कारण ही पीढ़ी अंतराल बढ़ता जा रहा है। चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने अपनी पुस्तक "वृद्धावस्था विमर्श" में "वृद्धावस्था नीति" की ओर इशारा किया है। उनका कहना है कि "वृद्धावस्था की तैयारी वृद्ध होने के बाद नहीं बल्कि बचपन और युवावस्था से शुरू करनी होगी। यदि मनुष्य को बचपन से ही समाज का अणु बनाया जाए तो वह समाज से अपने को कभी अलग नहीं समझेगा और सबके साथ हिलमिल कर रहेगा। ××× पर यह एक दिवास्वप्न ही रहेगा क्योंकि वृद्धावस्था युवावस्था से अलग स्थिति है और इसे हर कोई अपने-अपने उपाय से जीवन के साथ संतुलित करता है। समाज व्यक्तियों का ध्यान उस समय तक रखता है जब तक वे लाभ देते हैं। इसका लाभ युवा पीढ़ी उठा लेती है क्योंकि उनमें क्षमता और शक्ति होती है जबकि वृद्ध के पास न क्षमता बची रहती है न शक्ति, उसके पास केवल आँखें होती हैं आँसू टपकाने के लिए। जब तक हमारे पास ऐसी नीति नहीं है जो इन वृद्धों के आँसू पोंछ सकें, तब तक समय का यह चक्र वृद्धावस्था की दुर्गति को रोक नहीं पाएगा।" (चंद्रमौलेश्वर प्रसाद, "वृद्धावस्था नीति की ओर", वृद्धावस्था विमर्श, पृ. 95)।

वृद्धों को समाज में सही स्थान दिलाने, उन पर हो रहे शोषण को रोकने तथा जागरूकता फैलाने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने 14 दिसंबर, 1990 को यह निर्णय लिया कि हर साल 1 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय वृद्ध दिवस के रूप में मनाया जाए। 1 अक्टूबर, 1991 को पहली बार अंतरराष्ट्रीय वृद्ध दिवास मनाया गया। भले ही वृद्धों की रक्षा एवं स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए अनके कानून एवं प्रावधान बनाए गए फिर भी वृद्ध उपेक्षित हैं। इस सत्य को नकारा नहीं जा सकता। कुकुरमुत्ते की तरह पनप रहे वृद्धाश्रम इसके प्रमाण हैं। युवा पीढ़ी को जागरूक होना ज़रूरी है ताकि इन वरिष्ठ नागरिकों को अपना अधिकार प्राप्त हो सके।

अंत में रामधारी सिंह "दिनकर" की कविता "जवानी और बुढ़ापा" पाठकों के आस्वादन लिए –

[1]
जो जवानी में नहीं रोया, उसे बर्बर कहो,
जो बुढ़ापे में न हँसता है, मनुज वह मूर्ख है।
[2]
जब मैं था नवयुवक, वृद्ध शिक्षक थे मेरे,
भूतकाल की कथा गूढ़ बतलाते थे वे।
मैं पढ़ने को नहीं, वृद्ध होने जाता था,
आग बुझा कर शीतल मुझे बनाते थे वे।
पर, अब मैं बूढ़ा हूँ, शिक्षक नौजवान हैं,
उन्हें देख निज सोयी वह्नि जगाता हूँ मैं।
भूत नहीं, अब परिचय पाने को भविष्य का
यौवन के विद्या-मंदिर में जाता हूँ मैं।

- गुर्रमकोंडा नीरजा
सह-संपादक "स्रवन्ति"
प्राध्यापक
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा
खैरताबाद, हैदराबाद – 500004


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