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ISSN 2292-9754

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09.30.2014


तर्क ए वफ़ा

नफ़रतों के शहर में न ए वफ़ा रख।
उठ जाए कभी दर्द तो दिल में दबा रख।

ज़ख्म दे तुझे सनम चुप रह क़ुबूल कर।
आ जाये शर्म उनको तूँ ऐसा सिला रख।

संगदिल है ग़र ज़हां कह के करेगा क्या।
छोड़ के सवाल दिल दिल से मिला रख।

इस दौर में ज़िरह भी बे-मानी है अंजुम।
ख़ूबी पे नज़र रख औ जुबां पे दुआ रख।


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