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ISSN 2292-9754

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09.28.2017


चंचल चितवन...

(ताटंक छंद)
चंचल चितवन संदल सा तन,केश घने लहराती है।
जब हँसती तो ऐसा लगता, कौंध बिजुरिया जाती है।
ओट झाँकता है घूँघट के, सुंदर गोरा मुखड़ा।
ऐसे लगता ज्यों पूनम के, चंदा का हो टुकड़ा।
सुर्ख कली मुस्काती ऐसे, लगते अधर गुलाबी हैं।
देख नशा सा चढ़ने लगता, नैना लगें शराबी हैं।


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