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08.21.2007
 
आँखें
गुल देहलवी

कर ही लेंगी कभी असर आँखें
ऐसे मिलती रहीं अगर आँखें

आरज़ू थी कि लूटले दिल को,
वो चुराता रहा मगर आँखें

उस पे खुल जाए मुद्दा दिल का
सीख लें काश वो हुनर आँखें

है जहाँ तक पहुँच तस्सवुर की
तय न कर पाईं वो सफ़र आँखें

हाल अपना किसी से क्या कहिए?
ग़ाम-ए-फ़ुर्क़त है और तर आँखें

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