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ISSN 2292-9754

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01.27.2015


लौ दर्दे-दिल की (ग़ज़ल संग्रह) - देवी नागरानी

इन दो-ढाई दशकों में कितना बदल गया है आज का आदमी? उसकी मनुष्योचित सादगी, निश्छलता, शालीनता, विनम्रता, आदि गुणों का तेज़ी से क्षरण हुआ है। टुच्चागिरी, कमीनगी जैसे उसके आचरण के अभिन्न अंग बनते जा रहे हैं। व्यक्तिगत लाभ-लोभ ने उसे लगभग अंधा ही बना दिया है। अब वह वही देखना-सुनना पसंद करता है, जिसमें उसका अपना नीजि स्वार्थ छिपा होता है। दया-ममता-करुणा जैसे अर्थवान शब्द, अब उसके लिए कोई माने नहीं रखते। अनीति से पैसा कमाने की अंधी दौड़ में उसके पारिवार की दीवार में दरारें पड़ने लगी हैं।

रही सही कसर बाज़ारवाद ने पूरी कर दी है बाज़ार मानव का महत्वपूर्ण हिस्सा है। बाज़ार में शामिल व्यक्ति खरीदारी अथवा बिक्री, दोनों ही सूरत में मुनाफ़े की सोचता है। वर्तमानकाल में भूमंडलीकरण के दौर में बाज़ार अल्पसंख्यक धनिकों के आधार पर शान से चल रहा है। चारों तरफ़ हाहाकार के शोर सुनाई दे रहे हैं, लेकिन उनकी सुनने वाला कोई नहीं है।

साहित्य के नोबेल पुरस्कार विजेता हेराल्ड पिटर ने अपने भाषण मे इस संकट की ओर इशारा करते हुए कहा था- "राजनीतिकों की रुचि, उपलब्ध प्रमाणों के अनुसार सत्य में नहीं होती, बल्कि सत्ता में और उस सत्ता के बरकरार रखने में होती है। उस सत्ता को बनाए रखने के लिए यह ज़रूरी है कि लोग अज्ञान में पड़े रहें, कि वे सच्चाई के अज्ञान में ही जिएँ, यहाँ तक कि अपने जीवन की सच्चाई तक के।"

संकट के इस भयावह दौर में ग़ज़लकारा देवी नागरानी का ग़ज़ल संग्रह "लौ दर्दे-दिल की" का आना इस बात का गवाह है कि वह अपने आसपास के माहौल से बेख़बर नहीं है। उन्हें बराबर इस बात की चिंता सताती है। वर्तमान के हालात पर वे लिखती हैं-

"ये दुनिया है घबराई महंगी दरों से
परेशां है उस पर वो बढ़ते करों से।"

"वक्त की रफ़्तार देखो
आदमी बेजार देखो"

"उन बेघरों पे मुसीबत सी आ गई
धूप उनको जेठ की तिल-तिल जला गई"

"कुछ ऐसे मोड़ आए थे अरमाँ के शहर में
खुद से ही जूझ-जूझ कर लड़ना पड़ा मुझे"।

देवी नागरानी जी की ग़ज़लें पाठकों को ऐसे भावालोक में ले जाती हैं, जहाँ पहुँचकर उनकी ग़ज़लें अपनी न होकर पाठकों की हो जाती हैं। वे अपना रचना-संसार और संवेदनाओं को, विराट फलक पर यथार्थ से जोड़ देती हैं। यह तभी संभव हो पाता है, जब ग़ज़लकार प्रकृति से प्यार करता हो, प्रकृति में अपने प्रिय को देखता हो, प्रकृति को स्वयं के भीतर देखता हो और उसी में गुम हो जाता हो। शायद इसी खो जाने का नाम ही तो ग़ज़ल है।

प्रकृति को किस तरह से सजाया जा सकता है, उसे किस तरह से ख़ुशनुमा बनाया जा सकता है। इस पर वे सीख देती हुई कहती हैं

"आज आकाश अच्छाइयों का नया
भूलकर हर बुराई उसे तू सजा"

"दुख के बादल बरस कर बने शबनमी
मुस्कुराह्ट की होंठॊं पे लाली लगा।"

नागरानीजी की ग़ज़लों को सरलता से आत्मसात होते हुए महसूस किया जा सकता है, जैसे हवा की छुअन को महसूस किया जा सकता है। वे बड़ी ही कुशलता के साथ उन छोटे-छोटे शब्दों में, इतनी गहरी समझ पिरों देती हैं कि असंभव भी संभव में ढल जाता है। ग़ज़लों को बेहतर से बेहतर बनाने का वह तत्व जो जीवन कहलाता है, हमेशा उपस्थित बना रहता है। आपकी ग़ज़लों में जीवन का सौंदर्य और असीम संभावना के अनन्त स्त्रोत भी प्रस्फुटित होते हैं।

ग़ज़ल काव्य की वह ज़मीन है- जहाँ हिन्दी उर्दू हो जाती है और उर्दू हिन्दी। आज ग़ज़ल हिन्दी में ही नहीं अपितु अन्य भारतीय भाषाओं में भी कही जा रही है। यहाँ तक अंग्रेज़ी भाषा में भी ग़ज़लें लिखी जा रही हैं। इंगलैंड के ब्रियान हेनरी, डेनियल हाल, और शेरोन ब्रियान ने अंग्रेज़ी में ग़ज़लें लिखी है। संभव है कि आपकी ग़ज़लों का रुपान्तरण अंग्रेज़ी के अलावा अन्य भारतीय भाषाओं में भी होने लगेगा। यदि ऐसा होता है तो यह सुखद संयोग होगा।

भारतीय अस्मिता के साहित्यकार गुरुवर रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा था कि साहित्य का उद्देश्य मानव है। इस कथन का तात्पर्य यह है कि साहित्यकार चाहे वह जिस चीज़ का चित्रण करे, वहाँ ज़िन्दगी होगी। ज़िन्दगी का होना ही मनुष्य का होना है।

प्रसिद्ध साहित्यकार टी.एस. इलियट ने एक जगह लिखा है कि साहित्यकार जो भी लिखता है, वह अपने समय को ही लिख रहा होता है। बिना समय को जाने-समझे बगैर कोई गीत-कविता अथवा ग़ज़ल नहीं लिखी जा सकती।

जिगर हों- फ़िराक हों- शमशेर हों या फ़िर दुष्यंत की भाषा हो, वह हमारी परम्परा की भाषा है। इसी परिवेश की बीच की भाषा को गढ़ने का काम देवी नागरनी ने बड़ी ख़ूबी के साथ किया है। शायद यही कारण है कि उनकी ग़ज़लों मे एक विशेष प्रकार की बेचैनी, ताप, उर्जा, भाषा और शिल्प का जो प्रयोग हम देखते हैं, उसमें लयात्मकता के साथ-साथ संप्रेषनीयता भी होती है।

निःस्संदेह ग़ज़लकारा के, अपने भीतर के कवि ने, यथार्थ और स्वप्न के बीच पुल बनाने की कोशिशें की हैं।

ग़ज़ल संग्रह में कुल एक सैंकड़ा ग़ज़लें हैं। सभी अपने–अपने तेवर और बांकपन के साथ मौजूद हैं। आपका यह आठवां संग्रह है। इससे पहले सात संग्रह प्रकाशित होकर आ चुके हैं, जिसमें चार सिधीं भाषा में (जिसमें एक भजन संग्रह है), हिन्दी की ज़मीन पर लिखा जाने वाला यह ग़ज़ल संग्रह तीसरा है। इससे पहले दो संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। आपका अंग्रेज़ी भाषा में एक काव्य संग्रह भी प्रकाशित हुआ है। तथा आप देश में ही नही वरन विदेशों में भी सम्मानित हो चुकी हैं, यह गौरव का विषय है।
मुझे आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि इस ग़ज़ल संग्रह का पुरज़ोर स्वागत होगा।

इन्हीं शुभकामनाओं के साथ

गोवर्धन यादव
103, कावेरी नगर, छिन्दवाड़ा (म.प्र.)
(अध्यक्ष, म.प्र. राष्ट्रभाषा प्रचार समिति)
फ़ोन-07162-246651
चलित—09424356400
छिन्दवाड़ा-16-10-2012


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