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ISSN 2292-9754

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01.18.2018


जगती को गौतम बुद्ध मिला
धर्मेंद्र सुशांत

समीक्ष्य पुस्तक : तथागत
लेखक : डॉ. गोरख प्रसाद मस्ताना
प्रकाशक : जागरण प्रकाशन नई दिल्ली
मूल्य : 200 रु०
पृष्ठ संख्या : 116

हिंदुस्तान (हिंदी, दैनिक) के सुप्रसिद्ध समीक्षक धर्मेंद्र सुशांत जी की क़लम से 'तथागत' पर उनकी विचार।

वरिष्ठ साहित्यकार डॉ गोरख प्रसाद मस्ताना की नवीनतम काव्यकृति ‘तथागत’ साहित्य जगत के श्रीभण्डार का नवीनतम रत्न है जैसा कि इसके नाम से स्पष्ट है, इसमें महात्मा बुद्ध की जीवन कथा पदबद्ध रूप में प्रस्तुत की गई है। गौतम बुद्ध का अनन्य व्यक्तित्व और मानवता को उनका अतुलनीय योगदान ऐसे विषय हैं जिनपर हज़ारों ग्रन्थ लिखे जा चुके हैं। फिर भी ऐसा नहीं कहा जा सकता कि उनके बारे में किसी नये ग्रन्थ की, किसी नई विचार विवेचना की आवश्यकता अब नहीं है। एक महत्वपूर्ण कारण तो स्वयं उनके व्यक्तित्व और कृतित्व की विराटता है इससे कौन इनकार कर सकता है। मानव जाति के आद्योपांत इतिहास में ऐसी प्रखर प्रतिभा शायद ही कोई हुई है जिसकी बुद्ध तुलना की जा सके। फिर जब हम बुद्ध के व्यापक प्रभाव को देखते हैं तब भी उनकी अतुलनीयता सहज ही उद्भाषित होती है ऐसे बुद्ध के लिए यह कथन सर्वथा सटीक लगता है कि –

“सात समन्दर की मसि करौं, लेखनी सब बनराई
धरती सब कागद करौं, हरिगुन लिखा ना जाई“

कहना ना होगा कि असीम के समक्ष अपनी लघुता का भान होते हुए भी मनुष्य के लिए श्रद्धा का मार्ग हमेशा खुला हुआ है लेकिन यहाँ यह प्रश्न प्रासंगिक है कि इस श्रद्धा का या ऐसे किसी आस्था का आधार क्या होना चाहिए। जब हम अपने समाज की वर्तमान अवस्था में श्रद्धा और आस्था की ओट लेकर धर्म के नाम पर किये जा रहे कार्यों को देखते हैं तब सहज ही यह स्पष्ट हो जाता है कि यह और चाहे जो हो धर्म नहीं हो सकता। जो श्रद्धा या आस्था अत्याचार और उत्पीड़न का, भेदभाव और शोषण का माध्यम बने उसका धर्म से वास्ता नहीं हो सकता और ऐसी श्रद्धा या आस्था आधार पर जो धर्म खड़ा हो वह धंधा ही हो सकता है।

इस प्रसंग में हमें बुद्ध का स्मरण होता है उन्होंने भी एक धर्म की बात कही थी उनका धम्म करुणासिक्त था सम्बोधि आधारित था। हर तरह की जड़ता से मुक्ति के लिए था। हमारा सौभाग्य है कि बुद्ध हमारे पूर्वज हैं जिनके ज्ञानालोक में हम अपने पथ के अन्धकार से त्राण पा सकते हैं। वह बुद्ध ही हैं जिन्होंने हमें सिखाया –

अपना दीपक आप बनो, लेकिन हमारा दुर्भाग्य है कि ढाई हज़ार फैले जो ज्ञानालोक बुद्ध ने फैलाया था हम आज भी उसकी महत्ता को पहचानने में आलस दिखलाते हैं। हमने अपनी गुलामी की शृंखलाओं से ही अपनापन बना रखा है यही वह परिस्थिति है जिसमें बुद्ध की जीवन गाथा का नवगान प्रासंगिक हो जाता है और डॉ. मस्ताना की इस कृति का महत्व समझ में आता है। उन्होंने इस कृति को रचने के पीछे की प्रेरणा के बारे में लिखा है –

“मेरा एक उद्देश्य जगत अमिताभ प्रभु को जाने
पहले से भी अधिक आस्था के संग उनको माने”

सरदार भगत सिंह ने कभी कहा था कि बहरों को सुनाने के लिए धमाके की आवश्यकता है। डॉ. मस्ताना ने भी सामाजिक जड़ताओं के उच्छेद के उद्देश्य से बुद्ध गाथा का नवगायन आवश्यक माना, यह एक साहित्यकार के रूप में उनकी सजगता को ही प्रकट नहीं करता बल्कि उनकी समाजोंमुखता को भी प्रकट करता है। यहाँ यश की कामना नहीं है यहाँ समाज के उन्नयन का उद्देश्य है। इस कृति के उद्देश्य के संबध में उन्होंने लिखा है –

“आज अंधविश्वास बिछाने लगा अनयतम गहरा
हीरा तुच्छ कोयले पर ही लगा हुआ है पहरा
X X X
दिग्दिगंत में जातिवाद और वंशवाद का नारा
अहंकार नभ चूमे धरती पर धोखे की धरा
ईर्ष्या में रत हृदय हृदय से बरस रहा अंगारा
चिंतातुर मानव है आखिर पाए कहाँ सहारा?
X X X
वर्ण व्यवस्था के पीछे सुलगे आग
ब्राहमण ही है श्रेष्ठ यही चहुँदिश में गूंजे राग
श्रूद्र वर्ण है नीच यही कहता है द्विज समाज
जाति जाति का शोर मचाते नहीं तनिक है लाज़

उपरोक्त पंक्तियों को किन्ही स्पष्टीकरण की आवश्यकता नहीं है। इनके संदर्भ से डॉ. मस्ताना की इस काव्यकृति की अभ्यर्थना ही की जा सकती है कि उन्होंने बेहद प्रासंगिक प्रश्नों को बुद्ध के जीवन के जरिये काव्य रूप में विवेचित कर हमारे सामने एक आलोक स्तम्भ किया है।

इस कृति में बुद्ध के प्रति उन्होंने ने जो श्रद्धा निवेदित की ही वह समस्त चराचर के प्रति उनकी करुणाकलित दृष्टि से ही विकसित हुआ है। यह बुद्ध सन्देश, डॉ. मस्ताना का यह काव्य सन्देश समाज में निश्चित ही प्रतिष्ठित होगा और अनेक पीढ़ियों को प्रेरणा प्रदान करेगा।

धर्मेन्द्र सुशांत
वरिष्ठ समीक्षक
दैनिक हिन्दुस्तान, नई दिल्ली।


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