अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
01.16.2009
 
तुर्रम खाँ नहीं रहे
डॉ. गिरिराजशरण अग्रवाल

ताऊ तुर्रम खाँ का एक सौ पाँच वर्ष की आयु में निधन हुआ तो स्थानीय समाचारपत्र में एक छोटा-सा शोक समाचार छपा। अखबार के संवाददाता ने इस बात पर तो पूरा ज़ोर दिया था कि इस क्षेत्र का सबसे अधिक आयु वाला व्यक्ति भगवान को अथवा अल्लाह को या फिर दोनों ही को एक साथ प्यारा हो गया। मानो समाज एक सबसे बूढ़े आदमी से वंचित होकर अपनी कोई महत्त्वपूर्ण विशेषता खो बैठा हो। परंतु अखबार ने तुर्रम खाँ साहब के किसी और गुण का कोई उल्लेख नहीं किया था। हम समझते हैं कि सबसे अधिक आयु होना ही तुर्रम खाँ की विशेषता नहीं थी, वे तो अपने में एक चलता-फिरता और मुँह बोलता इतिहास थे। उन्हें पुराने ज़माने की जितनी गाथाएँ याद थीं, उतनी शायद ही किसी को याद हों। हुलिए से भी तुर्रम खाँ पुरातन विभाग के संग्रहालय में रखी कोई प्राचीन मूर्ति जैसे ही दिखाई देते थे। एक ऐसी मूर्ति, जिसमें प्राण डाल दिए गए हों। लंबी-लंबी तेल पिलाई हुई वीरप्पनी मूँछें, काले फ्रेम में जड़ा हुआ मोटे लैंसोंवाला चश्मा, पतलून की जगह ब्रिजीस डाटे और हाथ में औसत आकार का डंडा लिए तुर्रम खाँ हमें सचमुच कोई पुरानी यादगार जैसे ही दिखाई देते थे। उनके मोटे-मोटे होंठों के ऊपर रखी हुई वीरप्पनी मूँछें देखने वालों को सबसे पहले प्रभावित करती थी। हमें खेद है कि हमने यहाँ उनकी मूँछों की वीरप्पन की मूँछों से तुलना की है। इसे आप हमारी मजबूरी समझिए। वरना कहाँ तुर्रम खाँ और कहाँ वीरप्पन जैसा कल का छोकरा। पर क्या करें हमारी मजबूरी यह है कि हम उनकी घुमावदार मूँछों को पुराने युग के लोगों की तरह कटारी से उपमा देकर लज्जित नहीं होना चाहते। क्योंकि वीरप्पन ने मूँछों के मामले में कटारी का महत्त्व घटा दिया था। कटारीदार मूँछें कहने का मतलब होगा कि हम तुर्रम खाँ साहब की मूँछों को वीरप्पन की मूँछों से कमतर सिद्ध कर रहे हैं। कम-से-कम हम तो यह गुस्ताख़ी कर नहीं सकते। सो हमने तुर्रम खाँ की मूँछों को वीरप्पनी मूँछें कहना पसंद किया। वैसे यदि मूँछों को माइनस कर दें तो वीरप्पन और तुर्रम खाँ के बीच कोई और समानता नहीं थी।

हमने अपने दादा जी से सुना था कि ताऊ तुर्रम खाँ जी के दादा जी पहले व्यक्ति थे, जो गाँव से पैदल चलकर लखनऊ नवाब अवध के यहाँ पहुँचे थे और उनके दरबार में मुलाज़िम हो गए थे। तुर्रम खाँ के दादा जुम्मन खाँ उस वक्त तक अवध के अंतिम नवाब के यहाँ नौकरी करते रहे, जब तक कंपनी बहादुर ने रियासत पर पूर्ण रूप से कब्जा नहीं कर लिया। तुर्रम खाँ के दादा जुम्मन खाँ ने रियासत का उत्थान और पतन दोनों देखे थे। वे कंपनी बहादुर के रियासत पर अधिकार जमा लेने के बाद गाँव वापस आ गए थे। कहा जाता है कि जुम्मन खाँ ने अपनी नौकरी के दिनों में केवल अपना ही नहीं, अपनी आनेवाली कई पीढ़ियों का उद्धार कर लिया था। जुम्मन खाँ ने मौक़े से चूकना नहीं सीखा था। वे जब तक नौकरी में रहे, उस पुरानी कहावत पर निहायत निष्ठा के साथ अमल करते रहे, जिसमें कहा गया है कि आँख बची माल दोस्तों का। माल काटने वाले यदि माल वाले के दोस्त लोग न हों तो फिर बात ही क्या है। माल दोस्त नहीं खाएँगे तो क्या ऐरा-गै़रा खाएँगे। कहा जाता है कि जुम्मन खाँ जैसे लोगों ने, जो परंपरा क़ायम की थी, वह आज तक चली आ रही है। इस परंपरा का विकास भी हुआ है और विस्तार भी। विकास इन अर्थों में कि पुराने लोग जब ऐसा-वैसा माल खाते थे तो उसे पचाने के लिए डकार अवश्य लेते थे। अब डकार लेने की परंपरा नहीं रही है। अब तो यार लोग खाते हैं और डकार तक नहीं लेते।

हाँ तो बात चल रही थी ताऊ तुर्रम खाँ जी की। उनके दादा जुम्मन खाँ जी, जो गाँव से जाकर नवाब अवध के यहाँ नौकर हो गए थे। कहा जाता है कि नवाब ने उन्हें अपने शासन के अंतिम समय में रियासत के हैवानखाने का इंचार्ज बना दिया था। पाठक अपने सामान्य ज्ञान में वृद्धि करने के लिए यह बात नोट कर लें कि राजशाही अथवा नवाबी युग में केवल 'मेहमानखाना' ही नहीं होता था, 'हैवानखाना' भी होता था, जिसमें नवाब साहब की पसंद के अनुसार तरह-तरह के 'हैवान' यानी जानवर, पशु-पक्षी आदि पाले जाते थे। हमारा विचार है कि नवाबी ज़माने का हैवानखाना ही विकसित होकर हमारे युग का 'चिड़ियाघर' बना है। जो भी हो और हम चाहे जितना भी अत्याधुनिक चिड़ियाघर को नवाबी युग के हैवानखाने का विकसित रूप साबित करने के लिए ऐतिहासिक तथ्य ढूँढ निकालें पर यह तो हमें मानना ही पड़ेगा कि नए युग के शासक भी, चाहे कितने ही आधुनिक क्यों न हो ग हों, हैवानखाने की परंपरा से पीछा नहीं छुड़ा पाए हैं। आज भी इनमें से प्रत्येक शासक अपने बँगले में जहाँ एक अदद मेहमानखाना रखता है, वहीं एक अदद हैवानखाना भी रखता है। बल्कि यह कहना ज़्यादा उचित होगा कि हमारे लोकतांत्रिक राजाओं के बँगलों में मेहमानखाना चाहे हो या न हो एक अदद हैवानखाना अवश्य होता है।

हम फिलहाल इस चर्चा को यहीं छोड़ते हैं। चूँकि इस समय बात चल रही है तुर्रम खाँ के दादा जी जुम्मन खाँ की और हमें डर है कि यदि हमने आधुनिक हैवानखानों की चर्चा जारी रखी तो वह ऐतिहासिक घटना खटाई में पड़ जाएगी, जो हम आप तक पहुँचाना चाहते हैं। वैसे इन दिनों जब सारा इतिहास ही खटाई में डालकर उसे चटपटे मसालेदार बनाने के प्रयास चल रहे हों तो एक ऐतिहासिक घटना का खटाई में पड़ जाना कोई बड़ी बात नहीं है। किंतु चाहते हैं कि कम-से-कम यह एक घटना तो खटाई के घोल में पड़ने से बची रहे।

हमें याद है कि एक मुलाक़ात में ताऊ तुर्रम खाँ जी ने हमें बताया था कि जिन दिनों कंपनी बहादुर ने नवाब अवध पर सैनिक आक्रमण किया है, उन दिनों तुर्रम खाँ जी के दादा जुम्मन खाँ जी नवाब अवध के हैवानखाने के इंचार्ज थे। उनका काम शाही हैवानों की देखभाल करना था। इस बात की निगरानी रखना था कि हैवानों के खाने-पीने की व्यवस्था ठीक ढंग से चल रही है अथवा नहीं। हमारे महान देश भारत की यह परंपरा रही है कि इंसान नाम के प्राणी को चाहे भोजन मिले या न मिले पर हैवान को अवश्य मिलना चाहिए। सो नवाब अवध ने जुम्मन रखाँ को इस बात के कड़े निर्देश दे रखे थे कि हैवानखाने का कोई छोटे-से-छोटा हैवान भी ऐसा बाक़ी नहीं रहना चाहिए, जिसे पेटभर भोजन न मिला हो।

निश्चिंत होकर शतरंज खेल रहे नवाब के महल पर जब अँग्रेज़ बहादुर की सेना ने आक्रमण किया तो जुम्मन खाँ शाही हैवानखाने के मुख्य द्वार पर पहरा दे रहे थे। उनके हाथ में तलवार थी और वर्दी पहने हुए थे। इस ऐतिहासिक घटना और तुर्रम खाँ के बयान करने का अंदाज़ बस कुछ पूछिए मत। सुनते-सुनते हमारे रौंगटे खड़े हो गए। तुर्रम खाँ ने हमें बताया कि अँग्रेज़ों की सेना तूफ़ान की तरह बढ़ी चली आ रही थी। नवाब की फ़ौज पीछे हटते-हटते इतनी पीछे हट आई थी कि और पीछे हटने के लिए ज़मीन नहीं बची थी। चारों ओर जब तोपों, बंदूक़ों की घन-गरज गूँजने लगी तो जुम्मन खाँ जी ने देखा कि उनके हैवानखाने में भगदड़-सी मच गई है। हैवानखाने में बरसों से पल रहे शेर और शेरनी बौखलाकर इधर ऊधर भागने-दौड़ने लगे। जिराफ़ ने अपनी लंबी गरदन पेट और टाँगों के बीच में घुसेड़ ली। भेड़िए दुम दबाकर अपनी गुफाओं में दुबक गए।

अँग्रेज़ सेना का नेतृत्व कर रहे मेजर ने अपना घोड़ा ठीक महमानखाने के सामने रोका। जुम्मन खाँ ने गाँव से लौटकर बताया था। हमने यह घटना जब तुर्रम खाँ की ज़बान से सुनी तो हमारी दिलचस्पी बढ़ी। सोचा, अँग्रेज़ बहादुर ने नवाब का महमानखाना ही नहीं उजाड़ा, हैवानखाने को भी उजाड़ने से नहीं छोड़ा। तुर्रमखाँ ने पूरी घटना बताते हुए हमसे कहा।

अँग्रेज़ मेजर घोड़ा दौड़ाते हुए हैवानखाने के द्वार पर रुका, पीछे-पीछे चार घुड़सवार सिपाही और थे। हुक्म दिया,

 अरे खोल रे, मेन गेट को लॉक।

जुम्मन खाँ ने झट से मेन गेट का लाक खोल दिया। स्वागत के लिए दरवाज़ा खोला। भीतर से सबसे पहले जो जानवर झपटकर निकला, वह नवाब की पाली हुई बिजली नाम की शेरनी थी। बिजली ने बिजली की फुरती से अँग्रेज़ मेजर पर उछलकर झपट्टा मारा, जिससे उसका चेहरा और गरदन का बड़ा भाग घायल हो गया। शेरनी अँग्रेज़ मेजर को घायल करती हुई बिजली की तरह कौंधती हुई ग़ायब हो गई। मेजर के औसान ठीक हुए तो उसने धायँ से फायर किया, जिससे दादा जुम्मन खाँ गंभीर रूप से घायल हो गए। वह तो क़िस्मत अच्छी थी कि जान बच गई। मरहम-पट्टी कराकर से लखनऊ वे विदा हुए और उन्होंने अपनी अंतिम साँस इसी गाँव में ली।

हमें याद है कि यह घटना सुनने के बाद हमने ताऊ तुर्रम खाँ से पूछा था कि हमारी यह बात बिलकुल समझ में नहीं आई कि घायल करने का अपराध तो हैवानखाने की शेरनी ने किया था, सज़ा अँग्रेज़ मेजर ने दादा जुम्मन खाँ को क्यों दी। उन पर फायर क्यों किया?'

हमारा सवाल सुनकर ताऊ तुर्रम खाँ ने पहले अपनी मूँछों पर ताव दिया फिर हमारे सवाल के जवाब में हमीं से एक सवाल पूछ डाला, “पहले तुम यह बताओ कि न्यूयार्क के पेंटागन और वाशिंग्टन के विश्व व्यापार केंद्र पर हमला करने वाले तो ओसामा बिन लादेन के चेले-चपाटे थे, फिर तब अँग्रेज़ बहादुर ने शांति से रह रहे अफ़गान नागरिकों पर बमबारी क्यों की?”

 बात यह है बेटा जी”, ताऊ तुर्रम खाँ बोले, “अँग्रेज़ बहादुर की तो विशेषता ही यह है। जो करता है वह भरता नहीं है। भरता वही है जो करता नहीं है। कहीं पे तीर कहीं पे निशाना।

शायद गीत की अगली पंक्ति तुर्रम खाँ को याद नहीं रही थी। आज उनके निधन का समाचार पढ़ा तो हमें उनसे सुनी यह ऐतिहासिक घटना याद आ गई। हमने मन-ही-मन शेरनी के हमले का बदला जुम्मन खाँ से लेने वाले अँग्रेज़ी मेजर की आधुनिक पीढ़ियों को उसके इस कारनामे के लिए बधाई दी।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें