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07.03.2007
 
किसने सोचा धूपबत्ती राख हो जाती है क्यों
डॉ. गिरिराजशरण अग्रवाल

किसने सोचा धूपबत्ती राख हो जाती है क्यों
खुद सुलगती है मगर घर-भर को महकाती है क्यों

शांत करनी है इसे क्या जानिए कितनों की प्यास
बिन रुके आखर नदी हर दम बहे जाती है क्यों

गर अँधेरा ही लिखा था, भाग्य में संसार के
शम्‍अ की नन्हीं-सी लौ घर-भर को चमकाती है क्यों

इक बसंती रुत ज़रूरी है हर इक पतझड़ के बाद
फूल क्यों खिलते हैं, फ़सलों पर घटा छाती है क्यों

दिन के दुखड़े ही अगर मेरा मुकद्दर हैं तो फ़िर
रात मुझको नित नए सपनों से बहलाती है क्यों

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