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07.03.2007
 
इसे रोशनी दे, उसे रोशनी दे
डॉ. गिरिराजशरण अग्रवाल

इसे रोशनी दे, उसे रोशनी दे
सभी को उजालों-भरी ज़िंदगी दे

सिसकते हुए होंठ पथरा गए हैं
इन्हें कहकहे दे, इन्हें रागिनी दे

नहीं जिनमें साहस उन्हें यात्रा में
न किश्ती सँभाले, न रस्ता नदी दे

मेरे रहते प्यासा न रह जाए कोई
मुझे दिल दिया है तो दरियादिली दे

मुझे मेरे मालिक! नहीं चाहिए कुछ
ज़मीं को मुहब्बत-भरा आदमी दे

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