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ISSN 2292-9754

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04.13.2017


शमशीर हाथ में हो

शमशीर हाथ में हो ओ तमाम तक न पहुँचे।
बुजदिल बड़ी सियासत जो नियाम तक न पहुँचे॥
नियाम=म्यान

सतसंग की परीक्षा जिस ने भी पास कर ली।
मुमकिन नहीं कि फिर वो घनश्याम तक न पहुँचे॥

शिकवा करूँ मैं कैसे कि जवाब क्यों न आया।
गुमनाम सारे ख़त थे गुलफ़ाम तक न पहुँचे॥
गुलफ़ाम=फूल का रंग

अब रोक दे ओ मालिक सब गर्दिशें ख़ला की।
ये सहर भी रफ़्ता रफ़्ता कहीं शाम तक न पहुँचे॥

जब ओखली में पूरा सर ही फँसा दिया तो।
मुगदर से क्यों कहें कि अंजाम तक न पहुँचे॥

"हिन्दोस्तां" भी या रब कब तक बचा सकेगा।
जो ये तार तार खेमे ख़य्याम तक न पहुँचे॥


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