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05.31.2008
 
ज़ेह्न में उसके खिड़कियाँ थीं बहुत
डॉ. फ़रियाद "आज़र"

ज़ेह्न में उसके खिड़कियाँ थीं बहुत
पर फिज़ाओं  में आँधियाँ थीं बहुत 

वो किसी तौर भी न खुल पाया
मेरी बातों में चाबियाँ थीं बहुत 

मुस्कुराती थीं सारी दीवारें
और घर में उदासियाँ थीं बहुत 

तेरी सीरत पसन्द थी वर्ना,
तेरी सूरत की लड़कियाँ थीं बहुत 

मेरी नज़रों से गिर गया "आज़र"
वर्ना उस में भी खूबियाँ थीं बहुत

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