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05.31.2008
 
तपते सहरा में समुन्दर नहीं आने वाला
डॉ. फ़रियाद "आज़र"

तपते सहरा में समुन्दर नहीं आने वाला
अब यहाँ कोई पयम्बर नहीं आने वाला 

अपनी आँखों को रखो पीठ की जानिब अपनी
सामने से कोई खंजर नहीं आने वाला 

ज़हर पीना ही पड़ेगा हमें अपना अपना
अब कोई दूसरा शंकर नहीं आने वाला 

लाख दुहराए ये इतिहास खुद अपने को मगर
वो हसीं दौर पलट कर नहीं आने वाला 

हम तो इकतरफ़ा मोहब्बत के हैं क़ायल यारो!
चाँद  तो यूँ भी जमीं पर नहीं आने वाला 

यूँ ही सच्चाई से लिपटा रहा वो शख़्स तो फिर
दर्द के शहर से बाहर नहीं आने वाला 

बुतशिकन बनने पे हो जाए जो राज़ी "आज़र"
फिर कोई राह में पत्थर नहीं आने वाला

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