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05.31.2008
 
जाओ शीशे का बदन ले के किधर जाओगे?
डॉ. फ़रियाद "आज़र"

जाओ शीशे का बदन ले के किधर जाओगे?
लोग पत्थर के हैं, छू लेंगे, बिखर जाओगे 

मैं तो खुश्बू हूँ बिखर जाऊँगा गुलशन गुलशन
मुझ  से रूठोगे मेरे फूल तो मर जाओगे

इक तबस्सुम की तमन्ना लिए निकलोगे मगर
इक सिफर साथ लिए शाम को घर जाओगे 

नूर भी चेहरे का छिन जाएगा, सूरज हूँ मैं
रूठ कर मुझ से मेरे चाँद किधर जाओगे? 

फूल कागज़ के खिलौनों से बहल जाएँगे
ख़्वाब आँखों में लिए तुम भी तो घर जाओगे 

तुम वो पत्थर जो बहर हाल तराशीदा नहीं
मैं तो “आज़र” हूँ जो छू लूँगा, संवर जाओगे

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