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ISSN 2292-9754

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01.12.2016


"स्थानीयता" और "वैश्विकता" के बीच सार्थक आवाजाही
जितेन्द्र श्रीवास्तव

पुस्तक: माँ गाँव में है
कवि: दिविक रमेश
प्रकाशक: यश पब्लिकेशंस, दिल्ली
मूल्य: 395 रु.
सं.: 2015

दिविक रमेश पिछले चालीस ¬पैंतालीस वर्षों से कविताएँ लिख रहे हैं। उनके साथ के कई कवियों ने लिखना छोड़ दिया या यूँ कहें कि कविता ने उनका साथ छोड़ दिया। इस अर्थ में दिविक जी की निरंतरता का विशेष महत्व है। नहीं भूलना चाहिए कि निरंतरता कवि¬सामर्थ्य से ही संभव होती है। कुछ लोग चाहकर भी निरंतरता को बनाए नहीं रख पाते। पिछले साढ़े चार दशक की लम्बी अवधि में दिविक रमेश के आठ संग्रह प्रकाशित हुए हैं। "माँ गाँव में है" उनका नवाँ संग्रह है। इस संग्रह को पढ़ते हुए जो बात सबसे अधिक प्रभावित करती है, वह है सादगी। दिविक जी कहीं भी कोई आडम्बर नहीं रचते। उनकी कविताओं में भाषिक चमत्कार और खिलन्दड़ेपन की कोई कोशिश दिखाई नहीं देती। कविता स्वयं अपना रूप गढ़ती है। इस अर्थ में वे उन कवियों से भिन्न हैं जो सायास कविता लिखते हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि एक अच्छी कविता सिर्फ़ रची नहीं जाती, वह अपने सर्जक को भी रचती है।

इस संग्रह को पढ़ते हुए जिस दूसरी विशेषता की ओर दृष्टि जाती है, वह है चमत्कार मार्ग का अनुसरण न करना। दिविक रमेश चमत्कारी कवियों से अलग पाठकीय विवेक पर भरोसा करने वाले कवि हैं। अकारण नहीं है कि सहजता में उनका गहरा विश्वास है। इस संग्रह की कविताओं में एक ओर लोक जीवन है तो दूसरी ओर नागर जीवन की विडम्बनाएँ भी। दिविक रमेश का कवि गाँव और शहर के बीच एक संतुलन बनाने की कोशिश करता है। वह इसमें से किसी एक प्रति अतिरिक्त झुकाव का प्रदर्शन नहीं करता जो कि उसकी परिपक्वता को सूचक है।

दिविक रमेश की कविताएँ पढ़ते हुए यह लक्षित करना मुश्किल नहीं है कि वे वास्तविक भारतीयता के खोजी कवि हैं। उनकी कविताएँ खंडित भारतीयता का प्रत्याख्यान करती हैं। इस संग्रह की "एक भारतीय हँसी" कविता को पढ़ते हुए यह महसूस किया जा सकता है कि विडम्बना की सही पहचान और जनपक्षधर समग्रतावादी दृष्टिकोण के बिना ऐसी कविता नहीं लिखी जा सकती है। यहीं यह कहना भी ज़रूरी है कि यह कवि भारत में दुःख¬दर्द तक सीमित नहीं है। एक अंतरराष्ट्रीय विज़न इस कवि में लगतार बना रहता है। वह भारत में रहते हुए इराक़ और इराक़ी मित्र के बारे में सोचता और चिन्तित होता है। "एक भारतीय पत्र मित्र इनद के नाम" जैसी कविता बड़े सरोकारों से पैदा होती है। इस कविता की कुछ पंक्तियाँ देखें -

इनद जानता था शासक की क्रूरता
भय उसे भी था
इनद को भी चाह थी बदलाव की
दुख उसे भी था
पर नहीं चाहता था इनद दख़ल किसी ग़ैर का
यानी एक माने हुए विदेषी क्रूर का।

अफ़सोस है इनद को
कि अब हवाओं में नहीं रही शेष
महक खजूरों की
ज़ायका लाल चाय का।
कि इराक़ का अपना आकाश
शून्य हो गया अपने ही बादलों से
कि दरकने लगी है धरती।

दूसरे समाजों के प्रति ऐसी गहरी संलग्नता वही रख पाता है जो अपने समाज को समझने की निरंतर कोशिश में लगा रहता है। यह कविता सही अर्थों में "स्थानीयता" और "वैश्विकता" के बीच सार्थक आवाजाही को अभिव्यक्त करती है। इस संग्रह में एक ऐसी कविता है जो अकेले ही इस संग्रह को स्मरणीय बनाने के लिए पर्याप्त है। कविता का शीर्षक है - दैत्य ने कहा। यह अर्थवत्ता की विस्तृत परिधि वाली कविता है। कविता शुरू होती है -

दैत्य ने कहा मैं घोषणा करता हूँ
कि आज से सब स्वतंत्र हैं
कि सब ले सकते हैं आज से
भुनते हुए गोश्त की लाजवाब महक।

सब ख़ुश हुए क्योंकि सब को ख़ुश होना चाहिए था।
कितना उदार है दैत्य

पुनः दैत्य ने कहा -

दैत्य ने कहा
ख़ुद को जलाकर ख़ुद की महक लेना
कहीं बेहतर कहीं पवित्र होता है महक के लिए।

सबने माना और झोंक दिया आग में ख़ुद को।
कितना इंसान है दैत्य

और फिर सब मर गए जल कर तब दैत्य ने मूल बात कही -

दैत्य ने कहा
पर इस बार ख़ुद से
कितना लाजवाब होगा इन मूर्खों का महकता गोश्त
आज दावत होगी दैत्यों की।

इस दैत्य की हँसी को हम समकालीन विश्व में साफ़¬साफ़ सुन सकते हैं। कैसी विडम्बना है कि दैत्य जीत जाता है और मनुष्यता शर्मसार होती रहती है।

कविता उम्मीद का ही दूसरा नाम है। कवि कभी नाउम्मीद नहीं होता। जब सारी उम्मीदें समाप्त हो जाती हैं, तब कविता की उम्मीद का जन्म होता है। जब चारों ओर सन्नाटा फैल जाता है, लोग अपने हिस्से का सच भी नहीं कह पाते तब कविता बोलती है। वह सृष्टि की वाणी बन जाती है। कविता से अधिक मीठी और उससे अधिक बेधक कोई और आवाज नहीं होती। जब सब विश्वास खो देते हैं तब कविता नए सिरे से विश्वास को जन्म देती है। दिविक रमेश अपनी "उम्मीद" शीर्षक कविता में लिखते हैं -

समय ठहरता है तो जागती है उम्मीद
अंखूवाते ही ताक़त उम्मीद की
काल हो जाता है रफ़ूचक्कर।
बहुत दूर तक खुल जाते हैं रास्ते
पड़ाव हो उठते हैं दीप्त
लगता है ब्रह्माण्ड ही उतर आया हो
खुले रास्तों पर।
और मिट गया हो भेद
आदमी और देवता का।

एक आदमी निकल आता है
डग भरता
क़द आकाश को भेद जाता है जिसका।

कहने की आवश्यकता नहीं कि कविता की उम्मीद इसी जगत में और इसी जगत से होती है। वह किसी वायवीय संसार का सृजन नहीं करती। हमें याद रखना चाहिए कि कविता मनुष्यता की खोज का साधन है, जगदीश्वर की खोज का नहीं। भक्त कवि भी मनुष्यता का ही संधान कर रहे थे। यह देखकर प्रसन्नता होती है कि समकालीन हिंदी कविता में वरिष्ठ कवि हों या युवा कवि, सभी अपने¬ अपने ढंग से मनुष्यता का ही संधान कर रहे हैं।

इस संग्रह की एक विशेषता यह भी है कि इसमें स्त्रियों पर कई अच्छी कविताएँ हैं। यहाँ दो कविताओं का विशेष उल्लेख किया जा सकता है। एक कविता है – "अफ़गान महिलाएँ (2001) और दूसरी कविता है - "बेटी ब्याही गई है"। "अफगान महिलाएँ" में कवि कहता है -

देखना खिड़कियों की छलनियों के पीछे की तुम्हारी आँखों को
ला खड़ा करेगा वह दुनिया के तमाम दृश्यों के सामने, रूबरू
जिन्हें फिर कभी कोई ज़ुर्रत नहीं कर सकेगा छीनने की तुमसे
तुम्हारी ताक़त के सामने।

उड़ो कि इतना उड़ो
कि आदत को जाए तुम्हारी आकाश।
फूल फूल जाए छाती ज़मीन की
तुम्हारी क़ामयाब उड़ानों पर।
कि दौड़ पड़े स्वागत में
चूल्हे की गंध और
आकाशी सुगन्ध साथ¬साथ।

फिर "बेटी ब्याही गई है" में वह कहता है -

सोचते हैं कितनी भली होती हैं बेटियाँ
कि आँखों तक आए प्रश्नों को
ख़ुद ही धो लेती हैं
और वे भी असल में टाल रही होती हैं।
टाल रही होती हैं
इसलिए तो भली भी होती हैं।

सच में तो
टाल रहा होता है घर भर ही।
कितने डरे होते हैं सब
ऐसे प्रश्नों से भी
जिनके यूँ तय होते हैं उतर
जिन पर प्रश्न भी नहीं करता कोई।

इन दोनों कविताओं को साथ¬साथ पढ़ने पर कवि की चिंता और उसके स्वप्न का पता मिलता है। पाठक देख पाता है कि कवि स्त्री समाज के लिए किस हद तक प्रतिबद्ध है। वैसे भी, कवि की पहचान का एक प्रमाणिक स्रोत उसकी स्त्री दृष्टि भी है। यह देखना बेहद ज़रूरी होता है कि कोई कवि "आधी आबादी" को किस तरह देखता है! दिविक रमेश की इस संग्रह में संकलित स्त्री जीवन विषयक कविताएँ उनकी दृष्टि¬सम्पन्नता और सामर्थ्य का पता देती हैं। इस संग्रह को पढ़ने के पश्चात यह कहने में कोई दुविधा नहीं है कि दिविक रमेश का यह संग्रह एक उल्लेखनीय संग्रह है।

सम्पर्क हिंदी संकाय
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मोबाईल: 9818913798
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