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ISSN 2292-9754

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04.07.2017


"नयी कहानी" के आलोचक देवीशंकर अवस्थी

"आलोचक द्वारा की जाने वाली व्याख्या कहाँ तक यथार्थ और संगत है, यह आलोचक के केवल दृष्टि कोण पर निर्भर नहीं करता, वरन् उसके जीवन-ज्ञान पर भी निर्भर होता है।"1

-मुक्तिबोध

आलोचक के साहित्यिक मूल्य और विश्लेषण क्षमता की गइराई इस बात पर निर्भर करती है कि आलोचना के सूत्रों के निर्माण में किन उपादानों का योग रहा। दूसरे शब्दों में यह कि आलोचक की तैयारी कितनी है? देवीशंकर अवस्थी के साहित्यिक सिद्धान्त नये साहित्य के स्वीकार के साथ निर्मित ओर विकसित हुए हैं। वे नयी रचनाशीलता, विशेषकर "नई कहानी" को अपने विवेचन का मुख्य आधार बनाते हैं। साहित्य में किसी नयी प्रवृत्ति के साथ आलोचना की सबसे बड़ी चुनौती उसकी नवीनता को परिभाषित करने की होती है। "नई" विशेषण से दो तरह की व्यंजना होती है। एक तो पुराने से भिन्नता, दूसरी नवीनता की विशिष्टता। "नई कहानी" आन्दोलन के साथ भी ऐसा ही प्रश्न खड़ा हुआ कि आख़िर नई कहानी में "नया" क्या है? यह सब कुछ इस बात से तय हो रहा था कि पुरानी कहानी से नई कहानी में भिन्नता के स्तर और स्वरूप क्या है? देवीशंकर अवस्थी ने इस प्रश्न पर विचार किया है। "नई कहानी" के कथ्य तथा शिल्प से "पुरानी कहानी" को अलगाते हुए उन्होंने उसकी विशिष्टता को इन शब्दों में रेखांकित किया- "अगर पुरानी और नई कहानी के अंतर को देखा जाए तो पहले का कहानी लेखक एक ऊपरी बौद्धिक सतह से कुछ समस्याओं को लेता था और उसमें "भावुकता" या "करुणाभास" का जल मिलाकर स्पर्शी (मर्म या हृदय या सतही झनझनाहट) कहानियाँ लिखता था। उसकी बजाय आज का कथाकार अपने अनुभव को पहले टटोलता है और उसके माध्यम से तमाम समस्याओं, प्रश्नों (या अप्रश्नों) को ढूँढ़ता और झेलता है। एक का अप्रोच बौद्धिक और अंत लिजलिजी भावुकता में और दूसरे का एप्रोच भावप्रवण पर अंत एक शक्तिपूर्ण बौद्धिक संभावना में। ग्राफ के कर्व शायद इसी स्थिति के आसपास होंगे।"2 नई और पुरानी कहानी की रचना-प्रक्रिया का यह अंतर बदलती जीवन स्थितियों के कारण हो रहा था। जिसे देवीशंकर अवस्थी, सुरेन्द्र चौधरी, नामवर सिंह जैसे कहानी आलोचक पहचान रहे थे।

यथार्थ के बदलते स्वरूप को ध्यान में रखकरदेवीशंकर अवस्थी कहानी के मूल्यांकन में सबसे ज़्यादा ज़ोर, "कहानी में यथार्थ की खोज" पर देते हैं। लेखक के लिए आवश्यक है कि वह यथार्थ को दृश्यमान करे। कथा समीक्षा की चुनौती लेखक की टेक्नीक की पड़ताल करना उतनी नहीं है जितनी कि लेखक के दृश्यमान यथार्थ के भूगोल की पैमाइश की।

"साहित्य विधाओं की प्रकृति" की पहचान पर ज़ोर देवीशंकर अवस्थी की आलोचना में अक्सर दिखायी पड़ता है। उन्होंने "साहित्य विधाओं की प्रकृति" नामक पुस्तक का संपादन भी किया, वे मानते हैं कि हर विधा की अपनी प्रकृति होती है, इसलिए किसी एक विधा की बनी हुई पद्धति पर दूसरी विधा का मूल्यांकन नहीं हो सकता। "नई कहानी" के मूल्यांकन में भी उन्होंने कथा समीक्षा के स्कूली पाठ्यक्रम के बँधे-बँधाये छह तत्वों वाले साँचे के बरक्स (जो कि नाटक और उपन्यास के लिए भी थी) भिन्न दृष्टि अपनायी। वे कहानी की पाठ-प्रक्रिया और विश्लेषण में "प्रभावन्विति" पर ज़ोर देते हैं। उन्होंने प्रभावन्विति के सहारे लेखक के अनुभव जगत को जानने का प्रयास किया और फिर कथा समीक्षा में "अनुभव की प्रमाणिकता" का भी सवाल उठाया। यह सवाल लेखक के बदलते भाव-बोध की ईमानदारी की पड़ताल करता है।

"नई कहानी" के संबंध में एक प्रमुख मुद्दा ग्रामकथा बनाम शहरीकथा के विभाजन का था, देवीशंकर अवस्थी ने अनुभव की प्रमाणिकता और यथार्थ की सटीक व्यंजना को आधार बनाकर, साहित्य की मूल प्रवृत्ति के विरुद्ध किए गए इस विभाजन का विरोध किया। वे मानते हैं कि अनुभूति की पकड़ भावों को किसी ग्राम अथवा शहर में नहीं बाँटती। वह ज़िन्दगी के "मूड्स" को पकड़ती है।

"विभिन्न क्षेत्रों से सामग्री चुनने के आधार पर अलग-अलग बाड़े बना देने के स्थान पर यह कहना क्या ठीक न होगा कि गाँव-शहर, क़स्बा, ईसाई, मुसलमान या आदिवासी, रेस्तरां, पहाड़ या धर्मशाला आदि में जो आज ज़िन्दगी की तेज़ी (या सुस्ती) नीरसता या सरसता, बदली हुई चित्तवृत्ति, भिन्न प्रकार के दबावों में पले-बदलते हुए, संघर्ष करते हुए प्राणी या परिस्थितियाँ, जो भी हैं, वे सभी "नई कहानी" के अंतर्गत हैं।3

यह सन् 54-55 के क़रीब हिन्दी कहानी में उभरी हुई नई पीढ़ी के कथाकारों के भावबोध को समझने का समग्रतावादी प्रयास है। नई संवेदना और बदले यथार्थ के स्वर को ग्रामकथा और शहरीकथा जैसे विभाजनों में अलग कर दिया गया था। आन्दोलन साहित्य में क्यों चलाये जाते हैं? फिर उन आन्दोलनों के भीतर छोटे-छोटे आन्दोलन क्यों पैदा हो जाते हैं? इन प्रश्नों पर कथा समीक्षक सुरेन्द्र चौधरी ने विस्तार से विचार किया है। ग्राम और शहर की अलग-अलग कहानियों के साँचे "नई कहानी" आन्दोलन के भीतर चलाए जा रहे विभाजित यथार्थ के आन्दोलन थे। "नई कहानी" अनुभवों के व्यापक यथार्थ और समूचे वातावरण को लेकर चलती है। उसमें ऐसा विभाजन करना कहाँ तक उचित होगा? "नई कहानी" के लेखक के वैशिष्ट्य की पहचान करते हुए अवस्थी जी को इस बात को बोध रहता है, कि "नई कहानी" में एक क्षण भी कहानी है और एक समूचा वातावरण भी कहानी। कहानी की रचना किसी भी आधार को लेकर की जा सकती है। देवीशंकर अवस्थी की यह धारणा नई कविता की क्षणवादी अवधारणा लग सकती है। क्योंकि वे "नयी कहानी" और "नई कविता" का मूलभाव एक ही मानते हैं। उनके लिए "नयी कहानी" और "नई कविता" अभूतपूर्व न होकर जीवन की सहधर्मी व्यंजनाएँ हैं।4 यद्यपि "नई कविता" और "नयी कहानी" के भावबोध की एकता की बात विवाद का विषय हो सकती है तथापि "नयी कहानी" के विस्तृत वातावरण की समझ का विकास उनकी द्वंद्वात्मक पद्धति के कारण ही संभव हो सकता। जिस क्षण "शब्द" के प्रयोग के चलते हिन्दी कथा-आलोचना में अवस्थी को अज्ञेय के साथ खड़ा कर दिया जाता हैं। उसी क्षण के महत्त्व को कथा-समीक्षक सुरेन्द्र चौधरी ने कहानी के बदलते स्वरूप की पहचान में समझा है- "सामान्य जीवन परिस्थिति की ओर से एक तीखा आत्म-ज्ञान आज की कहानियों के "स्वर" को पिछली कहानियों से पृथक करता मालूम पड़ता है। यह आत्म-ज्ञान कोई आध्यात्मिक ज्ञान नहीं है, अन्तःकरण का बोध नहीं है, यह अन्ततः जीवन के सम्पूर्ण प्रवाह में व्यक्ति की आत्मनिर्भर इकाई का बोध है। यह बोध साक्षात्कार का एक क्षण भी हो सकता है, एक सम्पूर्ण जीवन भी।5

"नई कहानी" की जिन सीमाओं की ओर देवीशंकर अवस्थी इशारा करते हैं, उनमें एक हैं बढ़ती "एकरसता", और दूसरी है क़िस्सागो की प्रवृत्ति। "एकरसता जहाँ कहानी को फामूर्ले में बदलती है, वहीं क़िस्सागोई की पद्धति अति व्यवहारिकता के चलते दृष्टि की धुँधला करती है। देवीशंकर अवस्थी ने इसी संबंध में "एकरसता टूटे और बेकली और बढ़े" नामक निबंध लिखा। निबंध में उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि पाठक की एकरसता को तोड़ने का प्रयास ज़रूरी है। यह जागरूकता का लक्षण है। नये कहानीकारों का यह दायित्व भी है।

"नई कहानी" के मूल्यांकन में विवाद का एक बिन्दु कहानी के "अच्छी" और "नई" होने को लेकर था। देवीशंकर अवस्थी मानते हैं कि भावुकता नए और पुराने के अंतर को नहीं व्यक्त करती है वह एक ऐसा भावपुंज है जो साहित्य मात्र का लक्षण है। "कहानी अच्छी और नई" लेख इस बात को लेकर लिखा गया है कि "अच्छी कहानी को नई होना चाहिए या नहीं?" पूरे लेख में देवीशंकर अवस्थी की आलोचकीय बौद्धिक प्रतिभा की झलक मिलती हैं। नामवर सिंह ने दिजेन्द्र नारायण निर्गुण की "एक शिल्पहीन कहानी" को भावुकतापूर्ण और पुराने भावबोध की कमज़ोर कहानी कहा था।6 प्रस्तुत लेख नामवर जी के साथ किया गया साहित्यिक वाद-विवाद है। देवीशंकर अवस्थी प्रेमचंद की कहानी "बूढ़ी काकी" को सामने रखकर नामवर सिंह की ही शैली में जबाव देते हैं। "बूढ़ी काकी" और "धरती अब भी घूम रही है" को आमने-सामने रखकर नामवर की आधुनिक दृष्टि और पद्धति दोनों के सामने एक लकीर खींचते हैं। नामवर सिंह का तर्क कि अनुभूति या पीड़ा यदि एक की है तो कहानी अच्छी नहीं। "धरती अब भी घूम रही है" में एक की पीड़ा है। "छोटे-छोटे ताजमहल" एक की समस्या है, इसलिए उपेक्षणीय है। देवीशंकर पूछते हैं कि "एक की कहानी क्या सचमुच ऐसी ही विस्मरणीय एवं उपेक्षणीय होती है- ख़ासकर कहानी जैसी मूलतः वैयक्तिक और निजी कला में। ऐसा लगता है कि कहानियों की बात करते समय नामवर जी के मन में उपन्यास रहता है।"7 अवस्थी जी के लिए वैयक्तिक अनुभूतियों को सामाजिक अनुभूति के रूप में देखना; साहित्य में ज्यों का त्यों सामाजिक चित्र उतार देना नहीं है। "नयी" क्या हो? और नएपन की सार्थकता क्या होती है? वे स्पष्ट करते हैं- "नयापन निरर्थक होता है, यदि वह अनुभव की संकुलता में नई अंतर्दृष्टि प्रदान न करे तथा वस्तुपरकता की एक नई प्रक्रिया को ही विकसित न करे।"6

"नयी कहानी" के मूल्यांकन में कविता के प्रतिमानों के प्रयोग का आरोप नामवर सिंह पर मोहन राकेश और राजेन्द्र यादव द्वारा लगाया गया। कहानी के शिल्प की व्याख्या में बिम्ब, प्रतीक और कथानक के समूचे ढाँचे की चर्चा होती है। देवीशंकर अवस्थी ने नामवर सिंह पर कहानी को उपन्यास की दृष्टि से पढ़ने का आरोप लगाया पर स्वयं काव्य-समीक्षा के प्रतिमानों को कहानी पर लागू करने के ख़तरों की ओर से पर्याप्त सजग हैं। अवस्थी जी फ़िलिप राहृ के हवाले से बताते हैं कि ऐसा करने वाले तीन चीज़ों पर बहुत बल देते हैं- प्रतीक, मिथ, रूपक, अन्योक्ति आदि की खोज पर, भाषा पर और टेक्नीक को ही सब कुछ मानने पर। देवीशंकर अवस्थी मानते हैं कि ऐसा करने से कृति के कथात्मक विकास की उपेक्षा होती है। फलतः "कोई एक स्थिति या भाषा-प्रयोग का विश्लेषण ही कसौटी बन जाता है, जबकि कथाकृति में महत्वपूर्ण तत्त्व कथानाक (Plot) होता है। (प्लाट घटनाओं और विवरणों के अर्थ में नहीं, बल्कि अरस्तु की सहमति से "कार्य-व्यापार की आत्मा के अर्थ में) वे यह भी लिखते हैं कि-"प्रतीक, मिथक, अन्योक्ति आदि की चर्चा वास्तविकता का अवमूलन करती है। कहना न होगा कि कथा रूपों की मूल संपदा अनुभव ही होता है, भले ही वह ऊबड़-खाबड़ या अपरिष्कृत हो.....।"9

रचना की रूपबंध मीमांसा पर ज़ोर देकर कहानी के शिल्प और यथार्थ की पहचान करते हुए देवीशंकर अवस्थी ने यथार्थ का शिल्प और शिल्प के यथार्थ पर भी विचार किया है। प्रत्येक युग रचना को केवल "वस्तु" ही मुहैय्या नहीं कराता, रचनाकार युग संदर्भों में शिल्प के साँचे भी तलाशता है। अवस्थी जी ने "एक पति के नोट्स" (1964), महेन्द्र भल्ला और "यह मेरे लिए नहीं" (1964) धर्मवीर की कहानियों के आधार पर शिल्प और यथार्थ के पुराने तथा नये स्वर को अलगाया है। महेन्द्र भल्ला की कहानी "एक पति के नोट्स" की प्रशंसा करते हुए अवस्थी जी बताते हैं कि यह कहानी प्रमाणिक अनुभव पर ज़ोर देती है। यह बदलते हुए संसार की कहानी है जिसमें कहानी के माध्यम से यथार्थ को खोजा गया है और यह खोज गहन प्रश्नशीलता से जुड़ी हुई है। जबकि भारती की कहानी में पुराने संसार का ही चढ़ाव हैं इस तरह "एक पति के नोट्स" कहानी शिल्प और यथार्थ दोनों स्तरों पर बड़ी और मूल्यवान कहानी बनती है। क्योंकि- "सच्चाई की खोज एक श्रेष्ठ कला शिल्प की खोज भी है। दोनों वस्तुतः एक ही हैं। जिस मानवीय समस्या को उठाया जाता है उसी के अनुरूप ही कलाशिल्प को भी होना चाहिए। महेन्द्र भल्ला ने इस शिल्प की चेष्टा की है और दूर तक इसमें सफल भी हुए हैं।"10

"नयी कहानी" आन्दोलन के स्वरूप और उसकी प्रकृति के साथ-साथ देवीशंकर अवस्थी की कथा-आलोचना का क्षेत्र सन् 60 के बाद की कहानियों के विवेचन-विश्लेषण तक फैला हुआ है। किसी कालक्रम के लिहाज़ से साहित्य की विकासमान गति को नहीं बाँधा जा सकता। लेकिन सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों का प्रभाव उस पर पड़ता है। प्रभाव के चलते साहित्य में नई मनः स्थितियाँ और प्रवृत्तियाँ जन्म लेती हैं। साठ के बाद की कहानियाँ बदली हुई मनःस्थितियों की कहानियाँ हैं। स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान उपजे भविष्यवाद की आकांक्षा जो नई कहानी तक बनी थी सन् साठ के बाद उनका खण्डन दिखायी पड़ता है। व्यक्ति और समाज में एक "अजनबियत" और "भयावह" संदर्भों का उदय हुआ। कुल मिलाकर यह कि "जहाँ सन् 60 के पहले की कहानियों में एक स्पष्ट सामाजिक दृष्टि को आग्रह था अथवा "मूल्यों की खोज" बनाम "भविष्यवाद" था, सन् 60 के बाद की कहानियों में इसका बिल्कुल लोप हो गया। यथार्थ को उसके निर्मम रूप में सन् साठ के बाद की कहानियों में चित्रित किया गया है।"11 इस बदते हुए यथार्थ के कथा-साहित्य पर समीक्षा के पुराने प्रतिमान हू-ब-हू लागू नहीं हो सकते थे। देवीशंकर अवथी ने साहित्य के मूल स्रोत जीवन में होने वाले इस बदलाव की गति को समझकर कथा समीक्षा के नए सूत्रों का विकास किया। उन्होंने आधुनिकता को एक ऐतिहासिक प्रक्रिया माना और इसके पीछे के उत्तरदायी कारकों में विज्ञान, यंत्र, गति आदि के महत्त्व को समझा। प्रक्रिया के प्रवाह के बदलते संदर्भ में निर्मित रचनाशीलता में शिल्प और यथार्थ दोनों में नवीनता आती है। यथार्थ के बदल जाने के बाद भी यदि शिल्प में बदलाव नहीं आता तो रचनाओं में घटनाएँ सत्य रहती हैं पर प्रभाव झूठा हो जाता है।

शब्द और चीज़ों के निरंतर बदलते संबंधों में "समकालीनता", "आधुनिकता" और "यथार्थ" शब्द बहुत रपटीले हैं। जिन पर रचनाकार और आलोचक के फिसल जाने का ख़तरा लगातार बना रहता है। देवीशंकर अवस्थी शब्दों में इस रपटीलेपन से परिचित हैं। 60 के बाद की कहानियों पर बात करते हुए वे एमर्सन के इस कथन को उद्घृत करते हैं कि "हर युग को अपनी विशेषता में लिखना होता है, शायद हर पीढ़ी को और नई पीढ़ी को भी अपनी कहानियाँ को "लोकेट" करने की कोशिश की है जो सचमुच बदले हुई स्थितियों और बदले हुए जीवन के अर्थ में समकालीन बन सकी है। "नई कहानी" और सन् 60 के बाद की कहानी का अंतर केवल साहित्य में आ गया झोंका नहीं था। देवीशंकर अवस्थी के अनुसार "यह यथार्थ के प्रति अलग-अलग रुखों का भी अंतर है।"13 वे मानते हैं कि "नई कहानी" के लेखक में स्थितियों-परिस्थितियों के साथ "लॉजिकल कनेक्शन" की समझ दिखायी पड़ती है। उस दौर की कहानियों में एक तरह का विवरण मौजूद रहता है। जो परिस्थितियों के मध्य पात्रों की स्थितियों एवं मन की दशाओं को तार्किक रूप में स्थापित और सिद्ध करता है। इसका व्यावहारिक उदाहरण देवीशंकर अवस्थी "गुलरा के बाबा", "चीफ की दावत", "मलबे का मालिक" जैसी कहानियों से देते हैं। 60 के बाद की कहानी का लेखक इससे भिन्न दृष्टि अपनाता है। वह कहानी के पात्रों की तरह ख़ुद भी अपनी दुनिया से अपरिचित है। उसे संबंधों की प्रमाणिकता का न तो ज्ञान है, और न ही वह कार्य-कारण की जानकारी से लैस होकर कहानी लिखने बैठता है। देवीशंकर अवस्थी सृजन-प्रक्रिया में आने वाले कालिक बदलाव को इस प्रकार रेखांकित करते हैं- "चौथे, पाँचवें दशकों के लेखक "यथार्थ का सृजन" करते थे, तो पचास के लेखक यथार्थ को अभिव्यक्ति करते हैं, पर एकदम नया समकालीन कहानीकार यथार्थ को खोजता है।"14 किसी भी "दर्शन" के बने बनाये नियमों के बजाय समकालीन कहानीकार अपनी रचना-प्रक्रिया में यथार्थ का जो दर्शन गढ़ता है वह उसके बदले हुए समाजबोध का प्रमाण है। "नयी कहानी" में उपेक्षित पात्रों का स्मरण, स्मृतिशेष आंचलिकता, विभाजन का यथार्थ एक आशावादी स्वर के रूप में उपस्थित था। नये कहानीकारों में भविष्य के प्रति एक दृष्टि थी और उसी के आधार पर वे कथानक का ढाँचा तैयार करते थे- मार्कण्डेय, कमलेश्वर और शिवप्रसाद सिंह की कहानियों में भविष्य के प्रति इस आस्थावादी स्वर का चित्र दिखायी पड़ता है। देवीशंकर अवस्थी के अनुसार इन कहानियों में इसी की खोज की जाती है। समकालीन कहानी भविष्य के अंधकार, संसदीय लोकतंत्र से जन की आशाओं पर होने वाले कुठाराघात, ज़िन्दगी की टूटती स्थितियों के प्रति किसी तार्किक संबंध के अभाव में- कहानियों में भी परिस्थिति और घटनाओं के बीच "लॉजिकल कनेक्शन" नहीं मिलता। ऐसी कहानियों के मूल्यांकन के संदर्भ में अवस्थी जी का यह मानना सही है कि-

"साहित्यिक मूल्यांकन के समय आस्थावादी स्वर सबसे अप्रमाणिक ठहरते हैं चाहे वह "अंधायुग" में हो या "आत्मजयी" के नचिकेता में या "उजड़े हुए लोग; "नीराजना", "मलबे का मालिक" और "आर्द्रा" में। साहित्य इन रचनाओं में वही उभरता है, जहाँ पराजय है, हताशा है, प्रश्न है- उत्तर नहीं।15

कहना न होगा कि देवीशंकर अवस्थी "नई कहानी" के समूचे आन्दोलन को स्थितियों और परिस्थितियों के मध्य बनते-बिगड़ते रिश्तों में व्याख्यायित कर उन्होंने कथा-समीक्षा की एक नयी परम्परा चलायी। जिसे सुधीश पचौरी ने अपनी पुस्तक "उत्तर यथार्थवाद" में "तीसरी परम्परा" के नाम से पुकारा है। हिन्दी में कथा-समीक्षा का आरम्भ (विशेषकर नई कहानी के दौर में) देवीशंकर अवस्थी से मानकर सुधीश पचौरी ने नामवर सिहं के बरक्स अवस्थी जो को बड़े कथा आलोचक का दर्जा दिया है। देवीशंकर अवस्थी "नई कहानी" के प्रमुख कथा-समीक्षक है। उनकी पुस्तक "नई कहानी: संदर्भ और प्रकृति" कथा आलोचना की समकालीन पीढ़ी की समग्र सोच-विचार का दस्तावेज़ है। एक ऐसा दस्तावेज़ जिसमें संकलित लेख "नई कहानी" के बदलते संदर्भ तथा उसकी बनती प्रकृति को विविध कोणों से परिभाषित, व्याख्यायित करते हैं।

शोध छात्र,
भारतीय भाषा केन्द्र (भाषा संस्थान)
जे.एन.यू., नई दिल्ली-67
मोबाइल: 09999108490
ई-मेल: dnathjnu@gmail.com

संदर्भ सूची

1. पृष्ठ संख्या 90, मुक्ति बोध रचनावली खण्ड-5 (पेपर बैक्स, 2007)
2. पृष्ठ संख्या 40, आलोचना का द्वन्द्व-देवीशंकर अवस्थी, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 1999
3. पृष्ठ संख्या 128, रचना और आलोचना-देवीशंकर अवस्थी, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 1995
4. पृष्ठ संख्या 130, आलोचना का द्वन्द्व-देवीशंकर अवस्थी, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 1999
5. पृष्ठ संख्या 53, हिन्दी कहानी रचना और परिस्थिति-सुरेन्द्र चौधरी, अंतिका प्रकाशन, गाजियाबाद, 2009
6. पृष्ठ संख्या 87, कहानी नयी कहानी, नामवर सिंह, लोकभारती, इलाहाबाद, 2005
7. पृष्ठ संख्या 22, उत्तर यथार्थवाद, सुधीश पचौरी, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2004
8. पृष्ठ संख्या 134, रचना और आलोचना, देवीशंकर अवस्थी, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 1999
9. पृष्ठ संख्या 5, विवेक के रंग, देवीशंकर अवस्थी, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 1999
10. पृष्ठ संख्या 140, रचना और आलोचना, देवीशंकर अवस्थी, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 1999
11. पृष्ठ संख्या 225, सामना, वीर भारत तलवार, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2005
12. पृष्ठ संख्या 155, रचना और आलोचना, देवीशंकर अवस्थी, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 1995
13. पृष्ठ संख्या 155, (वही)
14. पृष्ठ संख्या 156, (वही)


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