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ISSN 2292-9754

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10.14.2018


कालजयी साहित्यकार डॉ. रामविलास शर्मा

शोध संक्षेप

डॉ. रामविलास शर्मा हिन्दी के महान आलोचक हैं। हिन्दी की शुक्लोत्तर, आलोचना में उनका स्थान विशिष्ट है। उन्होंने लगभग सौ पुस्तकों की रचना कर हिन्दी साहित्य-भंडार में श्रीवृद्धि की है। आज हिन्दी-जगत् में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, प्रेमचंद्र, रामचंद्र शुक्ल, निराला और महावीर प्रसाद द्विवेदी के विषय में डॉ. रामविलास शर्मा के मत प्रतिष्ठित हैं। डॉ. शर्मा की पहली हिन्दी आलोचना वस्तुतः कविता की ही आलोचना थी। उन्होंने कविता, कथासाहित्य, नाटक और आलोचना इन सबों की आलोचना की है। हिन्दी-आलोचना को उनकी सबसे बड़ी देन यह है कि उन्होंने साहित्य में शुक्ल जी के भौतिकवादी दृष्टिकोण को वैज्ञानिक रूप में विकसित कर उसे सामाजिक परिर्वतन के एक सांस्कृतिक अस्त्र के रूप में और अधिक कारगर बना दिया है। प्रस्तुत शोधपत्र में कालजयी साहित्यकार के रूप में डॉ. रामविलास शर्मा के अवदानों पर विचार किया गया है।

प्रस्तावना

डॉ. रामविलास शर्मा का जन्म 10 अक्टूबर, सन् 1912 में उन्नाव जिले के एक गाँव ऊँच गाँव सानी में हुआ था। अपनी आत्मकथा ’अपनी धरती अपने लोग’ के प्रारंभिक अंश में वे व्यक्त करते हैं- “पितृविसर्जनी अमावस्या, संवत् 1969 रात का अँधेरा भाग रहा था, पितर विदा हो रहा थे। तब मैंने भारत की धरती का स्पर्श किया। स्थान- ऊँच गाँव सानी, जिला उन्नाव, प्रांत का नाम संयुक्त प्रांत। धरती का स्पर्श याद नहीं, पहला स्पर्श जो याद है, वह माँ का नहीं, बाबा का है। सौर से निकलते ही वह मुझे अपने पास सुलाने लगे थे। कहते थे, माँ सोते में करवट लेगी तो बच्चा कुचल जाएगा। माँ तब 21-22 की रही होगी। मेरी पिता की वह तीसरी पत्नी थीं। भैया मुझसे 6 साल बड़े थे। उनके जन्म के समय वह सोलह की रही होगी। बाबा का सोचना कुछ ग़लत नहीं था।

ठंड से बचाने के लिए बाबा मेरे सिर पर सूती कनटोप लगा देते थे। सोने के पहले माँ आँखों में काजल लगाती थी। काजल लगी आँखें सबेरे चिपक जाती थी। माँ पलकों के बाल रगड़कर धोती थी। आमतौर से यह काम बाबा करते थे।

बाबा जहाँ जाते थे, मुझे साथ ले जाते थे। कभी कमर पर कनिया, कभी और ऊँचे वह कांधे पर बिठा लेते थे।”1

डॉ. रामविलास शर्मा का परिवार

 के साँतवें और अंतिम खंड में रामविलास शर्मा ने ’परिवार की बात’ के अंतर्गत परिवार की संरचना, परिवार में स्त्रियों की स्थिति, नई पीढ़ी की स्थिति और परिवार का सांस्कृतिक वातावरण शीर्षक से जहाँ कुछ सैद्धांतिक चर्चा की है, वही उन तथ्यों पर भी प्रकाश डाला है कि पूँजीवादी युग में भी परिवार में स्वस्थ और हार्दिक वातावरण कैसे पनप सकता है, जो परिवार को पूँजीवादी समाज-व्यवस्था की विकृतियों से बचा सकता है। 1857 का क्रांति के बाद अवध के किसानों का बड़ी संख्या में सेना की ओर आर्कषण के कारणों पर टिप्पणी करते हुए रामविलास शर्मा लिखते हैं- “घर में किसानी से अब पूरा न पड़ता था, फौज में भर्ती होने का यह मुख्य कारण था .. अंग्रेज़ी राज में पुराने संयुक्त परिवार का ढाँचा किसानों के बढ़ते हुए शोषण से टूट रहा था, गाँव में विलायती माल की बिक्री से न टूट रहा था, इसका प्रमाण मेरे परिवार का इतिहास है।”2

ब्याह-शादी

’घर की बात’ में रामविलास शर्मा के भैया भगवान दीन को लिखे गये बहुत से पत्रों के उद्धरण भी मौजूद हैं, जिसमें उन्होंने विवाह, दांपत्य और पत्नी-संबंधी विचारों को विस्तार से व्यक्त किया है। चूँकि रामविलास शर्मा बाल-विवाह के शिकार थे, उसकी बुराइयों को समझते थे। यही कारण है कि मुंशी और दूसरे भाइयों के जल्दी किए जाने वाले विवाह का रामविलास शर्मा ने विरोध किया और दौआ की समझदारी एवं सहयोग के कारण इसमें सफल भी हुए।”3

“भाइयों के विवाह के नाम पर, आज से कई दशक पूर्व जिस खुली, उदार और व्यावहारिक प्रगतिशील दृष्टि का परिचय ’घर की बात’ पुस्तक में मिलता है, वह रामविलास शर्मा की शब्द और कर्म की एकता का साक्ष्य तो है ही, आज के बहुत से कथित क्रांतिकारी बुद्धिजीवियों और विचारकों के लिए एक मॉडल का काम भी कर सकता है। अवस्थी के विवाह के लिए तय होता है कि कोई भी ठिक ग्यारह रुपये से अधिक नहीं होगा और तिलक के लिए भोपाल से लखनऊ आकर परेशान होने की ज़रूरत नहीं है- वे ग्यारह रुपये मनीआर्डर से भिजवा दिए जायँ, इस विवाह को लेकर अवस्थी की पत्नी, रक्षा का संस्मरण और मुंशी के विवाह को लेकर उनकी पत्नी, धन्नो-धन्वंतरि देवी का संस्मरण इस परिवार और रामविलास शर्मा के विवाह-संबंधी दृष्टिकोण को उद्घाटित करते हैं। मुंशी के विवाह में बक़ायदा कम्युनिस्ट इंटरनेशनल गाया गया था और विवाह में अधिकांशतः पार्टी के सदस्य और कायकर्ता शामिल हुए थे।”4

शिक्षादीक्षा और विद्वानों से संपर्क

श्रामविलास शर्मा अपनी आत्मकथा (पहले खंड) ’मुंडेर पर सूरज’ में अवध के पश्चिमी भाग वैसवाड़ा के अपने पितृग्राम, ऊँच गाँव सानी से, सन् 1912 पितृविर्सजनी अमावस्या के दिन अपने जन्म से शुरू करते हैं। गाँव के मठ-मंदिर, मेले-उत्सव और ताल-तलैयों की पृष्ठभूमि में एक बालक के रूप में अपने विकास को वे गहरी अंतरंगता के साथ अंकित करते चलते हैं। बचपन में बाबा से सुने हुए कवित्त और कहानियाँ जैसे अनजाने ही उनके अंदर एक लेखक का बीज बो रहे थे। पिता दडबा, झाँसी में नौकरी करते थे और सदर बाज़ार में रहते थे। वही सरस्वती पाठशाला में उनकी पढ़ाई शुरू हुई। स्कूल के अध्यापकों द्वारा पड़ने वाले प्रभाव और संस्कारों की चर्चा रामविलास शर्मा ने की है।”5

सन् 1930 में झाँसी से इंटरमीडियट करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए वे लखनऊ विश्वविद्यालय जाने का निर्णय लेते हैं। लाल कुएँ मोहल्ले की छितवांपुर नामक बस्ती में ससुर की कोठरी ही लखनऊ में उनका पड़ाव थी। इस परिर्वतन की ओर संकेत करते हुए रामविलास शर्मा ने लिखा है, “लाल कुएँ से जब हम यूनिवर्सिटी की तरफ़ जाते थे तो लखनऊ ने जो पहला प्रभाव मेरे मन पर छोड़ा, वह था कि यहाँ की सड़कें चौड़़ी हैं। झाँसी की सड़कें उसके मुकाबले बहुत तंग मालूम होती थीं। लगता था, मैं बिल्कुल दूसरी तरह के शहर में आ गया हूँ। गोमती का पुल पार करके जब हम यूनिवर्सिटी में पहुँचे तो वहाँ की इमारत तो और भव्य थी। झाँसी का हमारा कॉलेज उनके सामने बहुत ही छोटा मालूम होता था। मैकडनल हाईस्कूल की इमारत बहुत अच्छी बनी थी। लेकिन लखनऊ यूनिवर्सिटी की जो इमारतें थी उनकी भव्यता का क्या कहना।”6

"पढ़ाई, शोधकार्य और यूनिवर्सिटी में अध्यापन के सिलसिले में डॉ. रामविलास शर्मा सन् 1930 से सन् 1943 तक लखनऊ में रहे। लखनऊ प्रवास की यह अवधि उनके जीवन में विशेष महत्व रखती है। वस्तुतः यही वह काल है जिसमें वे अपनी विश्वदृष्टि का निर्माण करते अपने भविष्य का संकेत देते हैं। किसान-जीवन के गहरे संस्कार लेकर वे झाँसी से लखनऊ आए थे। यहाँ अपने ससुर के पास रहकर मज़दूरों की बस्ती में, उन्हें मज़दूरों के जीवन को भी निकट से देखने का अवसर मिला। --कारखाने के फाटक पर मज़दूरों की सभाएँ आदि सब कुछ उन्होंने यहीं देखा। कारखाने की तरफ़ जाने पर कभी-कभी जलती हुई भट्टियाँ और लोहा पीटते मज़दूर भी बाहर से दिखाई देते थे। इसी परिवेश में, हीरालाल कुम्हार के हाते में उन्होंने गोर्की की ’माँ’ पहली बार पढ़ी। लखनऊ का उनका यह सुदीर्घ प्रवास काल उनमें समाजवादी विचार और साहित्य के प्रति अभिरुचि जमाने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यहाँ एक ओर यदि वे निराला, उग्र, पंत जी, अमृतलाल नागर सहित अनेक लेखकों के आत्मीय संपर्क में आए, वहीं दूसरी ओर यूनिवर्सिटी में अध्यापन करने वाले उन लोगों के संपर्क में आए जो आगे चलकर अपने क्षेत्र में अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के स्वामी बने। प्रो. राधकमल मुखर्जी, डॉ. राधा कुमद, धूर्जटी प्रसाद मुखर्जी और प्रो. सिद्धान्त आदि इसी प्रकार के लोग थे। लेकिन इन लोगों की ख्याति के बावजूद रामविलास शर्मा इनके आचार-विचार और जीवनपद्धति की आलोचनात्मक दृष्टि से पड़ताल करते थे। यहीं एक दिन निराला से मिलने आने पर उनकी भेंट जयशंकर प्रसाद से भी हुई थी। वापसी में काफ़ी दूर तक वे उन्हें छोड़ने भी गए थे। --सन् 1940 ई. में यूनिवर्सिटी के किसी आयोजन में आचार्य रामचंद्र शुक्ल के आने पर उनसे रामविलास शर्मा ने बक़ायदा हाथ मिलाया था।”7

यह यूनिवर्सिटी में भी राष्ट्रीय और प्रगतिशील चेतना के विकास और प्रसार का काल था। तब आदमी की भाषा और पोशाक उसके विचारों और जीवन-पद्धति की पहचान थी। अंग्रेज़ी के अध्यापक होने पर भी हिन्दी के समर्थन में डॉ. रामविलास शर्मा ने उस समय के दिग्गज महारथियों- दस्तूर बी.बी.जोन, अतलेंदु बोस आदि से टक्कर ली थी। अपने इस कथित अंग्रेज़ी विरोध पर टिप्पणी करते हुए वे लिखते है, "मैं केवल हिन्दी का नहीं, अंग्रेज़ी के मुकाबले सभी भारतीय भाषाओं का समर्थन कर रहा था।”8

सारांश यह है कि डॉ. रामविलास शर्मा की प्रारंभिक शिक्षा झाँसी में हुई। लखनऊ विश्वविद्यालय से 1932 ई. में बी.ए. की परीक्षा में उत्तीर्णता प्राप्त की। 1938 ई. में लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में पीएच.डी. करने वाले वे प्रथम शोध छात्र थे। उनके शोध का विषय था - “प्रि रैफे लाइट्स एंड कीट्स”। इसके बाद पाँच वर्षों तक लखनऊ विश्वविद्यालय के अंग्रेज़ी विभाग में अध्यापन किया। वहीं आचार्य रामचंद्र शुक्ल से भेंट हुई। निराला जी से परिचय लखनऊ में हुआ। 1934 ई. में निराला पर शर्मा जी ने पहला लेख लिखा। सन् 1943 से 1971 तक आगरा के बलवंत राजपूत कॉलेज में अंग्रेज़ी विभाग के अध्यक्ष रहे। आगरा विश्वविद्यालय के कुलपति के अनुरोध पर “कन्हैयालाल मणिकलाल मुंशी हिन्दी संस्थान” के निदेशक बने। वहाँ से 1974 ई. में अवकाश ग्रहण किया। रामविलास शर्मा 1940 से 1953 ई. तक अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखकसंघ के महासचिव रहे। उनकी मृत्यु 2000 ई. में हुई।

कुशल अध्यापक

डॉ. रामविलास शर्मा के एक शिष्य हरदयाल ने अपने एक संस्मरण ’गुरूवर’ में उल्लेख किया है कि वे एक कुशल अध्यापक थे। हरदयाल ने लिखा है, “जब रामविलास शर्मा के नाम और निबंधों से परिचित हुआ था, तब यह कल्पना भी नहीं की थी कि कभी डॉ. शर्मा की कक्षा में बैठकर साहित्य पढ़ने का सौभाग्य मिलेगा। यह सौभाग्य मुझे 1957 ई. में मिला जब मैं बी.ए. में पढ़ने के लिए आगरा आया और बलवंत राजपूत (अब राजा बलवंत सिंह कॉलेज) में दाखिला लिया। यह अवसर मुझे इसलिए भी मिला कि मैंने अनिवार्य साहित्य अंग्रेज़ी के अतिरिक्त वैकल्पिक विषय के रूप में अंग्रेज़ी साहित्य को भी चुना। शर्मा जी सामान्य अंग्रेज़ी की कक्षाएँ नहीं पढ़ाते थे, लेकिन अंग्रेज़ी साहित्य की स्नातक कक्षाएँ पढ़ाते थे। बी.ए. के दोनों वर्षों में उनसे अंग्रेज़ी के स्वच्छदतावादी कवियों की कविताएँ एवं शेक्सपियर मैंने पढ़ा है। जिस ढंग से उन्होंने ये कविताएँ और शेक्सपियर का नाटक पढ़ाया था, वह ढंग आज भी मेरी स्मृति में है। शर्मा जी कुर्सी या मेज़ पर बैठकर नहीं पढ़ाया करते थे अपितु हमेशा खड़े होकर पढ़ाते थे। अंग्रेज़ी की कक्षा में सभी अध्यापक अंग्रेज़ी में ही पढ़ाते थे। कई अध्यापकों की अंग्रेज़ी तो हमारे सिर के ऊपर से निकल जाती थी, लेकिन जब रामविलास शर्मा पहली बार कक्षा में आए तो उन्होंने अंग्रेज़ी साहित्य लेने वाले छात्रों को आश्वस्त किया कि धीरे-धीरे अंग्रेज़ी समझ में आने लगेगी। उनके इस आश्वासन से भी बड़ा आश्वासन उनकी छोटी-छोटी एकाक्षरी शब्दों और छोटे-छोटे सरल वाक्यों वाली अंग्रेज़ी तथा उनका पढ़ाने का ढंग था। ऐसी सरल और सरस अंग्रेज़ी सुनने का अवसर मुझे जीवन में बहुत कम मिला है।”9

“उन दिनों डॉ. शर्मा प्रायः सूट पहनते थे और हैट भी लगाते थे लेकिन चेहरे पर हमेशा खिली रहने वाली मुस्कुराहट, पढ़ाते समय बीच-बीच में व्यंग्य-विनोद और प्रसंगानकूल उनके हाव-भाव हमें इतना मग्न कर देते थे कि पता ही नहीं चलता था कि कब घंटा ख़त्म हो गया। उनकी कक्षा में एक छात्र के रूप में बैठकर शिक्षा प्राप्त करके मैं औपचारिक रूप में तो उनका शिष्य बना ही था, कक्षा के बाहर भी मैंने उनकी गुरूता स्वीकार की है।”10

कुशल संपादक

“कोई भी लेखक या साहित्यकार जब किसी पत्रिका का संपादक बनता है तो उसके अंदर अपना भविष्य बनाने की भी चिंता होती है, जो उसके नाम को आगे बढ़ा सके।”11

भीष्म साहनी का वक्तव्य द्रष्टव्य है- “संपादक बनने पर दृष्टि अधिक वस्तुनिष्ठ होने लगती है। अक्सर संपादक अपनी रचनाएँ छपवाना पसंद नहीं करते। वह यह आरोप भी सुनना नहीं चाहते कि वह अपनी ही दृष्टि के लेखकों की रचनाओं को प्राथमिकता दे रहे हैं। घिसीपिटी लाइन पर चलना भी पसंद नहीं करते, पत्रिका में कुछ परिवर्तन लाना ज़रूर चाहते है। नये लेखकों को ढूँढ़ निकालने में उन्हें विशेष सुख मिलता है।”12

दरअसल संपादक की अपनी दृष्टि होती है। वह दृष्टि अगर साफ़, सजग है तो निश्चित रूप से पत्रिका के लिए सहायक होते हैं। रामविलास शर्मा में कुशल संपादक के सभी गुण विद्यमान हैं।

“सांस्कृतिक पत्रकारिता में अनेक ऐसे व्यक्तित्व हैं जिन्हें मीडिया ने भीतर या बाहर से सम्मान दिया है। मूल कारण तो उनके ज्ञान का लोहा और अन्य प्रमुख कारण मीडिया की ज़रूरत के हिसाब से अपने को तैयार करना। एक लंबी परंपरा जो बाबू पराड़कर, माखनलाल चतुर्वेदी, महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद्र, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, साही, अज्ञेय, हरिशंकर परसाई, धर्मवीर भारती, कमलेश्वर, रघुवीर सहाय से बनती है उसके बीच में रामविलास शर्मा भी समादृत है।”13

डॉ. शर्मा के संपादन में आलोचना मासिक ’समालोचक’ का प्रकाशन फरवरी 1958 से शुरू हुआ।

दो वर्ष निकलकर जनवरी 1960 के अंक के साथ ही वह बंद हो गया। इसका संचालन-प्रकाशन विनोद पुस्तक मंदिर, आगरा से होता था।

’समालोचक’ के मुख्य संपादक डॉ. रामविलास शर्मा के साथ उनके सहयोगियों के रूप में विश्वंभर नाथ उपाध्याय और राजनाथ शर्मा थे। ’समालोचक’ फरवरी 1958 में सौन्दर्यशास्त्र पर केंद्रित विशेषांक के रूप में आया। डॉ. रामविलास शर्मा ने साहित्य में आलोचना की आवश्यकता का जिक्र करते हुए ’समालोचक’ के प्रकाशन के उद्देश्य पर भी प्रकाश डाला- “आलोचना आवश्यक है, उपयोगी है, हिन्दी के आलोचना-साहित्य के विकास की अनेक संभावनाएँ विद्यमान हैं, इसलिए इस कार्य में विनम्र सहयोग के रूप में ’समालोचक’ का यह प्रकाशन है।”14

’समालोचक’ पत्रिका की पहली वर्षगाँठ पर फरवरी 1959 ई. में, उसका यथार्थवाद विशेषांक प्रकाशित हुआ।

समालोचक दो वर्ष प्रकाशित हुआ। शिवदान सिंह चौहान, प्रकाशचंद्र गुप्त, हंसराज रहबर, महादेव साहा, चंद्रवली सिंह, अमृतराय आदि के लेख उसमें प्रकाशित हुए।

“एक आलोचना पत्रिका के रूप में ’समालोचक’ का एक उल्लेखनीय पक्ष यह भी था कि उसमें डॉ. रामविलास शर्मा ने अपने कुछ प्रिय लेखकों से या फिर उनसे संबंधित बहुत कुछ ऐसा लिखवाया जो ’समालोचक’ पत्रिका के अभाव में शायद कभी संभव नहीं होता। जिन ’तीन महारथियों के पत्र’ प्रकाशित हुए हैं, डॉ. रामविलास शर्मा को लिखित, उनमें से दो- वृंदावनलाल वर्मा और किशोरीदास वाजपेयी - के अनेक लेख या फिर इन लेखकों पर पत्रिका में प्रकाशित सामग्री का अपना विशेष और ऐतिहासिक महत्व है। इस शृंखला के तीसरे महारथी बनारसी दास चतुर्वेदी, थे जिनकी ’शहीदों के संस्मरण’ पर अपना लंबा संपादकीय उन्होंने ’समालोचक’ के समापन अंक में लिखा। इसी तरह अमृतलाल नागर की अपनी सुपरिचित और विशिष्ट शैली में लिखा गया स्तंभ “यदि मैं समालोचक होता”। कुछ ऐसी दुर्लभ प्रायः सामग्री से भरपूर है जो ’समालोचक’ के न निकलने पर शायद कभी लिखी ही नहीं जाती।”15

’समालोचक’ दिसंबर 1959 के अंक में यह आवश्यक सूचना प्रकाशित हुई, जिसमें जनवरी 1960 के अंक से पत्रिका बंद किए जाने की घोषणा संपादक रामविलास शर्मा की ओर से की गयी थी।
एक पत्रिका के रूप में ’समालोचक’ की दो वर्ष की फ़ाइलों से यह स्पष्ट है कि अनेक सीमाओं के बावजूद रामविलास शर्मा ने उसके सुधार एवं परिष्कार के लिए पर्याप्त श्रम किया।

पुरस्कार और सम्मान

रामविलास शर्मा को अनेक पुरस्कार और सम्मान मिले हैं। ’निराला की साहित्यसाधना’ पर शर्मा जी को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। हिन्दी अकादमी, दिल्ली ने रामविलास शर्मा को 51 हज़ार रुपये का श्लाका पुरुष सम्मान दिया। हिन्दी अकादमी, उत्तरप्रदेश ने डेढ़ लाख का भारत भारती पुरस्कार दिया। बिरला के नाम पर स्थापित संस्था ने लगभग इतनी ही राशि का सरस्वती सम्मान दिया। उन्होंने राशि नहीं ली।

’भारत भारती सम्मान’ के बारे में अपना वक्तव्य देते हुए 5 अगस्त, 1990 को रामविलास शर्मा ने कहा था, “भारत के बहुसंख्यक हिन्दी भाषी राज्य निरक्षरता में अनेक अहिंदी राज्यों से आगे है। सारे देश की सामाजिक-सांस्कृतिक प्रगति के लिए यह स्थिति अत्यन्त चिंताजनक है। इससे हिन्दी साहित्य का जनाधार संकुचित रहता है और अपनी संख्या के अनुसार हमारी जनता राष्ट्र के जीवन में अपनी समुचित भूमिका नहीं निबाह पाता। यह स्थिति बदली जा सकती है। हिन्दी भाषी राज्य पुरस्कारों के रूप में प्रति वर्ष लाखों रुपये बाँटते है। यह धनराशि यदि ग़रीब छात्रों में बाँट दी जाय और उन्हें साक्षरता-प्रसार के काम में लगाया जाय तो केरल की तरह हम भी बीसवीं सदी का अंत होते-होते अपने यहाँ निरक्षरता को मिटा सकते हैं।

उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान ने अपने सर्वोच्च सम्मान से मुझे अलंकृत करने का जो निर्णय लिया है, उसके लिए मैं आभार प्रकट करता हूँ। मैं सम्मान स्वीकार करता हूँ। उसके साथ अलंकरण की धनराशि अस्वीकार करता हूँ। संस्थान चाहे तो मेरे सुझाव के अनुसार उसे साक्षरता-प्रसार पर खर्च कर सकता है।”16

रामविलास शर्मा को 1970ई. में ’निराला की साहित्यसाधना’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया था। 1988 ई. में प्रथम श्लाका सम्मान दिया गया। 1991 ई. में ’भारत के प्राचीन भाषा परिवार और हिन्दी’ के लिए प्रथम व्यास सम्मान दिया गया था।

रामविलास शर्मा का व्यक्तित्व

“किसी भी साहित्यकार के व्यक्तित्व को जानने के लिए हमें तीन बातों का ध्यान रखना पडे़गा युगचेतना, मन के संस्कार और जीवन की परिस्थितियाँ। उन्ही तीन उपादानों से साहित्यकार का व्यक्तित्व सँवरता है।”18
किसी भी कलाकार की कृति पर उसके व्यक्तित्व की छाप रहती है। होलबुक जैक्सन ने अपनी पुस्तक ’पाठक और आलोचक’ में ठीक ही कहा है- “किसी भी साहित्यकार की रचना का पूर्णानंद तभी प्राप्त होता है जब उस साहित्यकार की अनुभूति अथवा साहित्य में उसकी छाप का आभास मिल सके। अतः कलाकार के व्यक्तिगत जीवन से परिचित होना उसके रचना की वास्तविक व्यंजना को समझने के लिए अत्यन्त आवश्यक है।”19

सारांश यह है किसी भी लेखक एवं साहित्यकार के कृतित्व को उसके व्यक्तिगत जीवन एवं अनुभवों से पृथक करके नहीं देखा या परखा जा सकता क्योंकि साहित्यकार के विचार और भावनाएँ उसके जीवन से फूट कर निकलती हैं और उसका कृतित्व उसके संपूर्ण जीवन की प्रतिच्छाया होती है। साहित्यकार का व्यक्तित्व एवं कृतित्व दोनों उसी तरह मिले होते हैं, जैसे वाणी के साथ अर्थ होता है।
“व्यक्तित्व की पहचान आचरण और चिंतन से होती है। चिंतन की अभिव्यक्ति लेखन में फलीभूत होती है। रामविलास शर्मा का लेखन उनके साहित्य और सामाजिक चिंतन और प्रतिबद्धता का प्रमाण है। रामविलास शर्मा के साहित्य के साथ-साथ उनका व्यक्तित्व पूँजीवादी अपसंस्कृति का विरोधी है।”20

“रामविलास शर्मा चक्रवर्ती विद्वान होते, नोबेल पुरस्कार विजेता होते- ’लेकिन साई इतना दीजि, जा में कुटुम समाय’ को आचरण में उतारने वाले न होते तो इतने प्रेरणादायक न होते। सुंदर साहित्य की रचना करने वाले में यदि आचरण की सभ्यता और कर्मसौन्दर्य भी हो तो उसका व्यक्तित्व साहित्य की देव-प्रतिमा बन जाता है और आज उनका व्यक्तित्व ऐसा ही हो गया है। ...जादू ईमानदारी का भी होता है और वह भी सर पर चढ़कर बोलता है।”21

“रामविलास शर्मा कुश्ती लड़ते थे। निराला से पंजा लड़ाते थे पहलवानी करते थे। कहते हैं लखनऊ विश्वविद्यालय में कभी-कभी अखाड़े की धूल से चर्चित ही अंग्रेज़ी साहित्य की क्लास लेते थे। ...रामविलास शर्मा भयंकर पढ़ाकू समय के पाबंद और फ़ालतू चीज़ों और व्यक्तियों की फ़ौरन छुट्टी कर देने वाले आदमी हैं। लेकिन वह भयंकर बैठकबाज़ और ’गप्प रसाने’ वाले भी हैं।”22

हरदयाल ने ’गुरूवर’ संस्मरण में डॉ. रामविलास शर्मा के व्यक्तित्व की विशेषताओं को रेखांकित करते हुए लिखा है- “हिन्दी में ऐसे साहित्यकार कितने होंगे, जिन्होंने लाखों रुपये की पुरस्कार की राशि अस्वीकार कर दी हो? वह आगरा में जब तक रहे, साइकिल का उपयोग करते रहे और किसी प्रकार की हीनता का अनुभव नहीं किया।

...आज जबकि बड़े-बड़े लोग छोटे-छोटे समझौते कर रहे हैं, ईमानदारी के ऊपर समझदारी को तरजीह दे रहे हैं, और आर्थिक एवं पद-संबंधी लाभ कमाने के लिए अपने आत्मसम्मान को बेच रहे हैं तब इस अंधकार में मेरे जैसे न जाने कितने लोगों को डॉ. रामविलास शर्मा दीपस्तंभ बन कर मार्ग दिखा रहे हैं।”23

“व्यक्तित्व भी उनका विराट पर्वत सरीखा था- अचल और गंभीर, जिससे बीच-बीच में कुछ झरने भली ही फूटते हों लेकिन लगभग चौकन्नेपन और पुरानेपन के साथ वे अपने दुर्गा की रक्षा कुछ इस तरह करते हैं जैसे वही संतरी हमारा वही पासवां हमारा।”24

सरांश यह है कि रामविलास शर्मा का व्यक्तित्व बड़ा ही विलक्षण था। वे ईमानदार परिश्रमी एवं अच्छे इंसान थे। सादगी एवं मितव्ययिता उनके जीवन का मुख्य संचालन-सूत्र रहा है। उन्होंने अपना क़द बढ़ाने के लिए कभी दूसरों के कंधों का इस्तेमाल नहीं किया। आज साहित्य में इस तरह के आदमी की तलाश एक मुश्किल काम है।

कालजयी रामविलास शर्मा का कृतित्व

डॉ. रामविलास शर्मा एक कालजयी साहित्यकार है। अंग्रेज़ी के प्राध्यापक और डॉक्टर होकर भी वे हिन्दी को मूल्यवान अवदान दे गये। उनकी कुल पुस्तकों की संख्या सौ के आसपास है। उन्होंने आधुनिक काल के चार साहित्यकारों- भारतेन्दु हरिश्चंद्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद और ’निराला’ का मनोयोग से विवेचन किया है। डॉ. शर्मा ने अपनी पुस्तक ’भारतेन्दु हरिश्चंद्र और हिन्दी नवजागरण की समस्याएँ’ में दर्शाया है कि “देश में नवीन चेतना किन व्यक्तियों और किन संस्थाओं के माध्यम से विकसित हो रही थी और उनमें भारतेन्दु-युग के कवियों-नाटककारों-निबंधकारों तथा पत्र-पत्रिकाओं का क्या योग है? ’हिन्दी प्रदीप’, ’कविवचन सुधा’ जैसी पत्रिकाओं में विदेशी शासन के विरुद्ध जो टिप्पणीयाँ छप रहीं थीं तथा ब्राह्मण में जो आल्हे और लावनियाँ आ रहीं थीं उन्होंने उनको उद्धृत कर उस धारणा का संप्रमाण खंडन किया है, जिसमें कहा गया था कि हिन्दी-प्रदेशों के कवि-लेखकों ने सिपाही-विद्रोह के संबंध में प्रायः मौन साध रखा था या अँगरेज़ों की नीति का समर्थन किया।”25
डॉ. रामविलास शर्मा ने ’हिन्दी प्रदीप’ का महत्व प्रतिपादित करते हुए लिखा है, “बालकृष्ण भट्ट का 32 वर्षों तक ’हिन्दी प्रदीप’ चलाना एक ऐतिहासिक घटना है। धुन और लगन का इससे बड़ा उदाहरण हिन्दी साहित्य के इतिहास में दूसरा नहीं है।”26

’महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण’ में डॉ. रामविलास शर्मा नवजागरण संबंधी अपनी मौलिक अवधारणा उपस्थित करते है और किस प्रकार नवजागरण हिन्दी प्रदेशों की अपनी देन है, इसकी सप्रमाण चर्चा करते है। साथ ही द्विवेदी जी द्वारा किए गये भाषा-संशोधन के कार्यों के साथ रीति-विरोध को भी पर्याप्त महत्व देते हैं। इनके अतिरिक्त ’सम्पतिशास्त्र’ नामक एक अल्पज्ञात पुस्तक के द्वारा उनकी मानसिकता और जनभिमुखता को उभारने का प्रयास करते है। शर्मा जी ने ’संपतिशास्त्र’ को द्विवेदी जी की सबसे महत्वपूर्ण देन के रूप में प्रस्तावित किया है। उनका कथन है- “अभी तक हिन्दी में कोई ऐसा लेखक नहीं हुआ, जो साहित्यकार हो, साथ ही जिसे अर्थशास्त्र का ऐसा गहरा ज्ञान हो। ...इसका उद्देश्य है समकालीन भारत के अर्थतंत्र का अध्ययन करना। ...जो लोग भारत में अँगरेज़ी राज की भूमिका को समझना चाहते हैं, उनके लिए द्विवेदी जी की पुस्तक महत्वपूर्ण सामग्री है।”27

’प्रेमचंद्र और उनका युग’ में डॉ. रामविलास शर्मा ने डॉ. नगेन्द्र की भाँति प्रेमचंद्र को दोयम दर्जे का लेखक नहीं माना है। उन्होंने प्रेमचंद्र को स्वाधीनता-प्राप्ति के लिए छटपटाते देश का सबसे सशक्त कथाकार घोषित किया है और उनके उपन्यासों को ’भारतीय जीवन का महाकाव्य’ कहा है।

’कर्मभूमि’ की समीक्षा के क्रम में डॉ. शर्मा ने लिखा है “प्रेमचंद्र ने पहली बार मज़दूरों और विद्यार्थियों को एक साथ अँगरेजों का सामना करते दिखाया है। जैसा कि सभी लोग जानते है, इसके बाद भी नौजवानों ने अनेक बार मज़दूरों और किसानों के साथ मिलकर अँगरेजों का मुकाबला किया। प्रेमचंद्र ने राष्ट्रीय आंदोलन की एक मजबूत कड़ी को पकड़ा था और उसका यहाँ वर्णन किया है।”28

साथ ही “जब स्वराज का मतलब अँगरेजी साम्राज्य के अंदर ही रहना था, प्रेमचंद्र ने लगानबंदी को स्वाधीनता आंदोलन की रीढ़ बताया था...वह बराबर कोशिश कर रहे थे कि आज़ादी का आंदोलन किसानों की बुनियादी समस्याओं को अपने अंदर समेट ले, वह अँगरेजी राज के शोषण चक्र पर वार्निश करने के बदले उसे जड़ से खोदकर फेंक दे।”29

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के संबंध में डॉ. रामविलास शर्मा का अध्ययन महत्वपूर्ण है। इतना गहन और प्रमाणिक अध्ययन इससे पहले नहीं हुआ था। (आचार्य रामचंद्र शुक्ल और हिन्दी आलोचना) पुस्तक में डॉ. शर्मा ने लिखा है- “शुक्ल जी ने आलोचना-क्षेत्र में लोगों की रुचि बदलने, एक पूरी पीढ़ी को सामंती काव्यालोचन के प्रभाव से मुक्त करने, उसे स्वाधीनता चिंतन के नए मार्ग पर आगे बढ़ाने में सबसे अधिक काम किया। यह उनका युगांतकारी कार्य है, इसमें संदेह नहीं।”30

अपनी इस पुस्तक में डॉ. शर्मा शुक्ल जी के निबंधों का भी नई दृष्टि से महत्व आकलित करते है। उनका यह कथन ध्यातव्य है- “कविता केवल वस्तुओं के ही रूपरंग के सौन्दर्य की छटा नहीं दिखाती प्रत्युत कर्म और मनोवृति के सौन्दर्य में भी अत्यन्त मार्मिक दृश्य सामने लाती है।”31

’निराला की साहित्यसाधना’ पुस्तक में डॉ. शर्मा ने ’निराला’ जी के विषय में लिखा है- “निराला आधे मन से भोगी थे, आधे मन से सन्यासी।" 32

इस कथन के सहारे सूर्यकान्त त्रिपाठी ’निराला’ के कृतित्व का मूल्याकंन किया जा सकता है।
डॉ. रामविलास शर्मा की एक महत्वपूर्ण पुस्तक है- ’भाषा और समाज’ इस पुस्तक में डॉ. शर्मा ने दिखाया है कि हिन्दी और उर्दू एक ही भाषा की दो विभिन्न शैलियाँ हैं।

’भारतीय साहित्य की भूमिका’ में शर्मा जी ने संपूर्ण भारतीय वाङ्मय को एक इकाई मानकर उसका शील - निरूपण किया है।

बीसवीं शती के भारतीय सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक आंदोलनों के विवेचन-मूल्यांकन के लिए गाँधी, अम्बेडकर और लोहिया का समवेत चयन डॉ. रामविलास शर्मा की विलक्षण बुद्धि, विस्तीर्ण ज्ञान तथा गंभीर प्रतिबद्धता का सूचक है। अपनी मंतव्य वे अपनी एक टिप्पणी में इस तरह स्पष्ट करते है - “गाँधी, अम्बेडकर, लोहिया - ये तीनों वर्तमान भारत के राजनीतिक और सांस्कृतिक आंदोलनों के लिए प्रासंगिक है। तीनों भारतीय इतिहास के बारे मे सोचते हैं, जातिप्रथा से टकराते हैं, साम्राज्यवाद के प्रति अपना विशेष दृष्टिकोण अपनाते हैं, और समाज को बदलना चाहते हैं। जो लोग भी वर्तमान समाज व्यवस्था से असंतुष्ट हैं, उसमें परिवर्तन चाहते हैं, उन्हें इन तीनों का एक साथ अध्ययन करना चाहिए।”33

डॉ. रामविलास शर्मा के इस वृहद् ग्रंथ की आधारभूमि आज का भारत और इतिहास की समस्याएँ है, और इस आधरभूमि कोे गाँधी, अम्बेडकर और लोहिया के त्रिविध उपशीर्षकों में तीन खंडों में विभाजित किया गया है। गाँधी जी संबंधी खंड सबसे बड़ा 482 पृष्ठों का है, और इसमें आज के भारत के इतिहास और उसकी समस्याओं पर गाँधी जी के परिप्रेक्ष्य में 36 अध्यायों में विचार हुआ है। विवेच्य ग्रंथ के दूसरे खंड में उन्नीस अध्याय है। यह खंड बाबा भीमराव अम्बेडकर पर आधारित है। विवेच्य ग्रंथ का तीसरा खंड डॉ. राम मनोहर लोहिया पर आधरित है। धर्म, संस्कृति और इतिहास संबंधी चर्चा के साथ यह महत्वपूर्ण खंड समाप्त होता है।

’भारतीय संस्कृति और हिन्दी-प्रदेश’ शीषर्क दो खंडों और 1488 पृष्ठों के अपने श्रेष्ठ ग्रंथ में डॉ. शर्मा ने भाषायी (क्षेत्रीय) जातियों के संदर्भ में हिन्दी-जाति की उपेक्षा के संबंध में लगातार अपनी बेचैनी व्यक्त की है। “इसके पहले खंड में ऋग्वेद से कालिदास तक और दूसरे खंड में विद्यापति से निराला तक सांस्कृतिक इतिहास का विवेचन किया गया है। उनके अध्ययन का फलक बहुत व्यापक है।
महाभारत, महाभारत में गीता, वेद पुराण और धर्मशास्त्र में भक्ति और सदाचार की भूमिका आदि की वे विस्तारपूर्वक चर्चा करते है। पुस्तक के अंतिम तीन अध्याय दार्शनिक यथार्थवाद के विकास के संदर्भ में चरक, गौतम बुद्ध, कौटिल्य और कालिदास केद्रित है।”34 डॉ. रामविलास शर्मा की ’भारतीय संस्कृति और हिन्दी प्रदेश’ के दूसरे खंड में भारत पर तुर्कों के आक्रमणों से लेकर स्वाधीनता-प्राप्ति तक सांस्कृतिक इतिहास की अनेक समस्याओं का विवेचन है। इन समस्याओं के महत्व पर टिप्पणी करते हुए डॉ. रामविलास शर्मा ने लिखा है- “यही समस्याएँ महत्वपूर्ण हैं, यह मेरा आग्रह नहीं है। ये सभी विचारणीय है, यह मै अवश्य कहूँगा।”35

निष्कर्ष

शुक्लोत्तर हिन्दी आलोचना में डॉ. रामविलास शर्मा का विशिष्ट स्थान है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल, डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने हिन्दी साहित्य का मूल्यांकन, हिन्दी भाषा और साहित्येतिहास के आलोक में किया है। डॉ. रामविलास शर्मा इस परंपरा का विकास करने वाले आलोचक है। डॉ. शर्मा ने भाषा के क्षेत्र में शुक्ल जी और द्विवेदी जी से कम नहीं, ज़्यादा काम किया है। आज हिन्दी-जगत् में भारतेन्दु, प्रेमचंद्र, रामचंद्र शुक्ल, निराला, महावीर प्रसाद द्विवेदी के विषय में डॉ. शर्मा के मत प्रतिष्ठित है। डॉ. रामविलास शर्मा की प्रारंभिक पुस्तक ’भारतेन्दु युग’ है। यह पुस्तक इतिहास न हो, रेखाचित्र न हो, आलोचना न हो, लेकिन भारतेन्दु युग से बढ़कर इस युग का किसी आलोचक ने अब तक न इतिहास लिखा है न रेखाचित्र, न आलोचना। ’प्रेमचंद्र’ हिन्दी आलोचना में डॉ. शर्मा द्वारा लिखी गई पहली पुस्तक है जिसमें प्रेमचंद्र के महत्व को समझाया गया है। प्रेमचंद्र के कथासाहित्य के विषय में शर्मा जी ने लिखा- “प्रेमचंद्र के पूर्व चंद्रकांता और तिलस्म होशरूबा के पढ़ने वाले लाखों में थे। प्रेमचंद्र ने इन लाखों पाठकों को ’सेवासदन’ का पाठक बनाया, यह उनका युगांतकारी काम था।”36
डॉ. शर्मा ने प्रेमचंद्र की एक ऐसी विशेषता की ओर ध्यान दिलाया जिसकी ओर लोगों का ध्यान न पहले गया था, न बाद में। डॉ. शर्मा ने लिखा- “प्रेमचंद्र कबीर के बाद हिन्दी के सबसे बड़े व्यंग्यकार है, प्रेमचंद्र यथार्थ के बहाव को पकड़ते है, प्रेमचंद्र गहरे मनोवैज्ञानिक रचनाकार है।”

डॉ. रामविलास शर्मा ने आचार्य रामचंद्र शुक्ल को सामंतवाद -साम्राज्यवाद विरोधी एवं वस्तुवादी आलोचक बताया। “हिन्दी-साहित्य में शुक्ल जी का वही महत्व है जो उपन्यासकार प्रेमचंद्र या कवि निराला का।”37

भारतेन्दु, प्रेमचंद्र, निराला, रामचंद्र शुक्ल, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पर, लिखित पुस्तकों को एक साथ रख कर देखें तो पता चलेगा कि डॉ. शर्मा ने इन पाँचों महान साहित्यकारों की विवेचना करके आधुनिक हिन्दी-साहित्य का आशिंक इतिहास प्रस्तुत कर दिया है। ’निराला की साहित्य साधना’ का दूसरा खंड डॉ. रामविलास शर्मा की आलोचना का शिखर है।

डॉ. रामविलास शर्मा ने वाल्मीकि, कालिदास, भवभूति, शेक्सपियर, कीट्स, शैली पर प्रामाणिक विश्लेषणात्मक लेख लिखे हैं किन्तु डॉ. शर्मा रमते सबसे ज़्यादा तुलसी, निराला और शेक्सपियर मेें हैं।

डॉ. रामविलास शर्मा ने मार्क्सवादी आलोचना एवं सौन्दर्य-बोध को सबके लिए विश्वसनीय बनाया है। किसी अन्य भारतीय भाषा के साहित्य में अभी तक मार्क्सवादी आलोचना का इतना वर्चस्व नहीं बना हुआ है। डॉ. शर्मा के पहले हिन्दीआलोचना वस्तुतः कविता की आलोचना थी। उन्होंने कविता, कथासाहित्य, नाटक और आलोचना इन सबों की आलोचना की है। डॉ. शर्मा एक प्रतिबद्ध ही नहीं, एक महान आलोचक है। हिन्दीआलोचना को उनकी सबसे बड़ी देन यह है कि उन्होने साहित्य में आचार्य रामचंद्र शुक्ल के भौतिकवादी दृष्टिकोण को वैज्ञानिक रूप में विकसित किया और उसे सामाजिक परिवर्तन के एक सांस्कृतिक अस्त्र के रूप में और अधिक कारगर बना दिया है।

डॉ. रामविलास शर्मा हिन्दी के कालजयी साहित्यकार थे। वे युगपुरुष एवं हिन्दी के सच्चे प्रहरी थे। वे आधुनिक हिन्दी साहित्य के सुप्रसिद्ध, महान आलोचक थे। वे निबंधकार, संपादक, विचारक एवं कवि थे। वे व्यवसाय से अंग्रेज़ी के प्रोफेसर, दिल से हिन्दी के प्रकांड विद्वान, महान विचारक, ऋग्वेद और मार्क्स के अध्येता थे। वे इतिहासवेत्ता भाषाविद्, राजनीति, विशारद् सब थे। वे भारत के प्रथम व्यास सम्मान विजेता थे।
डॉ. रामविलास शर्मा निरंतर साहित्य सृजन करते रहे। उन्होंने लगभग सौ पुस्तकों की रचना की। उनकी कालजयी रचनाओं में ’भारतेन्दु युग’, ’महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण’, ’निराला की साहित्य साधना’, ’भाषा और समाज’, ’भारतीय संस्कृति और हिन्दी-प्रदेश’, ’गाँधी, अम्बेडकर लोहिया और भारतीय इतिहास की समस्याएँ’ हैं। उनके दो कविता-संकलन- ’रूपतरंग) और ’सदियों के सोये जाग उठे’ हैं। ’अपनी धरती, अपने लोग’, ’घर की बात’ आत्मकथात्मक रचनाएँ हैं। ’आस्था और सौन्दर्य’ एवं ’विराम चिह्न’ उनके निबंध-साहित्य के चुने हुए उदाहरण हैं।

डॉ. रामविलास शर्मा के साहित्यिक जीवन का आरंभ 1933 से हुआ जब वे सूर्यकांत त्रिपाठी ’निराला’ के संपर्क में आए। 1934 ई. में उन्होंने निराला पर एक आलोचनात्मक लेख लिखा जो पहला आलोचनात्मक लेख था। यह लेख चर्चित पत्रिका ’चाँद’ में प्रकाशित हुआ।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के बाद डॉ. रामविलास शर्मा ही एक ऐसे आलोचक के रूप में स्थापित हुए,जिन्होंने भाषा, साहित्य और समाज का एक साथ मूल्यांकन किया। उन्होंने समाज, अर्थ, राजनीति, इतिहास को एक साथ लेकर साहित्य का मूल्यांकन किया। अन्य आलोचकों की तरह उन्होंने किसी रचनाकार का मूल्यांकन केवल लेखकीय कौशल को जाँचने के लिए नहीं किया है बल्कि उनके मूल्यांकन की कसौटी यह है कि उस रचनाकार ने अपने समय के साथ कितना न्याय किया है।

डॉ. रामविलास शर्मा ने अपने उग्र एवं उत्तेजनापूर्ण निबंधों से हिन्दी-समीक्षा को नई गति प्रदान की है। उन्होंने सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक दोनों समीक्षा पद्धतियों से अपने विचारों को पुष्ट करने का प्रयास किया।

अज्ञेय जी द्वारा संपादित तारसप्तक (1943ई.) में एक कवि के रूप में, डॉ. रामविलास शर्मा की कविताएँ काफ़ी चर्चित हुईं। डॉ. शर्मा ने अपनी कविताओं के माध्यम से समय को शब्द देने की कोशिश की, शब्दों के माध्यम से समुद्र को बाँधने की कोशिश की।

“डॉ. रामविलास शर्मा ऐसे विरले कवि थे, जिन्होंने बने-बनाये फार्मूले से दूर और परम्पराओं से हटकर कविता रची। संभवतः कविवर भवानी प्रसाद मिश्र के बाद वे पहले रचनाकार थे, जिन्होंने परिवेश और प्रकृति के विविध बिम्बों की नई एवं स्वतंत्र खोज की। अपनी गंभीर संवेदना और भाव-आकारों से उनमें मानवी-भाव टटोले इसलिए उनकी कविता स्वाभाविक, मानवीय एवं बेशक़ीमती बनी। ये सच्च है कि समुद्र को कविता में बाँधना मुश्किल है। यह भी सच है कि ज़िन्दगी को वक़त की असीम,सीमा में बाँधा नहीं जा सकता किन्तु डॉ. रामविलास शर्मा ने अपने सीमित जीवन में प्रकृति-बिम्बों को जीवन की संवेदनाओं से बाँधने का सार्थक काम किया। डॉ. रामविलास शर्मा चार काव्यसंग्रहों के धनी हैं- ’कविता में सुबह’, ’ऋतुगंध’, ’समय को शब्द दो’ और ’बादल’। ’कविता में सुबह’ कविता की कविता में सही ’वापसी’ का प्रतीक है। डॉ. रामविलास शर्मा ने समय को शब्द दिए और ’बादल’ को अनेक रूपाकारों में बाँधा।”38

डॉ. रामविलास शर्मा की कविताएँ आस्थावान कवि की कविताएँ है। वे हमे ताज़गी और स्फूर्ति देती है। चालीस वर्षों से अधिक डॉ. रामविलास शर्मा शोषण और दबाव के विरुद्ध सही अर्थ पहचान देने वाली कविताएँ रचते रहे। कुँठा, निराशा, आस्थाहीनता से जूझते रहे। तभी वे ’कविता में सुबह’ उगा सके, हमें ’ऋतुगंध’ दे सके, ’समय को शब्द’ दे सके। बादल और समुद्र को कविता में साकार कर सके। कवि ने प्रकृति-काव्य परंपरा को अपने अस्तित्व के खतरे से उबारा, नवगीतकारों को प्रेरणा दी, प्रकृति का उदात्त मानवीकरण किया, चिरनवीन, अनछुए बिम्बों का सृजन किया, पौराणिक संदर्भो को नए आयाम दिये, मनुष्य और उसकी अस्मिता के प्रश्नों से जूझकर सच्ची प्रगितीशील चेतना की उपस्थिति दर्ज की और इसके परिणामस्वरूप कवि की ’प्रकृति’, ’प्रकृति के लिए’ न होकर ’प्रकृतिजीवन का पर्याय’ हो जाती है। शिल्प के स्तर पर, कविता का ऐसा संबंध, भाषा का ऐसा रूप विकसित किया कि बेनाम छपने पर भी सामान्य से सामान्य पाठक विश्वास के साथ कह उठता है कि ’यह तो डॉ. रामविलास शर्मा की कविता है।’ कवि के इन विशिष्ट अवदान से हिन्दी-जगत् ऋणी होने से मुकर नहीं सकता।”39

भारतीय साहित्य और संस्कृति में जो सर्वोतम है, वह डॉ. रामविलास शर्मा के साहित्य में है। यह साहित्य विश्व-साहित्य के सर्वोतम का एक वजनदार भाग है। डॉ. शर्मा का साहित्य वाल्मीकि, व्यास, कालिदास, भवभूति, तुलसीदास, सूरदास, जायसी, कबीर, मीरा, रसखान, भारतेन्दु, महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद्र जयशंकर प्रसाद, रामचंद्र शुक्ल, निराला की परंपरा को अपने में समेटकर विश्व-साहित्य की महान विरासत बन गया है। अपने उपर्युक्त अवदानों के कारण डॉ. रामविलास शर्मा एक कालजयी साहित्यकार बन गये।

लेखक - डॉ. दिलीप कुमार झा
फोर्टग्लास्टर विद्यालय,
राधानगर, हावड़ा, प. बंगाल, भारत

संदर्भ-ग्रंथ

1. ’आजकल’ पत्रिका, सितंबर, 1994, पृ. 13.
2. ’घर की बात’, लेखक डॉ. रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पटना, प्रथम संस्करण 1983.
3. ’मेरे अपने रामविलास’, ले.- मधुरेश, स्वराज प्रकाशन, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली, संस्करण, 2004, पृ. 107.
4. वही, पृ. 109.
5. वही, पृ. 112.
6. ’अपनी धरती अपने लोग’, लेखक- डॉ. रामविलास शर्मा, किताब घर नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 1916, पृ. 63.
7. ’मेरे अपने रामविलास’, ले. मधुरेश, स्वराज प्रकाशन, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली, संस्करण 2004, पृ. 114.
8. ’अपनी धरती अपने लोग’, लेखक- डॉ. रामविलास शर्मा, किताब घर, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 1996, पृ. 134.
9. ’गुरूवर’ संस्मरण, हरदयाल, ’’आजकल’’, सितंबर, 1994, पृ. 22.
10. वही, पृ. 22.
11. ’भीष्म साहनी के उपन्यासों में जीवन दर्शन’शोधप्रबंध, लेखक-डॉ. दिलीप कुमार झा, 2003, पृ. 93.
12. भीष्म साहनीः व्यक्ति और रचना, लेखक- भीष्म साहनी, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 1997, पृ. 47.
13. ’वसुधा’ पत्रिका, अप्रैल-जून, 2002, पृ. 519.
14. ’समालोचक’ फरवरी, 1958, पृ. 3.
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16. ’आजकल’ पत्रिका, सितंबर, 1994, पृ. 12.
18. ’प्रेमचंद्र प्रतिभा’ - डॉ. राजेश्वर गुरू, सरस्वती प्रेस, इलाहाबाद ( सं. इंद्रनाथ मदान) प्रंयुक्त संस्करण,1967 पृ. 249.
19. ’पाठक और आलोचक’ - होलबुक जैक्सन, पृ. 74.
20. ’आजकल’ सितंबर, 1994, पृ. 7.
21. ’आजकल’, लेखक विश्वनाथ त्रिपाठी, 1994, पृ. 8.
22. वही, पृ. 9.
23. ’गुरूवर’ संस्मरण-हरदयाल, ’आजकल’, सितंबर, 1994, पृ. 22.
24. ’वसुधा’ लेखक- प्रियदर्शन, अप्रैल-जून, 2002, पृ. 524.
25. ’वीणा’ पत्रिका जुलाई 2000 ई., पृ. 9.
26. ’छपते छपते’ दीपावली विशेषांक 2004 पृ. 76.
27. ’महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण’ लेखक डॉ. रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पटना, प्रथम संस्करण 1977, दूसरा संस्करण, 1989, पृ. 16.
28. ’प्रेमचंद्र और उनका युग’, ले. डॉ. रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन प्र. लि., नई दिल्ली, पटना, पाँचवां संस्करण, 1989, पृ. 88-89.
29. वही, पृ. 103.
30. ’आचार्य रामचंद्र शुक्ल और हिन्दी-आलोचना’, लेखक रामविलास शर्मा, विनोद पुस्तक मंदिर, आगरा, प्रथम संस्करण, 1955, पृ. 158.
31. वही, पृ. 218.
32. ’निराला की साहित्य साधना’, लेखक डॉ. रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन, तृतीय संस्करण, 1979, पृ. 483.
33. ’पल प्रतिपल’ (सं. देश निर्मोही), पंचकुला, जुलाई-सिंतबर, 2001, पृ. 264.
34. ’मेरे अपने रामविलास’ लेखक-मधूरेश, स्वराज प्रकाशन, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-2, संस्करण 2004, पृ. 120.
35. ’भारतीय संस्कृति और हिन्दी-प्रदेश’ (भूमिका), लेखक- डॉ. रामविलास शर्मा, किताब घर, नई दिल्ली, 1996, पृ. 215.
36. ’आजकल’ सितंबर, 1994, पृ. 11.
37. वही, पृ. 11.
38. ’वीणा’ मासिक पत्रिका, इंदौर, फरवरी, 1990, पृ. 4.
39. वही, अक्टूबर, 1990, पृ. 49.


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