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ISSN 2292-9754

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01.21.2018


भीष्म साहनी का साहित्यिक व्यक्तित्व और कृतित्व

शोध संक्षेप

हिन्दी साहित्य में भीष्म साहनी का स्थान विशिष्ट है। वे शोषित, पीड़ित मानवता के पक्षधर हैं। उन्होंने सात उपन्यासों की रचना कर हिन्दी उपन्यास-साहित्य की श्रीवृद्धि की है। यदि यह पूछा जाय कि उनके रचना-कर्म का सर्वाधिक सशक्त पक्ष कौन सा है, कहानीकार का, उपन्यासकार का, अथवा नाटककार का तो निश्चित उत्तर उपन्यासकार का ही होगा। प्रस्तुत शोधपत्र में भीष्म साहनी के साहित्यिक व्यक्तित्व और कृतित्व पर विचार किया गया है।

“भीष्म साहनी का साहित्यिक व्यक्तित्व और कृतित्व”

प्रस्तावना

किसी भी साहित्यकार का व्यक्तित्व और कृतित्व दोनों उसी प्रकार मिले होते हैं, जैसे वाणी के साथ अर्थ होता है। “किसी भी साहित्यकार के व्यक्तित्व को जानने के लिए हमें तीन बातों का ध्यान रखना पड़ेगा, युगचेतना, मन के संस्कार और जीवन की परिस्थितियाँ। इन तीन उपादानों से साहित्यकार का व्यक्तित्व सँवरता है।”1

“किसी भी साहित्यकार की रचना का पूर्णानंद तभी प्राप्त होता है जब उस साहित्यकार की अनुभूति अथवा साहित्य में उसकी छाप का आभास मिल सके। अतः कलाकार के व्यक्तिगत जीवन से परिचित होना उसकी रचना की वास्तविक व्यंजना को समझने के लिए अत्यन्त आवश्यक है।”2

भीष्म साहनी का सारा साहित्य उनके जीवन से घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ है। इनका संपूर्ण साहित्य इनके व्यक्तित्व तथा उस व्यक्तित्व का निर्माण करने वाली परिस्थिति को पूरी तरह प्रतिबिंबित करने में सक्षम है। भीष्म साहनी ने लिखा है- “साहित्य के क्षेत्र में मेरे अनुभव वैसे ही स्पष्ट और सीधे-सीधे रहे, जैसे जीवन में। मैं समझता हूँ, अपने से अलग साहित्य नाम की कोई चीज़ भी नहीं होती। जैसा हूँ, वैसी ही रचनाएँ रच पाऊँगा। मेरे संस्कार, मेरे अनुभव, मेरा व्यक्तित्व मेरी दृष्टि सभी मिलकर साहित्य की सृष्टि करते हैं। इनमें एक भी झूठ हो तो सारी रचना झूठ पड़ जाती है।”3

भीष्म साहनी का साहित्यिक व्यक्तित्व

भीष्म साहनी हिन्दी साहित्य के महान साहित्यकार हैं। वे सशक्त, निर्भीक एवं साहसी साहित्यकार हैं। उनका व्यक्तित्व बहुमुखी है। वे एक साथ प्रतिष्ठित लेखक हैं तो रंगमंच में जाने हुए कलाकार भी हैं। भीष्म साहनी जितने बड़े कलाकार हैं उससे भी बड़े इंसान हैं। डॉ. कमला प्रसाद ने लिखा है-

“भीष्म साहनी जी स्वभाव से बेहद नम्र हैं। उन्हें ग़ुस्से में कम देखा है। अकारण ग़ुस्से में रहने वाले साथी उन्हें गाँधीवादी कहते हैं। हमें मालूम है कि यह नम्रता न कायरता है और न नाटकीयता, वह स्वभाव की निर्भयक्तिकता है। वह ज्ञानात्मक संवेदना की फलक है।”4

“भीष्म साहनी का स्वभाव इतना सहयोगी है कि पूछिये मत। एक अत्यन्त उम्दा इंसान में जितनी खासियत होनी चाहिए, सारी की सारी उनमें है। बुजुर्ग होते हुए भी वो किसी मुश्किल के सामने विचलित नहीं होते थे। पानी में तैरते हुए वो कई दफ़ा लोकेशन पर पहुँचे और एक बार भी यह शिकायत नहीं की गई मैं बुजुर्ग आदमी हूँ मुझे इस तरह तकलीफ़ होती है।”5

भीष्म साहनी के बारे में कल्पना साहनी राजकुमार राकेश को बताती है-

“भीष्म जी जब ईप्टा में काम करते थे, तो मुझे भी साथ ले जाते थे। चारपाई पर लिटा देते जो स्टेज के पीछे होती थी। बीच-बीच में मेरी ख़बर लेते रहते थे। उनकी छवि घर में एक बहुत आत्मीय पिता की हैं। - लोगों को बाहर एक ग़लतफ़हमी है कि वे प्रायः बोलते कम हैं। ज़्यादातर चुप रहते हैं। लेकिन घर में उनका व्यवहार एकदम इसके उलटा है। घर में वे ख़ूब बातें करते हैं। भीष्म जी के पास कमाल का ह्यूमर है।”6

“भीष्म जी में कमाल की इच्छा-शक्ति है। शीला जी की मौत के बाद अड़ गए, कि मैं यहीं रहूँगा, ईस्ट पटेल नगर के अपने घर में बिल्कुल अकेले। तीन चार दिन बाद गंभीर रूप से बीमार हुए तो बड़ी मुश्किल से ही मैं अपने साथ ला पाई। काम के बिना रह पाना तो इनके लिए संभव है ही नहीं। लगातार जुड़े रहते हैं। पलभर के लिए भी चैन नहीं। शीला जी बीमार थीं तो बेहद चिंतामग्न से तीमारदारी में जुटे रहते थे। उन कठिन दिनों में भी जब कभी मौक़ा मिलता तो ’नीलू नीलमा नीलोफर’ उपन्यास पर काम करने बैठ जाते। कभी-कभी तो देखकर हैरानी होती है।”7

गुरुदयाल सिंह ने एक संरमरण में लिखा है, “भीष्म साहनी मेरे लिए बड़े भाई के समान हैं। पैंतीस वर्ष से मैं उन्हें जानता हूँ।”8 “....भीष्म जी से मित्रता का कारण तो उनका बड़ा व्यक्तित्व ही रहा परंतु तीन चार घटनाएँ जाने कैसे एक साथ घट गईं कि सोचकर हैरानी भी होती है। पहली बार 1973 में भाषा-विभाग, पंजाब ने उन्हें हिन्दी-लेखक के रूप में लिखने वाले पंजाबी लेखक के तौर पर पुरस्कार दिया और मेरे एक उपन्यास पर ’पहला नानक सिंह पुरस्कार’ दिया। फिर 1975 में भारतीय साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिला तो हिन्दी-भाषा का पुरस्कार भीष्म जी को मिला। उसके बाद 1972 में साहित्य अकादमी की जर्नल कौसिल के मेंबर भी एक साथ नामजद हुए। चौथी बार एक साथ 1998 में राष्ट्रपति-निवास में भी साथ-साथ रहे जब भीष्म जी को “पद्मभूषण” से अलंकृत किया गया और मुझे ’पद्मश्री’ मिला।”9

कृष्णा सोबती ने लिखा है- ”उनका पेशा है अंग्रेज़ी पढ़ाना और अपनी मादरी जवान हिन्दी में साहित्य सृजन करना। अंग्रेज़ी-साहित्य के शिक्षकों और पाठकों को हिन्दी की हवा से हो जाने वाली ज़ुकाम से भीष्म साहनी ने अपने आपको आज़ाद रखा है।”10

भीष्म साहनी का कृतित्व

(1) भीष्म साहनी एक महान उपन्यासकार

“भीष्म साहनी की लंबी रचनायात्रा में उनके उपन्यास अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। यदि यह प्रश्न पूछा जाय कि उनके रचना कर्म का सर्वाधिक सशक्त पक्ष कौन सा है, कहानीकार का, उपन्यासकार का अथवा नाटककार का तो निश्चित उत्तर उपन्यासकार का ही होगा। उपन्यासकार के रूप में उनका साहित्यिक प्रक्षेप न केवल हिन्दी में अपितु भारतीय भाषाओं के साहित्य में अपना विशिष्ट महत्व रखता है। भीष्म साहनी की उपन्यास यात्रा ’झरोखे’ से लेकर सद्यःप्रकाशित उपन्यास ’नीलू नीलिमा नीलोफर’ (2000) तक फैली हुई है जिसमें उन्होंने ’झराखे’ (1967), ”कड़ियाँ’ (1970), ’तमस’ (1973), ’बसंती’ (1980), ’मय्यादास की माड़ी’ (1998), ’कुन्तो’ (1993), तथा ‘नीलू नीलिमा नीलोफर’ (2000), सात उपन्यास दिये हैं। ‘तमस’, ‘बसंती’, ‘मय्यादास की माड़ी’, तथा ‘नीलू नीलिमा नीलोफर’ उनके बड़े मेजर उपन्यास हैं। इनमें भी कालजयी उपन्यासों की श्रेणी में यदि ‘तमस’ और ‘मय्यादास की माड़ी’ आते हैं, तो ‘बसंती’ का महत्व इसलिए है कि इस उपन्यास में एक ऐसे वर्ग का अत्यन्त निकट से देखा गया संवेदनशील चित्रण है जो हर दृष्टि से महानगरीय जीवन के हाशिये पर है, जो प्रत्येक दृष्टि से दलित शोषित, और उत्पीड़ित है। ‘नीलू नीलिमा नीलोफर’, में लगता है ‘तमस’ में जो समस्या लेखक नें उठायी थी, उसका कुछ शेष रह गया उसी का एक पूरक बनकर यह कृति एक प्रेम कथा के रूप में आयी। इसलिए ‘तमस’ और ‘मय्यादास की माड़ी’ की हिन्दी उपन्यास-साहित्य को दी गयी अमूल्य धरोहर हैं।”11

‘मय्यादास की माड़ी’ (1998) को भीष्म साहनी के औपन्यासिक कृतित्व में तथा भारतीय भाषाओं के समस्त उपन्यास-साहित्य में महत्वपूर्ण इसलिए माना जा सकता है कि इसमें प्रायः सौ वर्षों के ब्रिटिश साम्राज्य के भारत में प्रसार, पैर जमाने की कथा सिक्ख अमलदारी के माध्यम से कही गई है। वह मात्र पंजाब का ही नहीं अपितु पूरे देश का प्रमाणिक परिदृश्य प्रस्तुत करता हैं। यह सौ वर्षों का इतिहास ‘तमस’ के कथा-समय से पूर्व का है और इस रूप में ‘मय्यादास की माड़ी’ को ‘तमस’ का पूर्व खंड भी कहा जा सकता है जिसे उपन्यासकार में ‘तमस’ के बाद लिखा। “भाषा” की दृष्टि से ‘तमस’ भले ही ‘मय्यादास की माड़ी’ से इक्कीस हो किन्तु “कथ्य प्रस्तुति” और “उपन्यास -दृष्टि” की दृष्टि से ‘मय्यादास की माड़ी’ ही आगे है।”12

“झरोखे”

भीष्म साहनी का पहला उपन्यास ‘झरोखे’ है। “अरूंधती राय के उपन्यास ’गॉड ऑफ स्माल थिंग्स’ में जिस टैक्नीक का इस्तेमाल है, उसी टैक्नीक में लगभग तीस साल पहले ”झरोखे” उपन्यास लिखा गया था। एक पितृ सत्तात्मक संयुक्त परिवार में क्या कुछ घटता है, उसका चित्रण एक निरीह बच्चे की आँख से देखकर किया गया है।”

“कड़ियाँ” ‘बसंती’ और कुंतो”

“कड़ियाँ”, ‘बसंती’ और “कुंतो” में स्त्री-पुरुष संबंधों के अतिरिक्त औरत की त्रासदिक स्थितियों की करुणगाथा है।

‘तमस’

“विभाजन की त्रासदी पर लिखे गये मार्मिक उपन्यासों यथा यशपाल का “झूठासच”, कर्रूतुलएन हैदर का “आग का दरिया” अब्दुला हुसैन का “उदास नस्लें” और खुशवंत सिंह का “ट्रेन टु पाकिस्तान” की ही अगली महत्वपूर्ण कड़ी है ‘तमस’। 1975 में इसे साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ था।”13

‘तमस’ में देश के विभाजन और आज़ादी के ठीक पहले का पंजाब है। इसका एक अनाम क़स्बा, अनाम इसलिए नहीं कि वह अनाम क़स्बा है, बल्कि इसलिए कि वह पूरे पंजाब का प्रतिनिधि है। यह पंजाब की ही नहीं पूरे भारत की दास्तान है- पंजाब के प्रतिनिधित्व के माध्यम से। इसमें चारों ओर आग है। नफ़रत का तांडव है। लड़ते-झगड़ते, एक दूसरे के खून के प्यासे विक्ष्प्ति चेहरे हैं।

‘तमस’ की शुरूआत होती है नत्थू की मजबूरी से। सूअर को हलाक़ करने के दृश्य से, वही पूरे उपन्यास के वातावरण की सृष्टि करती जाती है। उस खून माहौल की जिसमें चारों ओर ज़हर भरा है और हर आदमी नत्थू की तरह बेचारा और परेशान है।

‘मय्यादास की माड़ी’

“भीष्म साहनी का ‘तमस’ यदि पाँच दिनों की जीवन कथा का अत्यन्त सघन रूप में प्रस्तुत करने वाली रचना है तो ‘मय्यादास की माड़ी’ कम से कम पूरी एक सदी की कथायात्रा अपने में समेटे हुए है। ‘मय्यादास की माड़ी’ का फलक अत्यन्त विशाल है और इसमें एक समाज के, एक व्यवस्था से, दूसरी व्यवस्था के सामाजिक-राजनितिक-ऐतिहासिक-सांस्कृतिक संक्रमण की कथा को मानवीय स्तर पर बड़े चित्रात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया है। जिस प्रकार बालजाक के उपन्यास फ्रांसीसी समाज के चित्रात्मक विवरण देने वाले उपन्यास हैं वैसे ही, ‘मय्यादास की माड़ी’ में भीष्म साहनी ने लगभग पूरी उन्नीसवीं सदी के पंजाब के एक क़स्बे के जीवन के बदलते परिदृश्य को चित्रात्मक रूप में प्रस्तुत किया है।”14

मोटे रूप में ‘मय्यादास की माड़ी’ पंजाब में खालसा राज से ब्रिटिश औपनिवेशक राज में संक्रमण की कथा प्रस्तुत करता है। वास्तव में ब्रिटिश अमलदारी पंजाब में किस ढंग से स्थापित होती है, उससे सामाजिक-ऐतिहासिक-सांस्कृतिक रूप में समाज में क्या-क्या परिर्वतन होते हैं, क़स्बे के जीवन के भीतर यानी परिर्वतन के माध्यम से लेखक ने ‘मय्यादास की माड़ी’ की कथा-संरचना चित्रात्मक रूप में की है।

नीलू नीलिमा नीलोफर

भीष्म साहनी का यह नया उपन्यास है।

“नीलू नीलिमा नीलोफर” उपन्यास के शीर्षक को देखते ही लगता है कि यह तीन महिलाओं के जीवन पर आधरित उपन्यास है। किन्तु पढ़ने के पश्चात पता चलता हैं कि इस उपन्यास में तीन नारी पात्र न होकर मात्र दो ही स्त्रियाँ हैं। जिनकी जीवनगाथा इसमें कही गयी है। किन्तु शीर्षक में तीन नाम एक सोद्देशय युक्ति की तरह प्रयुक्त किये गये हैं। नीलिमा हिन्दू है और नीलोफर मुसलमान परिवार से संबंध रखती है किन्तु घर में दोनों ही नीलू कहलाती हैं। भारत में रह रहे इन दोनों अलग-अलग संप्रदायों की आंतरिक समानता के बारीक़ तंतुओं की तलाश के उद्देश्य से ही उपन्यास का नाम संभवता “नीलू नीलिमा नीलोफर” रखा गया है।”15

“असल में अंतर्जातीय प्रेम-विवाह की अनेक सामाजिक स्थितियों में प्रतिक्रिया का यथार्थ निरूपण ही इस उपन्यास की शक्ति है। इस जीवंत विवरण के माध्यम से भारत की धर्मनिरपेक्षता की वास्तविकता का आभास होने लगता है।”16

“धर्मनिरपेक्षता के बावजूद साम्प्रदायिकता की आज की वस्तुस्थिति को बड़ी सफलता के साथ निरूपित करता है। किन्तु आगे चलकर नीलिमा की कथा में उपन्यास में जो मोड़ लिया उसमें यह वैवाहिक जीवन में पति-पत्नी के जटिल संबंधों का उपन्यास बन जाता है।”17

भीष्म साहनी एक सशक्त कहानीकार

कथाकार शानी ने भीष्म साहनी की विशिष्टता का उल्लेख करते हुए लिखा है, “वे उन थोड़े से लेखकों में से हैं जो अच्छी कहानियाँ लिखते हैं और लोगों को निराश नहीं करते। चलताऊ ढंग से उन्होंने कुछ नहीं लिखा है। बहुत साफ़ शब्दों में मैं एक बात कहना चाहूँगा कि मैं उनको जितना अच्छा कहानीकार समझता हूँ, उतना अच्छा उपन्यासकार नहीं।”18

“सादगी और सहजता भीष्म साहनी की कहानी की ऐसी खूबियाँ हैं, जो विडंबनापूर्ण स्थितियों की पहचान भीष्म साहनी में अप्रतिम हैं। यह विडंबना उनकी अनेक अच्छी कहानियों की जान हैं।”19

“लगभग साठ साल की दीर्घावधि में भीष्म साहनी की कहानियाँ लिखी गई हैं। 1934 में उन्होंने पहली कहानी लिखी थी, जो कॉलेज-पत्रिका “रावी” में प्रकाशित हुई थी। किसी पत्रिका में उनकी पहली प्रकाशित कहानी “नीली आँखें” (हंस 1944 -45) हैं। “नीली आँखे” से लेकर “चीलें” ( वागर्थ अंक 68 फरवरी 2001) तक भीष्म साहनी की कथा-लेखन में कोई ठहराव नहीं हैं।”20

भीष्म साहनी की पहली कहानी “नीली आँखे” है। यह समाज में औरत की विडम्बनात्मकता की ओर यंकेत करती हैं। “औरत के हाथ का खाऊँगा” बीमार लड़का अपनी पत्नी के बारे में कहता है और भीड़ उस औरत का मखौल उड़ाती हैं। किसी भी लेखक के लिए पहली कहानी के रूप में “नीली आँखें” एक उपलग्धि की तरह है। भीष्म साहनी के अब तक नौ कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं- भाग्यरेखा (1953), पहला पाठ (1956), भटकती राख (1966), पटरियाँ (1973), वाड.चू (1978), शोभायात्रा (1981), निशाचर (1983), पाली (1989), डायन (1998)। एक सफल कहानीकार के रूप में भीष्म साहनी की असली पहचान उनकी बहुचर्चित कहानी “चीफ की दावत” से शुरू होती है। विभाजन की त्रासदी को लेकर लिखी कहानी “अमृतसर आ गया है” की कथा ‘तमस’ जैसे उपन्यास की आधारशिला है। “अमृतसर आ गया है” कहानी में ट्रेन के एक कंपार्टमेंट का चित्रण है, जिसमें हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख बैठे हैं। जगह कम है, लोग ज़्यादा हैं, इसलिए जो पहले से आसन जमाए बैठे हैं, वो आनेवालों को कंपार्टमेंट में चढ़ने ही नहीं देते, और अगर कोई चढ़ जाता हैं तो उसे बैठने नहीं देते। ऊपर के बर्थ में एक पठान लेटा रहता है और कुछ भी नहीं बोलता है। नीचे एक हिन्दू बाबू बैठा उसका व्यवहार देखता रहता है। तभी पठान एक हिन्दू औरत जो गर्भवती रहती है, नीचे उतरकर उसके पेट में लात मारता है और वह तिलमिला कर बैठ जाती है। बाबू अंदर ही अंदर तमतमा जाता है क्योंकि उस वक्त वहाँ पर पठानों की संख्या ज़्यादा रहती है परंतु जैसे ही अमृतसर आता है, बाबू शेर हो जाता है। चीख-चीख कर गालियाँ देता है। इस संदर्भ में विष्णु प्रभाकर जी की बात ज़्यादा सार्थक प्रतीत होती है- “’अमृतसर आ गया है’ के बाबू के साथ भी ऐसा ही हुआ है। बाबू की मानसिकता को लगता है भीष्म साहनी ने खुद जिया है। इस मामले में मैं भीष्म साहनी को यशपाल से ऊपर मानता हूँ। खासकर विभाजन की त्रासदी को लेकर उन्होंने जिन चरित्रों का निर्माण किया है उसमें बड़ी खूबी के साथ सारी स्थितियाँ सहजमय से आ जाती हैं।”21

भीष्म साहनी उन कहानीकारों में हैं, जिन्होंने कथा-साहित्य की जड़ता को तोड़ा है और उसे ठोस सामाजिक आधार देकर एक महत्वपूर्ण कार्य किया है। अमरकांत के अनुसार “उनकी रचनाओं में ऐसी कलात्मक संलग्नता है, ऐसी सोच एंव व्यापक चिंता है, जिससे वे हमारे साहित्य की विशिष्ट उपलब्धियाँ बन गई हैं।”22

निश्चित रूप से भीष्म साहनी एक सफल सार्थक सोद्देश्य कहानी-लेखक के रूप में कथाजगत् में स्थापित हैं जिनकी अपनी अलग पहचान है। उनकी कहानियों का महत्व घटने की बजाय बढ़ गया है क्योंकि भारतीय समाज इक्कीसवी सदी में भी वहीं खड़ा है, जहाँ पहले था।

महान नाटककार

“समकालीन हिन्दी साहित्यकारों में बहुआयायी व्यक्तित्व वाले भीष्म साहनी एक सक्रिय रचनाकार है जिनके साहित्यिक अवदानों को समकालीन रचनाकर्म के संदर्भ में ही समझा जो सकता है। अपनी अनवरत साहित्य-साधना से इन्होंने शोध-समीक्षा जगत् का ध्यान अनायास ही अपनी ओर आकृष्ट किया। एक साथ कथाकार, उपन्यासकार और नाटककार के व्यक्तित्व का निर्वाह करते हुए भीष्म जी ने हिन्दी-नाटकजगत् को अपनी छह रंगमंचीय नाट्य रचनाओं से समृद्ध किया है- हानूश (1977), कविरा खड़ा बजार में (1981), माधवी (1984), मुआवजे (1993), रंग दे बसंती चोला (1998), और आलमगीर ( 1999)।”23

समकालीन भारतीय नाट्य साहित्य के संदर्भ में ‘हानूश’की चर्चा करते हुए श्री नेमिचंद्र जैन ने लिखा है “राकेश के नाटकों की तरह यह यथार्थवादी शैली में लिखा गया है। यद्यपि इसमें शिल्प के स्तर पर वह प्रयोगशीलता और जमीन तोड़ने की नहीं है तथापि इसमें कथा और शिलागत तड़क-भड़क या वैचित्र्य के बिना ही जीवन की नाटकीय विडम्बना की मार्मिक पकड़ है।”24

हानूश ने अपने मंचन एवं दर्शन से रंग कर्मियों को उत्पादित किया तो बाद में प्रकाशित नाटक भी रंगमंचीय दृष्टि से प्रशंसित रहे। सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन में सत्ता और राजनीति के बढ़ते हुए हस्तक्षेप की दर्दनाक कहानी ’हानूश’ में प्रस्तुत है, जो कथा के अलग-अलग धरातल पर व्यक्तिगत संकट और सामाजिक लोलुपता को भी अभिव्यंजित करता है। नगर के चौराहे पर लगी घड़ी का महल कम हो जाएगा। दूसरी घड़ी न बने और पहली घड़ी का महत्व कम न हो, इसलिए “हानूश” को पुरस्कार के रूप में अंधा बना दिया जाता है। स्वार्थ की यह ऐसी चरम स्थिति है, जहाँ शासन और सत्ता अपनी व्यक्तिगत स्वार्थसिद्धि एंव हित-साधना के लिए कलाकार के शारीरिक-मानसिक शोषण करने के लिए भी नहीं चूकते हैं।

भीष्म साहनी ने “माधवी” नाटक में नारी मुक्ति का महज अतीत वाचन ही नहीं किया है बल्कि वर्तमान युग की स्त्रीमुक्ति यात्रा के लिए हरी झंडी भी दिखलाई है। “माधवी” नाटक में माधवी का आखिरी वाक्य है- “संसार बड़ा विशाल है गालव, उसमें निश्चय ही मेरे लिए कोई स्थान होगा।”25

स्पष्ट है कि भीष्म साहनी के नाटक “माधवी” में स्त्री की स्वतंत्र सत्ता के लिए जिस निश्चित स्थान की प्राप्ति की प्रत्याशा थी आज वह पूरी और सार्थक होने को है। “माधवी में पुरुष की सत्ता का खुलासा है, तो “मुआवजे” में धर्म-राजनीति-प्रशासन तथा पब्लिक के विभिन्न घटकों की लूटखसोटी वृति का नंगा नाच है। यूँ प्रशासन की सत्ता का वह मुखर पेशेवर काइंया स्वरूप इसी में उभरा है- जो आज की व्यवस्था में सचमुच ही सत्ता बनकर गुंजलफ मारे है और सारा सत्त चूसता जा रहा है।”26

भीष्म साहनी का दूसरा नाटक “कविरा खड़ा बजार में” भारतीय मध्यकाल की संक्रमण-धाराओं के घात-प्रतिघातों को दर्शाता है। भीष्म साहनी ने लिखा है- “कुछ मित्रों को शिकायत रही है कि नाटक कबीर के काल, तत्कालीन समाज की धर्माधता तथा तानाशाही और कबीर के बाह्याचार-विरोधी पक्ष पर तो प्रकाश डालता है, पर कबीर के अध्यात्मिक पक्ष को अछूता छोड़ देता है, जबकि उनके अनुसार कबीर का अध्यात्म पक्ष ही आज सबसे अधिक मान्य है। मेरी समझ में कबीर का अध्यात्म मूलतः उनकी मनुष्य मात्र के प्रति समदृष्टि, प्रेमभाव, भक्तिभाव और व्यापक धर्मेंत्तर दृष्टि से ही पनप कर निकला है। उनके बाह्याचार-विरोधी पद, भक्ति भाव के पद और आध्यात्मिक पद एक ही भूमि से उत्पन्न हुए हैं, एक ही मुक्त दृष्टि की उपज हैं, इस तरह से वे एक-दूसरे से अलग न होकर एक-दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़े हुए हैं।”27

“भीष्म साहनी के नाटक अपनी प्रगतिशील चेतना, मानवीय अंतरंगता, अपने सादगी भरे रंग-स्थापत्य, स्थितियों और भाषा की सहज बुनावट से ही बहुत कुछ कहने की शक्ति के कारण हिन्दी नाटक और रंगमंच को बहुत आगे ले जाते हैं और अपनी गहराई और मानवीय संवेदना के कारण सीधे दर्शकों से तादात्म्य स्थापित करते हैं।”28

निष्कर्ष

भीष्म साहनी की तरह का कलाकार होना बहुत कठिन है। उनका व्यक्तित्व इतना आकर्षक एंव मोहक है कि उनके संपर्क में आनेवाला कोई भी व्यक्ति उनका उपासक होकर रह जाता है। वे स्वभाव से अत्यन्त विनम्र हैं। वर्षों तक लगातार परिश्रम करते रहने से ही उनका प्रखर रचना-व्यक्तित्व उभर कर आया है।

“झरोखे”, “कड़ियाँ”, ‘तमस’, ‘मय्यादास की माड़ी’, “नीलू नीलिमा नीलोफर”, तथा ‘बसंती’ जैसे उपन्यास लिखनेवाले भीष्म साहनी की पहचान एक सशक्त कहानीकार के रूप में भी है। यह कहना मुश्किल है कि भीष्म जी बड़े कहानीकार हैं या बड़े उपन्यासकार। “चीफ की दावत” “अमृतसर आ गया है” तथा “वाड़ चू” जैसी कहानियाँ लिखकर उन्होंने यह दिखा दिया कि बड़ी कहानियाँ बहुत छोटे विषय या घटना पर भी लिखी जा सकती हैं और वे किसी किसी बड़े उपन्यास से कम प्रभाव नहीं छोड़तीं। दूसरी ओर “हानूश”, “कविरा खड़ा बजार में”, “माधवी” तथा “मुआवजे” जैसे नाटक लिखकर उन्होंने बड़ा नाटककार होने के प्रमाण भी दिए। वे इप्टा के सक्रिय कलाकार थे, बलराज जी के छोटे भाई थे इसलिए जन्मजात कला-प्रतिभा उनमें थी, जिसे उन्होंने ‘तमस’ में सरदार हरनामसिंह का रोल दिखा दिया। सोवियत संघ में रहकर उन्होंने जो अनुवाद किए, उन अनुवादों को आज रचनात्मक समृद्धि के नाते जाना-पहचाना जाता है। दरअसल, बड़े कलाकार किसी एक विद्या और एक परम्परा में बँधे नहीं रहते, वे बार-बार अपने ही प्रतिमानों को तोड़ते हैं और उनसे आगे बड़े प्रतिमान गढ़ते हैं। भीष्म साहनी ने यही किया। वे उपन्यासकार, कहानीकार, नाटककार, अनुवादक तथा रंगमंच के मंजे हुए कलाकार थे। उनकी पहचान किसी एक से भी हो सकती है और समग्रता में भी। बीसवीं सदी के आठवें-नवें दशक में भीष्म जी की अगुआई में वास्तव में प्रगतिशील आंदोलन ने एक सांस्कृतिक जागरण को चरितार्थ किया। भीष्म जी की भूमिका इसमें एक संगठनकर्ता के रूप में ही नहीं एक लेखक के रूप में भी, एक विचारक के रूप में भी महत्वपूर्ण रही है। भीष्म साहनी जैसे महान साहित्यकार को मेरा शत-शत नमन !

लेखक- डॉ. दिलीप कुमार झा
फोर्टगलास्टर विद्यालय (उ. मा.)
राधानगर, हावडा
प. बंगाल, भारत
dilipkumarjha325@gmail.com

संदर्भ-ग्रंथ

1. “प्रेमचंद्र प्रतिभा” डॉ. राजेश्वर गुरू, सरस्वती प्रेस, इलाहाबाद ( सं॰-इन्द्रनाथ मदान ) प्रयुक्त संस्करण, 1967, पृ॰ 249
2. “पाठक और आलोचक”-होलचुक जैक्सन, पृ॰ 74
3. “सारिका” ले॰ “भीष्म साहनी” अप्रैल नई दिल्ली, 1973, पृ॰ 33
4. “भीष्म साहनी व्यक्ति और रचना”-राजेश्वर सक्सेना, प्रताप ठाकूर, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली 100002, संस्करण -1997, पृ॰ 71
5. “सारिका” नई दिल्ली ( लेखक-सईदमिर्जा ), वर्ष 1990, पृ॰ 19
6. “पल प्रतिपल” ( सं॰ देशनिर्मोही )-कल्पना साहनी और राजकुमार राजेश की “बातचीत” के अंश से उद्धृत, मार्च-जून 2001 पृ॰ 96
7. वही, पृ॰ 98
8. “पल प्रतिपल” लेखक गुरूदयाल सिंह, मार्च-जून 2001, पृ॰ 4
9. वही, पृ॰ 8.
10. भीष्म साहनी व्यक्ति और रचना, लेखिका-कृष्णा सोबती पृ॰ 62
11. पल प्रतिपल ( सं॰ देशनिर्मोही ), मार्च-जून 2001, पंचकुला, हरियाणा, पृ॰ 132
12. वही, पृ॰ 140
13. वही, पृ॰ 20
14. वही, पृ॰ 183
15. वही, पृ॰ 145
16. वही, पृ॰ 146
17. वही, पृ॰ 146
18. “सारिका”, नई दिल्ली, लेखक शानी, 1990, पृ॰ 45
19. “सारिका”, लेखक नामवर सिंह, 1990, पृ॰ 43
20. “पल प्रतिपल”, मार्च जून 2001, पृ॰ 262
21. “सारिका”, नई दिल्ली, लेखक विष्णु प्रभाकर, 1990, पृ॰ 43
22. भीष्म साहनी व्यक्ति एंव सचना, लेखक अमरकांत, पृ॰ 244
23. पल प्रतिपल, मार्च जून 2001, पृ॰ 333
24. “रंगदर्शन”, नेमिचन्द्र जैन, पृ॰ 29
25. “माधवी”, भीष्म साहनी, राजकमल प्रकाशन, पृ॰ 96
26. “आलोचना” भीष्म साहनी के नाटकों में सामाजिक चेतना, लेखक सत्यदेव त्रिपाठी, अप्रैल-सितम्बर 2004, पृ॰ 161
27. “पल प्रतिपल”, लेखक भीष्म साहनी, “कविरा खड़ा बजार में” की भूमिका, मार्च जून 2001, पृ॰ 353
28. “आलोचना” लेखक-गिरीश रस्तोगी, अप्रैल-सितम्बर 2004, पृ॰ 193


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