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01.16.2009
(१)

अपने पथ पर चलना ही उसका बाना है
प्रो. दिलीप सिंह


त्रिलोचन को पढ़ना आपको प्रौढ़ बनाता है। बहुत-बहुत पहले से उनकी कविताएँ बाँध लेती थीं, जब छोड़तीं तो सब कुछ हल्का-हल्का, पूरा पूरा लगता, आज भी लगता है। उनकी कविता का स्वाद उस समय के कवियों से अनूठा था। त्रिलोचन निराशा के नहीं, आशा के कवि बन कर हम नव युवकों को मोह लेते थे। ऐसा वे जब मिलते, तब भी करते थे। त्रिलोचन अपनी राह चले, अपनी अदा से। अगर किसी परंपरा से वे जुड़ते दीख भी पड़ते हैं तो एक हद तक निराला से और कुछ दूर तक नागार्जुन से। मिट्टी, सच, एका और मनुष्यता के वे हर हाल में साथ होते हैं। तभी तो विपदाएँ उनकी आशा और उनके विश्वास के आगे पछाड़ खा-खाकर, हार जाती हैं। उनका दृढ़ कवि व्यक्तित्व हमें अपनी ओर खींचता है, उन जैसा बनने को उकसाता है। वे कठिन कवि नहीं हैं। लोक-समृद्ध कवि हैं। यह कह दूँ कि लोक भाषा का ऐसा समृद्ध उपयोग कहीं और न मिलेगा। लगता है लोग शब्दों और लोक पगे मुहावरों में ही उनके सपने बसे हुए हैं। त्रिलोचन का काई खेमा नहीं है। वे अपने में अकेले ढब के कवि हैं। साफ़, दो टूक, मन की बात कहना कोई उनसे सीखे। वे अपने अंतर की अनुभूति को बिना रँगे चुने अपनी आत्मा की अतल गहराई में प्रवाहित भाव-जल में सिझा कर कागज पर उतारते हैं कि उनका दर्द, उनके सपने और उनका आत्मविश्वास सब हमें तत्क्षण् अपने-से लगने लगते हैं। त्रिलोचन का जीवन भटकावों से भरा था संघर्ष, उनके जीवन की सच्ची कहानी था। पर उनका लेखन न तो कभी दयनीय बना और न ही आक्रोश की भट्ठी में जला-भुना। उल्टे वह सध्य और सर्वमंगला बना, खरे सोने की तरह तप-तपकर और-और निखरता गया। और त्रिलोचन की यह पंक्ति सच बनती चली गई कि लू लपटों में मिट्टी पक्की हो जाती है।

त्रिलोचन भाषा के ऐसे सौदागर हैं जो सपने बेचता है। सपने, छोटे-छोटे; अपनाव के, निर्भयता के, गति के, साहबस के, प्रेम के। न जाने कितने सपने, किन-किन के सपने पर सच्चे और संवेदी सपने। इसीलिए त्रिलोचन के लिए कविता विडंबनाओं का मातम करके जीवन को खोना नहीं है - कविता तो होना है’ - जीवन से, जीवन में, जीवन के लिए : मृत्यु त्रिलोचन के लिए जीने की चुनौती है और नियति उनकी मुट्ठी में कैद है - घबराना क्यों, जो होने को है/ वह होगा/धूप, ओस, वर्षा से/क्या कोई बचता है।

 

त्रिलोचन जीवन के कवि हैं और जीना सिखाते भी हैं। ज़िंदगियों की उन्हें फ़िक्र है। धरती (१९४५) से आगे तक वे जीने का ढंग बताते चले आए हैं। उनके यहाँ प्रकृति और उसके उपकरण ज़िंदगी के उतार चढ़ाव का ही दृष्टांत बने हैं। अपनी, आपकी और हमारी मानवीय कमजोरियों को वे सदा से जानते रहे हैं। तुम्हें सौंपता हूँ’ (१९८५ : राधाकृष्ण) में १९३८ से लेकर १९४६ तक की ग्यारह कविताएँ हैं और १९४७ से  १९६२ तक की तेरह कविताएँ। सबका अपना आकाश’ (१९८७ : राजकमल) में १९४८ से १९६३ तक की कविताएँ संकलित हैं, जिनकी संख्या ५२ है। इनमें से चालीस कविताएँ १९४८-१९५१ के बीच की हैं।  फूल नाम है एक’ (१९८५ : राजकमल) को ९१ कविताओं में से ६६ - १९५४ तक हैं और १५ - १९६२ की। सबका अपना आकाशको छोड़ कर शेष दो संग्रहों में शेष कविताएँ ७० और ८० के दशक की हैं।३ कहना यह है कि परतंत्र भारत के अमानवीय माहौल में त्रिलोचन ने मानवता, मनुष्यता और एकता की भावना को स्वर दिया। आजाद भारत के शुरुआती दस सालों में उनकी कविताएँ भारत की नई तस्वीर के प्रति आशान्वित हैं तो उसके बाद की (१९६७ तक की) देश में पनप रही विडंबनाओं पर नज़र रखे हुए हैं। इसके बाद त्रिलोचन आत्मलोचन की ओर मुड़ते हैं, गाँव-नगर के बदलावों को लखते हैं और जीवन की आपाधापी में भूले मनुष्य की पड़ताल करते हैं। वे डगमगाते कहीं नहीं, कभी नहीं। डटने की उनकी मुद्रा रह-रह कर उनकी काव्य-यात्रा में कौंध-कौंध जाती है। बाद की कविताओं में त्रिलोचन की भाषा प्रयोगशील बनी है। उनकी भाषा का नयापन शुरू से ही उठान पर रहा है पर बाद में उस भाषा में निराला जैसी संरचनात्मक तोड़ फोड़ और नागार्जुन जैसी लोक संबद्धता के साथ कहन और संवाद की ही नहीं पत्र की शैली का भी कविता अच्छा खासा स्पेस बनाने लगता है। वे प्रारंभ से ही चीज़ों को आत्मीय बना कर देखने वाले कवि रहे हैं, उनका देखना नये कोण से देखना है जिसमें भाषा का वे अपनी तरह से इस्तेमाल करते हैं। काव्य भाषा (कविता की परंपरागत भाषा) और बोलचाल की भाषा दोनों पर उनका अद्‌भुत अधिकार है। इन्हें फेंटना भी वे जानते हैं और अलग अलग कर गाँठना भी। कवि की मुखरता का त्रिलोचन अकेले उदाहरण हैं। वे खूब बोलते हैं। पर सधे हुए स्वर में। उन्हें अपनी भाषा और अपने भावों पर पूरा भरोसा है। वे मौन नहीं जानते और इसीलिए कविता में खुद डूबे रहने की मौनी कवियों की आदत उन्हें नहीं रुचती। वे बात करना चाहते हैं, सब से। अपने मन की कहना चाहते हैं - कवि हो तो अपने ही भीतर रहो न डूबे/डूब गए जो, सबसे वे, सब उनसे ऊबे।यह त्रिलोचन का वह काव्य सत्य है जो उन्हें अनोखा कवि बनाता है - त्रिलोचन का कवि बहिर्मुखी है - वह आस-पास की सब चीज़ों, सब लोगों को बाहर से ही नहीं भीतर तक देखता है। इस देखने में भाषा उनका साथ देती है। त्रिलोचन के सारे कविगुण (प्रेम, आस्था, विश्वास, दृढ़ता, संघर्षशीलता, जिजीविषा आदि) भाषा पर उनके अपरिमित अधिकार से जगर मगर करते हैं ; पढ़ें तो गहरे उतर जाते हैं - चलना ही था मुझे - सडक, पगडंडी, दर्रे/कौन खोजता; पाँव उठाया और चल दिया/खाना मिला न मिला, बड़ी या छोटी हर्रे/नहीं गाँठ बाँधी, श्रम पर अधिक बल दिया।

 

त्रिलोचन की कविता अपने पाठक से आम संवाद है, नज़दीकी बातचीत। इस बातचीत में इसीलिए वे अपने लोगों का तूया तुमसे संबोधित करते हैं ; ‘आपसे कभी नहीं। सीधे संवाद का यह पाठ कई तरह के जीवन सत्यों को भिन्न-भिन्न कलेवर में प्रकट करता है। एक कलेवर इसमें गानका है। त्रिलोचन ने गीत, ग़ज़ल और सॉनेट तीनों लिखे। मुक्त छंद की कविता तो लिखी ही। वे गीत की ताकत पहचानते हैं। गीत ही उनके यहाँ स्वर, लय, गान का पर्याय हैं और एकता के कारक भी - अपने अपने कंठ किलाओ, गाओ, गाओ, गाओ। जीवन संगीत की एक तान स्वर साधना मनुष्य को यह सीख भी देती है कि उन्हें भेंट जो आगे आए।जो आगे बढ कर अपनत्व चाहे उसे गले लगाना, तभी संभव है भेद-भाव का मिटना और ऐसे समाज की रचना जहाँ अपनाव ही बने गई अवस्था। त्रिलोचन मिलकर गानेको जीवन और समाज से अटूट जुड़ने का एक जरिया मानते हैं। इस समूह गान में कहीं कहीं उनका लोक बिद्ध मन भी बिंबित है - आज सुनाना/फिर मिलकर गाना है/शैली बिरहे वाली।’ ‘बिरहा भोजपुरी क्षेत्र की एक विरहाकुल शैली है जिसे सुर, उठा उठा कर कई लोग गाते हैं - तब दुःख मानो बँट जाता है और दर्द छँट जाता है। सब अपने हो जाते हैं; अपनों से भी अपने/कवि की प्रकार भी है कि मेरे अपने, अपनों से भी अपने/खुले कंठ से गा तो/नए गीत जीवन के। खुले कंठ, यानी अपनी अंतरंग की भीतरी पर्त से - जिसमें न कोई दुःख हो, न बनावट और न ही अनमान मन/सब कुछ बस उन्मुक्त हो, इससे कम कुछ भी नहीं/तभी तो ये जीवन गीत बनेंगे, वह भी नये, नवेले, ताज़ा, टटके। इस जीवन गीत का न अंत है न इति। यह कभी रुकता भी नहीं। साँस की तरह धड़कता रहता है - अनवरत/मरण आए, बिछोड़ा आए जीवन गीत चुकता नहीं, रुकता नहीं - जो छूटे हैं/उनके लिए नहीं रुक जाता है,/गाता है/गति के गान। हंस के हवाले से प्रस्फुटित यह पंक्ति सुख में दुख में चलते जाने, आगे बढ़ने और जीवन की गति को न रुकने देने का प्रेरक संदेश है। गति ही जीवन है - यह परम सत्य यहाँ उजागर है। सब चलें, सब बढ़ें, ‘सब अपनी अपनी लय पाएँ। एक दूसरे के साथ स्तर साधें। कभी तुम्हारा स्वर दुहराएँहम और कभी तुम हमारा। स्वर दुहराओ, कुछ इस तरह कि एक लहर में लहराएँ फिर/कंठ कंठ के गान। तभी यह असंभव भी संभव हो पाता है कि गीत कहीं कोई गाता है/गूँज किसी उर में उठती है। प्रेम, लगाव और एकता प्रेम की भावना के नतीजे को त्रिलोचन इन शब्दों में दिखाते हैं - गा कर अपने गान स्वरों से आसमान को/मुखर करेंगे और प्यार सबको परसेगा। प्रेम की आवाज़ को दिग दिगंत तक मुखरित करने का ऐसा संकल्प विभोर करने वाला है, वही ले सकता है यह संकल्प जो औरों के साथ हो; दिन रात, अहर्निश, पल पल मेरा दिन भी औरों के ही साथ कहीं है।एक आदमी की तरह साथ रहने और आदमी की तरह पहचाने जाने की बड़ी छोटी सी अभिलाषा एवज में चाहता है कवि कि - आदमी हम ऐसे हों/कि जिनके बीच रहते हैं/वे भी हमें आदमी कहें/और यों ही सदा जानते रहें।आज के अलगाव, बिलगाव और विखंडन के उत्तर आधुनिक समय में त्रिलोचन के इस भाव की फिर फिर पड़ताल और फैलाव ज़रूरी है।

त्रिलोचन जीवन की उत्कृष्टता के हामी कवि होने के साथ ही जीना सिखाने वाले एक बिरले कवि हैं। उनकी कविताएँ इस मामले में मात्र इशारा नहीं करतीं, सीधी और साफ़ भाषा में जीने के गुर समझती हैं। भर दे दुनियाँ को खिलखिल से कहने वाले त्रिलोचन अपने आत्मीयों (समस्त मानव समुदाय उनके लिए आत्मीय है) को दुनिया जहान को खुशी देने का पाठ पढ़ाते हैं। सिर्फ देनेका नहीं खुशीसे भर देने का, जिसके लिए उनका शब्द खिलखिल’ - अपार और निश्च्छल प्रसन्नता ही खिलखिलाती है। भय, मृत्यु, आलस्य का त्रिलोचन से बड़ा कोई दुश्मन नहीं - साहस, अमरता, गति के वे पक्षधर हैं - बाधाओं की भीड़ देख कर/आधे पथ से फिरना कैसा?/जाने दो जब मरण सदम है,/कायर का-सा मरना कैसा?/दिन न एक रस सदा मिलेंगे/संशय मन में भरना कैसा?’ इन पंक्तियों का एक एक शब्द कितना कुछ सिखा जाता है - कैसाके प्रयोग से यह सीख निर्भय जीवन का हमारे लिए पथ प्रशस्त कर देती है। और ये पंक्तियाँ हमें साहस, तेज और ओज के अगले पड़ाव पर ला खड़ा करती हैं कि - बाधाओं की ओर न आँख उठाओ/अत्याचारी को निस्तेज बनाओ/ पराजयों में गान विजय के गाओ। त्रिलोचन जानते हैं कि तन-मन का आलस्य मनुष्य को जल्दी घेर लेता है। आलस्य से शिथिल लोगों की जागृति ही उसे कर्मठता की ओर, संकल्पों ी ओर, विवेक की ओर मोड़ सकती है, सो, कवि ने पुकार लगाई है - मत अलसाओ/मत चुप बैठो/तुम्हें पुकार रहा है कोई।और फिर क्या संरचना में लिपटी ये पंक्तियाँ भी - पछताना क्या, थक जाना क्या,/बलसाना क्या, भय खाना क्या,/जब तक साँसा तब तक आसा/यह मंत्र सुनाती हूँ।’ ‘संधा ताराके माध्यम से दिया गया यह जीवन मंत्र गाँठ में बाँध लेने योग्य है। और इसी के साथ हताशा और दुःख की जगह जीवन में विश्वास, संकल्प और सुधि (विवेक) को अपनाने का आग्रह करने वाले ये प्रेरक और उद्‌बोधक वाक्य - कब कटी है आँसुओं से राह जीवन की/दीप सा विश्वास ही है चाह जीवन की/साँस है संकल्प, सुधि है थाह जीवन की। इसलिए पग पग पर जोत नई उकसाओ/पैर बढ़ाओं।इस तरह मानव जीवन को बिखरने न दे पाने की शपथ ले कर चलने वाले कवि हैं - त्रिलोचन। मनुष्य को इतनी चिंता मेरे जाने और किसी कवि ने नहीं की है - सो गया था दीप/मैंने फिर जगाया है’ - जब लिखते हैं त्रिलोचन तो एक पल भी अविश्वास नहीं होता। एक कविता को लगभग पूरा पढ़ा जाय, कवि की जीना सिखाने के सात्विक हठ को तफसील से समझने और जीवन में धारने के लिए - बढ़ो मृत्यु की ओर नज़र से नज़र मिलाओ/डर क्या है, जीवन में जो कुछ कल होना है/आज अभी हो जाय/तुम्हें यदि कुछ खोना है/तो अपने मन का भय/जड़ मूल से हिलाओ/इस दुर्बल तरु को, धक्के अनवरत खिलाओ/इस उस क्षण में उखड़ जाएगा, जो कोना है/इसका अपना, वहाँ साहस बीना है,/फिर इस बिरवे को विवेक-जल सदा पिलाओ.../कितनी सार सँभाल रखो पर जीवन की लौ/बुझती ही है ..... आगे फटती है पो,/कौन कहेगा तुमने सागर व्यर्थ थहाए। कोई संशय अब नहीं कि त्रिलोचन कबीर की काशी में जितना रहे, रम कर हरे। प्रेम के बिना आदमी से कुछ न बनेगा। प्रेम कबीर का भी बिंदु है मानवता का और त्रिलोचन का भी - प्यार बीज है, मन बोता है/चीन्ह चीन्ह कर क्षेत्र; कहाँ से वह पाता था/ऐसे ऐसे बीज/बीज कोई खोता है?’ प्रेम ही जीवन है। कवि त्रिलोचन से और इस बहाने सभी कवियों से कहा प्रेम ने कवि मुझको भूले न भूलना/जीवन को सर्वदा रूप मैं देता आया।

त्रिलोचन की कई कविताओं से उनका जीवन झाँकता है और उनकी सोच भी। आलोचकों ने कहा है कि यह उनकी आत्मपरकताहै, ‘आत्मग्रस्तता नहीं। निरालाकी तरह त्रिलोचन अपनी जंदगी के कड़वे मीठे अनुभवों को ही नहीं प्रकटते; एक मोड़ पर खड़े होकर आत्मालोचन भी करते हैं। इसके अलावा भी सर्जना के पड़ावों पर उन्हें बरग लाने वालों पर व्यंग्य रसे सराबोर टिप्पणियाँ भी करते हैं। त्रिलोचन के इस जीवन सत्य में एक स्तर वह साहस, जुझारूपन और दृढ़ता वाला है जिन्हें साथ ले कर चलने का आग्रह वे अपने प्रियजनों से भी करते रहे हैं - वही भाव मैंके साथ इस तरह अभिव्यक्त हुआ है - दूज का है चाँद, तम मेरा करेगा क्या/राह मैं चलता रहूँगा,/ठोकरें सहता रहूँगा,/गिर पडूँगा, फिर उठूँगा,/और फिर चलता रहूँगा;/ठोकरों से, हार से/कोई डरेगा क्या/साथ चाँदी है, न सोना,/कर्म के ही बीज बोना,/खेत काया है, बना है,/और यह अवसर न खोना;/हाथ बाँधे यह लहर कोई तरेगा क्या। आत्मालोचन के स्तर पर त्रिलोचन अपने जीवन का लेखा जोखा करने हुए खोने के सत्य से घबराते या हताश नहीं होते, अपनी कमियों कमज़ोरियों से सबक लेकर, कलुष को धो पोंछकर आगे बढते रहने की ठान चलते हैं - जब अपना लेखा जोखा/किया, बात उतराई, खुल कर आगे आई,/इधर उधर में रहा, गाँठ का भी सब खोया।/दिन रहते मैंने सुधि पाई,/और नहीं, अब और नहीं, ढोया तो ढोया। दिन रहते सुधि पाने वाले कवि हैं त्रिलोचन। सुबह के भूले की तरह शाम को लौट पड़ने का विश्वास लिए हुए। आदमी दोषों का पुतला है, पर दोषों को न वह खुद देखना चाहता है; न उसे यह बर्दाश्त होता है कि कोई दूसरा उसके दोषों पर उँगली दसे। त्रिलोचन ऐसे आदमी नहीं हैं - वे खुलकर कहते हैं कि कड़वी से कड़वी भाषा में दोष बताओ/मुझको मेरे; सदा रहूँगा मैं आभारी।और अपनी गलतियों का उन्हें भान भी है, और इसका भी कि वे क्यों हुईं - जहाँ जहाँ मैं चूका, थी मेरी लाचारी। लाचारी इसलिए कि मेरे मन में एक और मन है जो सारी/बातें उल्ट दिया करता है, सब तैयारी/रह जाती है।मन की दुर्बलता किसमें नहीं होती? उसे तो जीतना ही होता है। कहा भी गया है - मन के जीते जीत है मन के हारे हार। त्रिलोचन अपने दुचित्ते मन को जीत कर उलट गई बातों को सीधी कर लेने को दृढ़ संकल्प हैं - मैं फिर अपने को देखूँगा, फिर जो उतरन,/इधर उधर की, इनकी उनकी संचित की है/फेंक फाँक दूँगा। त्रिलोचन यह भी कहना चाहते हैं कि मानव मन प्रकृतिकः मैला नहीं होता, वह कलुष बनता है बाहरी तत्वों और प्रभाव से। दिन रहते त्रिलोचन इन उतरनों को चीन्ह तो पाए ही हैं, इन्हें फेंक फाँक देने को उद्यत भी हैं। यह बाहर की मैल कवि त्रिलोचन को सर्जना का अलग बाना धारने को भी ललचाती रही है। वे सामान्य आदमी थे, पर ऊँचे कवि। प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, साम्यवाद के पैरोकार उन्हें अपनी-अपनी ओर खींचने का बहुविध यत्न करते हैं - प्रतिभा नहीं चाहिए, मेरे गट में आओ, इधर उधर मत भटको।पर त्रिलोचन का उन्हें कहना है कि आओ, इस प्रगतिवाद को छोड़ें/कविता की बात करें। त्रिलोचन ने कविताके सिलसिले में कभी समझौता नहीं किया और अपने बहलाने फुसलाने वालों पर करारा व्यंग्य भी किया - हो तुम भी घोचूँ ही/भाषा, छंद, भाव के/पीछे जान खपाते हो/पद गया जमाना/इनका/छोड़ो भी/आओ, अब से मन माना/लिखा करो/गद्य ही ठीक है/अब कटाव के/ढब बदले हैं/बोल चढ़े हैं भाव ताव को/ .....विषय नहीं सूझता?/अजी तुम लिख दो ढेला’/इसके बाद लिखो हँसता था’/इसके आगे?/बहुत खूब, आ हा, ‘भीनी सुगंध उड़ती थी/फिर नभ में उमड़ा घुमड़ा मेघों का मेला,/सन्नाटा छा गया, धरा पर अंकुर जागे’/यह प्रयोग है, कलम जिधर चाहा मुड़ती थी। त्रिलोचन वादोंकी सच्चाई से खूब वाकिफ़ हैं कि वे सब पर्त बनाए/शब्द रचा करते हैं, - वही अर्थ उतराए/जिसकी आकांक्षा हो,/चाल दिखा जाते हैं। कविता त्रिलोचन के लिए समाजी यथार्थ को सही बदलाव की ओर मोड़ने और लोगों के दुख-दर्द को पी पी कर जीने का उपक्रम है। वे आशा, विश्वास और साहस के कवि हैं। वे जीवन की नश्वरत को बूझते हैं अतः निर्भय हैं। वे पंत की तरह दूसरे जीर्ण पत्रों के द्रुत गति से झर जाने की अभिलाषा नहीं रखते और न ही निराला की तरह जीवन की सांध्य बेला का मातम करते हैं। वे अंत को सहज देखते हैं और पौढ़े जीवन के दर्प के साथ कह पाते हैं कि बिछे बाग में थे पतझर के टूटे पत्ते,/ऊपर किसलय नई शान से लहराते े/वायु तरंगों में, रह रह कर दिखलाते थे। नई नई थिरकन।/.... हवा बही, सूखे पत्ते बोले, चल, चल, चल/हम सब देख चुके हैं जो तू देख रहा है,/भोग चुके हैं, जिन भोगों की साध जगाए/तू जीवन से लगा हुआ है;/हमें खाद बनना है, विधि का लेख रहा है/इसी अर्थ का, ऊँचे थे हम नीचे आए। त्रिलोचन एक अलग किस्म के कवि लगते हैं तो इसीलिए कि वे सच बोलते हैं, पूरे साहस के साथ। उनका कवि सर्वजन के साथ फिरता है। उन्हें सच्चे सपने बेचता है। त्रिलोचन के ये सपने ही उन्हें धरती के जनपद के कवि के रूप में मान प्रतिष्ठा दिलवाते हैं : सपने लो सपने लो/मन चीते सपने लो/जिसका विश्वास टूट गया हो/साथ और कोई न हो/वह मेरे सपने ले/जिसका बल, अवसर पर, धोखा दे जाता हो/वह मेरे सपने ले/जिसको कुछ करने की, भलीभाँति जीने की, इच्छा हो/वह मेरे सपने ले/गाँव-गाँव नगर-नगर गली-गली डगर/मैं पुकार रहा हूँ/सपने लो सपने लो।सच, त्रिलोचन की कविताएँ यह सब करती हैं, ढाँढस बँधाती हैं, साथी बनकर दूर तक साथ चलती हैं, बल देती हैं, आत्मविश्वास बढ़ाती हैं, कुछ करते रहने को उकसाती हैं, खालिस जीवन जीने के गुर बतलाती हैं, स्वावलंबन बन कर सीना ताने जीने का साहस देती हैं - नहीं चाहिए, नहीं चाहिए मुझे सहारा,/मेरे हाथों में पैरों में इतना बल हैं,/स्वयं खोज लूँगा किस किस डाली में फल है। त्रिलोचन की कविताएँ थके हारों को भी मंजल तक पहुँचने की शाम्र देती हैं - दुनिया का रास्ता अपने पैरों चल लेंगे/मंज़िल तक पहुँचेगे तब जा कर कल लेंगे। त्रिलोचन का जीवट उनकी ज़िंदगी और उनकी कविता में भी कूट कूट कर भरा हुआ दिपता रहा है। कविता और जीवन का फर्क चाहे कहीं और मिली, त्रिलोचन की सर्जना में दोनों चंदन पानी की तरह घुलमिल गए हैं।

-- क्रमशः 


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