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ISSN 2292-9754

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06.20.2017


विजय पताका

वे शहद
चटाते हैं!
तुमको
मैं नमक
लगाता हूँ!
तुमको

वे स्वप्न
दिखाते हैं!
तुमको
मैं झलक
दिखाता हूँ!
तुमको

वे रंग लगाते हैं!
तुमको
मैं रक्त
दिखाता हूँ!
तुमको

गर्दन पर चाकू
मलते हैं! वे
मैं बलि
चढ़ाता हूँ!
तुमको

झाँसे में रखते! वे
प्रतिक्षण
मैं सत्य
दिखाता हूँ!
तुमको

आह्लादित करते! वे
पल-पल
निर्लज्ज बनाता हूँ!
तुमको

विस्मृत कराते! वे
शक्ति तेरी
मैं स्मरण कराता हूँ!
तुमको

वे मौन बताते!
सभ्य ज्ञान
उदण्ड बनाता हूँ!
तुमको

तुझमें रचते! वे
नीति कूट
मैं रण में लाता हूँ!
तुमको

शस्त्र त्याग! तूँ
हे! अर्जुन
उपदेश बताते! वे
तुमको
करता हूँ! मैं
शंखनाद
महाभारत रण लाता
तुमको

उठ जा! हे
तूँ, मानव पुत्र
रथ में बैठा! मैं
तेरे साथ

तूँ देख! अनोखा
लक्ष्य अडिग
भेद उसे तूँ! कर
प्रहार

उत्पन्न करेंगे!
विघ्न बड़े
शत्रु सदैव ही
शत-शत बार

नाश करेगा! स्वयं
शौर्य से
कूट रचित
शत्रु जंजाल

फहरायेगा!
'विजय पताका'
राष्ट्र नहीं
ब्रह्माण्ड! विशाल

अविस्मरणीय होगी
कीर्ति तेरी
पाँव पड़ेंगे
धरा! महान


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