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ISSN 2292-9754

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06.20.2017


वे आ रहें हैं

सत्य को प्रतिष्ठित बनाने
मार्ग पर तुमको चलाने
चक्षुओं से, चुनके काँटें
हृदय से अपने लगाने

वे आ रहें हैं.........

आसमां के पार से
स्वयं फँसे, मंझधार से
इस धरा पर, धर्म रक्षक
हमको बुलाने!

वे आ रहें हैं.........

शंखनादों का समूह
विजयश्री, समेटे हुए
विश्वास रथ, वे हो सवार
सत्य ध्वज फहरा रहे

वे आ रहें हैं.........

सुन! पथिक
मत हो! निराश
कर, अपने तूँ
कर! सपाट
देख! वो ललचा रहे

वे आ रहें हैं.........

साहस थोड़ा, तूँ जुटा
प्रत्यंचा पर बाण चढ़ा!
निज-पर मिथ्या, समस्त भुला
अधर्म केवल, लक्ष्य बना!
अत्याचार बरपा रहे

वे आ रहें हैं.........

तूँ तो, धर्म का दूत है
सत्य तेरा रूप है
भरा शौर्य, मस्तक है तेरे
आशा का प्रतिरूप है
तनिक देख! न्याय वो खा रहे

वे आ रहें हैं.........

इच्छाओं को अग्नि दे!
सिर चढ़ीं हैं, बोलतीं
ताण्डव करतीं वेदनायें
अस्मिता ले जा रहे

वे आ रहें हैं.........


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