अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
06.05.2017


हिंदी उपन्यास "मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ" और जनांदोलन

"हम विरोध करेंगे। ये जमीन हमारी है। हमारे पुरखों ने खून पसीना एक कर इसे रहने और खेती करने लायक बनाया है...... जब तक गाँव में एक भी व्यक्ति बचा रहेगा, प्रतिरोध जारी रहेगा।"1

भारत देश के प्रगतिशील इतिहास में एक सुनहरा पन्ना "सुल्वा जुड़ुम" के नाम से भी है। "सल्वा जुड़ुम", एक आंदोलन जो माओवादी नक्सलियों के विरोध में था। इस आंदोलन के प्रारम्भ से लेकर अब तक उस इलाक़े के आदिवासियों की दुर्दशा अवर्णनीय है, जिसमें आदिवासियों की सामूहिक हत्या से लेकर, चोरी, बलात्कार तक शामिल है। यह सब 600 आदिवासी गाँवों. में हुआ और परिणामस्वरूप लाखों आदिवासी विस्थापित होने को विवश कर दिये गए।

इन त्रासदियों के पीछे कारणों की तलाश करें तो हमारा पहला पड़ाव "पर्यावरणीय विनाश" पर ही पड़ता है। नव उदारवादी आर्थिक नीतियाँ हमारी नीतियों के प्रतिशक्ति के रूप में उभर कर आईं। नव उदारवाद ने अपनी यात्रा में 1990 में भारत को भी कब्ज़े में ले लिया। बड़ी संगठित पूँजी और सरकारी शक्तियों का गठबंधन हुआ। इसने पहले से ही प्रभाव हीन नीतियों के सामने एक और दीवार खड़ी कर दी।

राष्ट्रीय आय को विकास मानने के कारण सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन का सारतत्व जन सरोकारों और राष्ट्रीय ज़रूरतों, दोनों से पर्याप्त तथा सार्थक तरीक़ों से नहीं जुड़ पाया। राष्ट्रीय आय वृद्धि-प्रक्रिया के कर्ता-धर्ता शुरू से ही आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक मामलों में अत्यधिक शक्तिशाली देसी-परदेसी तबक़े से थे। धनी देशों के साथ समकक्षता-सादृश्यता प्राप्ति के प्रयासों ने उनकी शक्तिओं और संसाधन नियंत्रण को और अधिक गहराई और विस्तार दिया। परिणामस्वरूप पूँजीवादी शक्तियाँ उभरकर सामने आने लगीं। शोध कहते हैं कि, "भारत जैसे देश में पूँजीपतियों के व्यापारिक हित एवं मूल्य को प्राथमिकता मिलने से जनतंत्र, पर्यावरण, मानवाधिकार एवं सामाजिक न्याय की उपेक्षा की जाती है।"2 121 करोड़ की आबादी वाले देश में 90 प्रतिशत जनता की मान्यताओं को अनदेखा कर मुट्ठी भर पूँजीपतियों के हित में देश की हर तरह की आज़ादी को साम्राज्यवादी शक्तियों को सौंप देना एक सुनियोजित षड्यंत्र है। आर्थिक उदारीकरण को लागू करने के बाद डेढ़ दशक के भीतर ही पूरे देश में वैश्वीकरण का दुष्प्रभाव दिखने लगा। समाज के निम्न तथा मध्य वर्ग इसकी चपेट में आ गए। "फलतः न तो ज़्यादातर भारतीयों, विशेषकर बाज़ार द्वारा असमावेशित ग़रीब और आजीविका साधन विहीन लोगों को उत्पादन प्रक्रिया में समुचित भागीदारी देने का प्रबंध हुआ और न ही उनकी ज़रूरतों, रुचियों, जीवनशैली और पोसावट के अनुरूप वस्तुओं एवं सेवाओं का उत्पादन पर्याप्त प्राथमिकता प्राप्त कर पाया।"3 बाज़ार से लेकर सत्ता तक में पूँजी का हस्तक्षेप होने लगा। बहुराष्ट्रीय कंपनियों को विदेशी पूँजी के निवेश के नाम पर देश की प्राकृतिक संपदाओं और संसाधनों के लूट की अनुमति स्वतः मिलने लगी। इसकी प्रतिक्रिया में यहाँ के शोषितों, विस्थापितों में प्रतिरोध की संस्कृति जगी। जगह-जगह जंगल आंदोलन शुरू हुए। सभाएँ, धरना, प्रदर्शन, रैलियाँ आदि शुरू हुई। उपन्यास में इनका चिंतनपरक चित्रण किया गया है।

ताई के मायके में "सगेन" का इन आंदोलनों से परिचय होता है। वहाँ उसे सुनने को मिलता है, "..... पिछले कुछ वर्षों से हो रही सरकारी ज़्यादतियों के ख़िलाफ़ है हमारा यह जंगल आंदोलन। आप लोग जानते होंगे कि 1973 में केंदु पत्ता व्यवसाय को राष्ट्रीयकृत कर दिया गया है। केंदु पत्ता जिससे आप लोग बीड़ी बनाते थे, जो आप लोगों के रोज़गार का एक महत्त्वपूर्ण ज़रिया था, आप लोगों की पहुँच से दूर हो गया है। सरकार के इस क़दम से आप लोगों में से कितनों की ही रोज़ी-रोटी छिन गयी होगी। छिन गयी है न?"4 ज़ाहिर है भीड़ का जवाब "हाँ" में ही आता। उनकी आजीविका का साधन उनके हाथ से निकल ही चुका था। डॉ. वीर भारत तलवार ने अपनी पुस्तक "झारखंड के आदिवासियों के बीच: एक एक्टिविस्ट के नोट्स" में बक़ायदा उल्लेख किया है कि किस प्रकार इन आदिवासियों के ऊपर तमाम प्रकार के नियम-क़ानून थोपकर उनके घरेलू पेड़ों, जंगलों को हथिया लिया गया और उन्हें साफ़ करके व्यावसायिक दृष्टिकोण से ज़्यादा लाभदायक सागवान और सफ़ेदा आदि लगाए जाने लगे। सागवान साल की अपेक्षा आधे उम्र में ही बड़ा और तैयार हो जाने वाला वृक्ष है। इन पेड़ों से न तो उनका (आदिवासी) कोई सांस्कृतिक जुड़ाव होता है और न ही विशेष आर्थिक लाभ मिल पाता है। और ज़्यादा पानी सोखने के कारण जो ज़मीन अनुर्वर हो जाती है वो अलग।5 आंदोलनकारी कहते …. "इसीलिए तो हम अपने आप को ठगा सा महसूस करने लगे। हद तो तब हुई जब इसके एक वर्ष बाद साल के बीजों पर सरकार ने अपना अधिकार जमा लिया और फिर तीन साल बीतते न बीतते जंगल की तमाम लघु वनोपजों को भी राष्ट्रीयकृत करके पूरा व्यापार अपने हाथों में ले लिया....।"6 ऐसे क्रांतिकारी आंदोलनों की एक प्रवृत्ति होती है कि वे एक दिन में ही नहीं उठ खड़े होते। तमाम अत्याचारों को लंबे समय तक बर्दाश्त करने पर भी हल न निकले तो प्रतिरोध ही उसका एक मात्र रास्ता होता है और ऐसे जन आंदोलन उभर कर सामने आते हैं। और फिर भी सुनवाई न होने पर हथियार उठाना स्वाभाविक लगने लगता है। आंदोलनकर्ता दोहराते हैं, "पर अब वक़्त आ गया है विरोध जताने का, अपने अधिकारों के लिए लड़ने का। कोल विद्रोह में अँग्रेज़ों के छक्के छुड़ाने वाले वीरों के वंशजों! आइये, आज आप लोग भी हमारे साथ इस आंदोलन में शामिल होइए...... ।"7 इस प्रकार ये प्रदर्शन लगातार बढ़ते गए। पर इन सबसे कोई आश्वासन मिलता न दिखा तो प्रभावित इलाक़े के आदिवासियों ने "सरकारी लगाए गए सागवानों की कटाई प्रारम्भ कर दी। इसके पीछे इनका तर्क होता था, इन जंगलों पर हमारा पारंपरिक अधिकार रहा है। जब बाहरी लोग आकार जंगल साफ़ करके अपने लाभ के लिए सागवान उगा सकते हैं, तो पेड़ काटकर हम क्यों नहीं कर सकते खेती?"8 सगेन इन आंदोलनों और प्रदर्शनों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने लगा। उसे इन गतिविधियों में मज़ा भी आता और साथ ही साथ वह बहुत कुछ सीखता भी।

पर्यावरणीय विमर्श अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा होने के साथ साथ उपन्यास में स्वास्थ्य तथा चिंता के रूप में भी व्यक्त हुआ है। वृक्ष अथवा पृथ्वी के संरक्षण की चिंता हम कहीं से भी करें, यह उसके और हमारे हित में ही है। हमारे देश के प्रबुद्ध चिंतकों का मत होता है कि जब भारत आगे बढ़ रहा है, विकास कर रहा है, तो राष्ट्र हित में कुछ लोगों का विस्थापन उतना मायने नहीं रखता। इस मुद्दे पर सगेन क्षुब्ध होकर यह स्वीकार करता है कि यह विकास शायद देश के लिए ज़रूरी हो। सस्ती ऊर्जा, उच्चस्तरीय सुरक्षा तथा चिकित्सा के लिए हम आदिवासियों का बलिदान भी जायज़ है। परंतु एक सवाल जिसका जवाब आदिवासियों को चाहिए कि "यदि परमाणु कचरे को फेंकने के लिए किसी नए टेलिंग डैम की खुदाई आदिवासी इलाक़े में न करके जागरूक, सभ्य, सत्ताधारी, लोगों की बस्ती में...... दिल्ली, कोलकाता, मुंबई या चेन्नई में की जाए तो? वहाँ के पढ़े-लिखे, पैसे वाले, सत्ताधारी लोग इसे होने देंगे? क्या वे देश हित में हमारी तरह अपना घर-बार, शहर छोड़कर कहीं और चले जाना पसंद करेंगे?9

वरिष्ठ आलोचक मोहनकृष्ण बोहरा इस पर सटीक व्यंग्य करते हुए लिखते हैं कि, "आख़िर अधिक बिजली तो उन्हीं को चाहिए! फिर वे क्यों विकिरण के आस्वाद से वंचित रखे जाएँ?"10 लेखिका की दृष्टि तो यहाँ तक भी पहुँची है कि यूरेनियम खनन की त्रासदी मात्र पर्यावरण तक ही सीमित नहीं रहती। वह मानव के सामाजिक-सांस्कृतिक सम्बन्धों पर भी अपना कुप्रभाव दिखाती है। प्रारम्भ से हम मानव शास्त्र का अध्ययन करें तो पाएँगे कि मानव का विकास पर्यावरण के बदलाव और उसके दोहन के समांतर ही हुआ है। आदिम मानव प्रकृति को अपना सहचर मानता था तथा उसके साथ संतुलन बनाकर चलता था। वृक्ष और पौधों से प्राप्त खाद्य सामग्री पर ही जीवन यापन करता था। आधुनिक युग की तरह उपभोग के साधन न थे जिसके कारण ऊर्जा की खपत भी ऊर्जा की उपलब्धि के अनुपात मे बहुत ही कम थी। मानव को जीवित और सक्रिय रहने हेतु ऊर्जा सहज रूप से प्राप्त हो जाती थी किन्तु जैसे-जैसे मानव विकास करता गया, उसके और प्रकृति के बीच असंतुलन बढ़ता गया।

आज तो सम्पूर्ण आधुनिक सभ्यता प्रति व्यक्ति ऊर्जा की अधिक से अधिक खपत पर आधारित है। ऐसी स्थिति में पर्यावरण को बचाना कैसे संभव होगा, यह एक विचारणीय बिन्दु है। यूरेनियम कंपनी ने अपने स्वार्थ के लिए आदिवासियों को उनकी झोपड़ियों और खेतों से जिस तरह बेदख़ल किया है उससे ही इन जंगलों में अराजक तत्त्व अपनी पैठ बना पाये हैं। सरकार की वन नीति और पुलिस की क्रूरता ने भी आदिवासियों से उनका जंगल छीना है। एक ओर जहाँ पूँजीपति और माफ़िया मिलकर जंगल की लकड़ी की तस्करी कर रहे हैं वहीं दूसरी ओर जब आदिवासी चूल्हा जलाने के लिए भी लकड़ी काटते हैं या पेट भरने के लिए वनोपज तोड़ते हैं, तो पुलिस उन्हें पकड़ लेती है। नतीजा यह होता है कि लोग पुलिस विरोधी ही नहीं, सरकार विरोधी भी हो गए हैं। इसका लाभ भी अराजक तत्वों को मिला है।

उपभोक्तावादी प्रवृत्ति को भारत जैसे तीसरे देश में स्थापित करने में वैश्वीकरण का योगदान अहम रहा है। इस व्यवस्था में प्रत्येक स्तर पर दो ही वर्ग बनते हैं- अमीर और ग़रीब। पूरी दुनिया में "अमीर और ग़रीब" देश, देश में अमीर और ग़रीब नगर, महानगर और फिर लोगों का भी विभाजन इसी वर्ग के आधार पर होना शुरू हो जाता है। स्थिति यह है कि वर्ग भेद गहराता जा रहा है। संपत्ति कुछ लोगों के पास हो रही है तो दूसरी ओर दो जून की रोटी भी संघर्ष का कारण बन रही है। प्रभाकर श्रोत्रिय इसको व्याख्यायित करते हैं, "यह शुद्ध रूप से बाज़ारवाद है जिसे उदारीकरण के मोहक शब्द जाल में बांधा गया है, जो यह सुनिश्चित करता है कि ग़रीब देश और ग़रीब लोग विश्व के नक़्शे से मिट जाए दूसरे शब्दों में, यह पूँजीपति देशों का आर्थिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक एवं सुरक्षात्मक अधिनायकवाद है, जो ग़रीब देशों की अस्मिता और वैविध्यता को नष्ट करता है।"11 और इसका प्रभाव इतना क्रूर होता है कि हमारा अपना समाज उसके तर्ज़ पर द्विभाजित होने लगता है और मज़बूत वर्ग अपने हितों के लिए कमज़ोर वर्ग का शोषण प्रारम्भ कर देता है। अपने आर्थिक लोभ के कारण हमारे ही पूँजीपति राज्य तथा सत्ता से मिलकर हमारी ही जातीयता और परंपरा को नष्ट करने पर तुल गए हैं। आंदोलन के साथ-साथ उपन्यास इस पर भी पर्याप्त विमर्श करता है, "जंगल के बिना हम जिएंगे कैसे? हमारी झोंपड़ी, खटिया बनाने की लकड़ी और रस्सी, जंगल से आती हैं। साल पत्ते में हम और हमारे बोंगा, हमारे देसाउलि, डियंग पीते हैं, खाना खाते हैं। साल की लकड़ी और पत्तों के बिना शादी ब्याह से लेकर जन्म मृत्यु तक का कोई भी संस्कार संभव है क्या?...", "हम अपने पशुओं को चराएँगे कहाँ?" "सूप, टोकरी या चटाई कैसे बुनेंगे?" "जड़ीबूटियाँ भी तो जंगल से ही आती हैं।" "जंगल हमारा भगवान है, हमारा बिर बोंगा, बुरू-बोंगा" इसके साथ किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं करेंगे।"12 और इस तरह खाना-पीना, फल-सब्जी, आजीविका, धर्म-संस्कृति, परंपरा, रीति-रिवाज, संस्कार, मनोरंजन, बिर बोंगा, बुरूबोंगा आदि के केंद्र इसके जंगल जो चंद रुपयों के कारण काटे जा रहे हैं, तो उसके उत्तर में समवेत एक स्वर निकलता है, "आंदोलन! अब आंदोलन के बग़ैर कोई चारा नहीं।"13

कोई भी राष्ट्र या समाज, विकास की दौड़ में पीछे रह गए वर्ग को उठाकर आगे बढ़ने का प्रयास करता है। लेकिन जब इस प्रयास और प्रक्रिया के केंद्र में किसी विकसित और चालक वर्ग को लाभ पहुँचाने की कोशिश की जाती है और पिछड़े तबक़े के विकास के नाम का ढ़ोल पीटा जाता है तो इसका पुरज़ोर विरोध सभी जागरूक इंसानों को करना चाहिए। उपन्यास में पहले से ही ज़हर खाते, सूँघते, ओढ़ते आदिवासी आंदोलन में भी सक्रिय होते हैं। इस तरह उन्हें बहुविध त्रासदी झेलनी पड़ती है।

ध्रुव कुमार
शोधार्थी, हिंदी विभाग
दिल्ली विश्वविद्यालय

संदर्भ सूची:

1. "मरंगगोड़ा नीलकंठ हुआ", महुआ माजी, राजकमल प्र०, पृ० 167
2. जोसेफ स्टीग्लिस, संवेद, अंक-66, जुलाई-2013, पृ० 177 से उद्धृत
3. "नव उदारवादी आदिम संचयन: सामाजिक संसाधनों की लूट", कमलनयन काबरा, बहुवचन-30, पृ० 19
4. "मरंगगोड़ा नीलकंठ हुआ", महुआ माजी, राजकमल प्र०, पृ० 112
5. देखेँ, आदिवासी झारखंड, पृ० 41
6. "मरंगगोड़ा नीलकंठ हुआ", महुआ माजी, राजकमल प्र०, पृ० 112
7. वही, पृ० 113
8. वही, पृ० 114
9. "मरंगगोड़ा नीलकंठ हुआ", महुआ माजी, राजकमल प्र०, पृ० 347
10. "विकिरण की विभीषिका",मोहनकृष्ण बोहरा, जनसत्ता, संपादकीय, 7 Oct। 2012
11. प्रभाकर श्रोत्रिय, संपादकीय, समकालीन भारतीय साहित्य, जु०-अग० 2011, पृ० 07
12. "मरंगगोड़ा नीलकंठ हुआ", महुआ माजी, राजकमल प्र०, पृ० 113
13. "मरंगगोड़ा नीलकंठ हुआ", महुआ माजी, राजकमल प्र०, पृ० 114


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें