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ISSN 2292-9754

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06.05.2016


गोदान: अन्नदाता की अनन्न स्थिति

भारत किसानों का देश रहा है, यह अपनी परम्परा एवं सांस्कृतिक सुदृढ़ता के कारण जग में जाना जाता रहा है। अनेकता में एकता भारत की पहचान रही है। किसान जो सबके लिए अन्न उपजाता है किन्तु आज वही संकटग्रस्त है। किसान की आस्था आज भी ज़मीन के प्रति वैसी ही है जैसी सामंतकाल में थी। वह आज भी सम्पूर्ण श्रम व जीवटता के साथ ज़मीन से चिपका हुआ है। "जैजात किसी से छोड़ी जाती है कि वही छोड़ देंगे? खेती से क्या मिलता है? एक आने नफरी की मजूरी भी तो नहीं पड़ती। जो दस रुपये महीने का नौकर है, वह भी हमसे अच्छा खाता-पहनता है; लेकिन खेतों को छोड़ा तो नहीं जाता। खेती छोड़ दें, तो और करें क्या? नौकरी कहीं नहीं मिलती है? फिर मरजाद भी तो पालना ही पड़ता है। खेती में जो मरजाद है, वह नौकरी में तो नहीं है।"1 स्वतंत्रता पूर्व किसानों की जो स्थिति थी, वर्तमान में उससे बहुत बेहतर की कल्पना नहीं की जा सकती। किसान कल भी ज़मीन से गहरा जुड़ाव रखता था, और आज भी उसका लगाव कम नहीं हुआ है। किन्तु पहले आज जैसी स्थिति नहीं थी, आज तो किसान कर्ज से इस तरह परेशान है कि उसकी परिणिति आत्महत्या के रूप में देखने को मिल रही है। भारत में किसान आत्महत्या जैसी जघन्य समस्या की शुरूआत लगभग नौवें दशक के बाद पैदा हुई स्थिति से होती है। जिसमें दस हज़ार से अधिक किसानों द्वारा प्रतिवर्ष आत्महत्या की रपटें दर्ज की गयी। "एक आकड़े के अनुसार 1997-2006 के बीच 1,66,304 किसानों ने आत्महत्या की।"2

अव्वल यह कि बहुत हद तक भारतीय कृषि की निर्भरता मानसून पर होती है। इसलिए मानसून की असफलता के कारण नगदी फसलें नष्ट होना किसानों द्वारा की गई आत्महत्याओं का मुख्य कारण माना जाता है। सूखा, मानसून की विफलता, बीजों की क़ीमतों में वृद्धि, ऋण का अत्यधिक बोझ आदि परिस्थितियाँ समस्याओं के एक चक्र की शुरूआत करती हैं। महाजनों, सामंतों, बिचौलिओं आदि के फेर में पड़कर भारत के विभिन्न हिस्सों के किसानों ने आत्महत्याएँ कीं। सरकार सिर्फ घोषणाएँ ही करती रह जाती है, मदद के नाम पर। और जो राशि मदद के रूप में पहुँचाई जाती है उसका क्रियान्वयन किस तरह होता है वह तो जग जाहिर है ही। सरकारी महकमें अपने अनुसार नीतियाँ बनाते हैं और उसका इम्प्लीमेंटेशन भी अपने अनुसार ही करते हैं। वर्तमान समय किसानों के लिए ज़्यादा त्रासदपूर्ण है। इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि "राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आकड़ों के अनुसार भारत भर में 2009 के दौरान 17368 किसानों ने आत्महत्या की है। किसानों के आत्महत्या की ये घटनाएँ 2008 के मुकाबले 1172 ज़्यादा हैं। इससे पहले 2008 में 16196किसानों ने आत्महत्या की थी।"3

यथार्थ साहित्य में अनेक रूपों में व्यक्त होता है। साहित्य का काम ही है जीवनानुभव को व्यक्त करना। किन्तु साहित्य की अन्य विधाओं के बरक्स उपन्यास जीवन के सर्वाधिक निकट प्रतीत होता है। मानव जीवन की वैविध्यता सर्वाधिक उपन्यास में ही दृष्टिगत होती है। समय और समाज की गतिकी व उसके विन्यास को यह विधा सर्वाधिक सशक्त तरीक़े से व्याख्यायित करती है। उपन्यास साहित्य की एक ऐसी विधा है, जिसमें जीवन के दुःख-सुख, हर्ष-विषाद, शोषण, विसंगतियाँ, आर्थिक असमानता, राजनीतिक-सामाजिक और आर्थिक मोर्चों पर होने वाले संघर्ष तथा अनेक ऐसी स्थितियाँ देखने को मिलती हैं, जिससे जगत को नज़दीक से देख पाते हैं। हिंदी आलोचना के शिखर पुरुष आचार्य रामचंद्र शुक्ल उपन्यास की महत्ता व शक्ति को स्वीकार करते हुए कहते हैं। "वर्तमान जगत में उपन्यासों की बड़ी शक्ति है। समाज जो रूप पकड़ रहा है उसके भिन्न-भिन्न वर्गों में जो प्रवृत्तियाँ उत्पन्न हो रही हैं, उपन्यास उनका विस्तृत प्रत्यक्षीकरण ही नहीं करते, आवश्यकतानुसार उनके ठीक विन्यास, सुधार अथवा निराकरण की प्रवृत्ति भी उत्पन्न कर सकते हैं।"4

दरअसल पहले किसान अपने आप को सम्मानित समझता था, नौकरी करना उसको गवारा न था। किन्तु समय ने कैसे पलथा मारा आज वही किसान नौकरी की फ़िराक़ में रहता है। संसाधनों का अभाव व्यक्ति को मजबूर कर देता है अन्य तरीक़ों को अपनाने के लिए। प्रेमचंद भारतीय किसान के जीवन की इस समस्या से बख़ूबी परिचित थे। उन्होंने जीवन भर किसानों की दयनीय स्थिति पर रचनात्मक पहल जारी रखा। वे किसान को किसान ही बने रहने देना चाहते थे न कि मज़दूर। किसान जो सभी के लिए अन्न उपजाता है उसका अपना आत्म-सम्मान होता है। वह दिनभर खेतों में काम करता है जब घर आता है तो उसके चेहरे पर ख़ुशहाली झलकती है। किन्तु यदि आज के किसान की बात करें तो पाएँगे वह किसानी के पेशे से ऊब चुका है। खेती को वह ‘मरजाद’ समझकर निभाए जा रहा है। छोटी सी भू-संपत्ति से वह मुक्त नहीं हो पा रहा है। "हारे हुए महीप की भाँति उसने अपने को इन तीन बीघे के किले में बंद कर लिया था और उसे प्राणों की तरह बचा रखा था। फाके सहे, बदनाम हुआ, मजूरी की; पर किले को हाथ से न जाने दिया; मगर अब वह किला भी हाथ से निकला जाता था। ....ज़मीन उसके हाथ से निकल जाएगी और उसके जीवन के बाकी दिन मजूरी करने में कटेंगे।"5

चिंतनीय यह कि क्या किसान की तक़दीर में सिर्फ पिसना, घुटना और त्रासदपूर्ण स्थितियाँ ही लिखी हैं? क्या विधि को यही मंजूर है? यह सरासर अनैतिक एवं अन्यायपूर्ण है। किसान भी एक सामान्य मनुष्य है, जिसे वे सभी सुविधाएँ मिलनी चाहिए जो एक मनुष्य को आपेक्षित हैं। प्रेमचंद ने गाँव की जो तस्वीर पेश की है, उसको देखने पर पता चलता है कि गाँव के भीतर एक और गाँव है। जहाँ मौक़ा परस्त लोग बसते हैं। जिनमें मानवीय तत्वों का नितांत अभाव दृष्टिगत होता है। जैसे- दातादीन, सहुआइन, पटवारी, झिंगुरी सिंह, राय साहब इत्यादि, जो हमेशा अपनी ही फ़िराक़ में रहते हैं, दूसरों की उन्हें चिंता ही नहीं रहती। किसान के शोषण के तरीक़ों में एक प्रकार महाजनी सभ्यता का भी है। महाजनी सभ्यता एक ऐसी व्यवस्था या मकड़जाल है जिसमें फँसकर किसान हाथ-पाँव मारते-मारते दम तोड़ देता है। उससे बाहर नहीं निकल पाता है। इतना सब होने के बावजूद भी क्या हम सोचने के लिए विवश नहीं होते, कि ऐसी दोहरी मानसिकता क्यों? सचाई यह कि किसान बहुत धैर्यवान होता है उसको भगवान् पर पूर्ण भरोसा होता है कि वह उसकी संकट के समय रक्षा करेगा। स्वतंत्र भारत की बात की जाय तो सरकारें ही किसानों के भगवान हैं, जो प्राकृतिक आपदा के समय उनकी मदद करती हैं। उन्हें संकट से उबारती हैं। प्रेमचंद की ही भाँति धूमिल के साहित्य में भी किसानों की सहज प्रवृत्तियाँ, चीज़ों को देखने व परखने का उनका नज़रिया बहुत ही प्राकृतिक तथा आशावादी है। जिस प्रकार किसान प्रकृति को देखकर मौसम का अनुमान लगा लेता है उसी प्रकार धूमिल की कविताओं में भी भविष्य के प्रति चिंता व्यक्त हुई है। "पशुओं की हरकतों से/तुम्हें आने वाले खतरों की गंध/मिलती है।"6

गोदान पढ़ते हुए आज ‘राम की शक्तिपूजा’ की बहुत याद आ रही है। प्रेमचंद के साथ निराला स्वतः ही चश्मदीद हो रहे हैं। चूँकि दोनों कृतियों और कृतिकारों में बड़ी समानता दिखाई पड़ रही है। दोनों ही के जीवन और कर्म-कौशल में कशमकश बरक़रार है। धैर्य जबाब देने को है। किन्तु पुरुषार्थ हमेशा विजित होता है। इसलिए आशा की एक न एक किरण शेष रहती ही है। राम की शक्तिपूजा में राम विभीषण से कहते हैं- ‘मित्रवर विजय होगी न समर’। यही कहकर वे शांत नहीं बैठते पुनः कह उठते हैं – ‘अन्याय जिधर है उधर शक्ति’। राम व्यथित हैं उन्हें निराशा आक्रांत किये हुए है। लगता है जैसे आशा निर्मूल हो चुकी है। अन्याय के विजय और न्याय के पराभव का समय है। राम सशंकित हो चुके हैं, उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा है। ठीक यही स्थिति गोदान में भी बनती है जब क़दम-क़दम पर अन्याय विजयी होता है और न्याय पराजित। दोनों रचनाएँ अपने समय और समाज के यथार्थ को उद्घाटित कर रही हैं। साथ ही प्रश्नाकुलता की मुद्रा में हमें सोचने के लिए विवश भी करती हैं। गोदान में भोला, होरी से कहता है- "कौन कहता है कि हम-तुम आदमी हैं। हममें आदमियत कहाँ? आदमी वह है जिसके पास धन है, अख्तियार है, इलम है। हम लोग तो बैल हैं और जुतने के लिए पैदा हुए हैं। उस पर एक दूसरे को देख नहीं सकते। ...एक किसान दूसरे के खेत पर न चढ़े तो जफा कैसे करे, प्रेम तो संसार से उठ गया।"7

किसानों के समक्ष कई समस्याएँ सुरसा की तरह मुँह फैलाये खड़ी हैं। अभी हाल ही में 12 दिसंबर को जुझारू एवं कर्मठ, किसानों की पक्षधरता संसद में रखने वाले नेता शरद जोशी नहीं रहे। उन्होंने किसानों की समस्याओं से जीवन भर जूझा। प्रेमचंद की परिपाटी का उन्होंने बख़ूबी निर्वहन किया। किसानों के अधिकारों के संरक्षण हेतु अनेक आन्दोलन चलाये। दूसरे जो महत्त्पूर्ण किसान नेता हुए हैं वे महेंद्र टिकैत हैं, जिन्होंने उत्तर-भारत के किसानों के लिए संघर्ष किया। जनसत्ता में छपी रिपोर्ट के अनुसार- "यहाँ चाकन में अपना किसान संगठन बनाने के बाद वे नाशिक जिले में प्याज उत्पादक किसानों के आन्दोलन का नेतृत्व कर चर्चा में आये जिसके हिंसक रूप ले लेने के बाद वे गिरफ्तार कर लिए गए। जल्द ही उन्होंने अपनी गतिविधियों का दायरा बढाया और गन्ना, धान, कपास, तम्बाकू और दूध जैसे कृषि वस्तुओं के लिए लाभकारी मूल्यों का मुद्दा उठाया। उन्होंने 1982 में सभी किसान संगठनों की एक गैर राजनीतिक समन्वय समिति को गठित करने के लिए उत्तर-भारत के किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत से हाथ मिलाया।"8

गोदान में किसानी जीवन की त्रासदी का महाकाव्यत्व विद्यमान है। प्रेमचंद उन समस्त कारणों की पड़ताल करते हैं, जिसके द्वारा किसान ठगा जाता है। गोदान में किसान का शोषण कई स्तरों पर होता है। यहाँ सीधे किसान शोषित नहीं होता बल्कि उसके आतंरिक संरचना को क्षति पहुँचाई जाती है। उसे पता भी नहीं चलता और वो शिकार भी हो जाता है। और यदि भान भी होता है तो वह भाग्य को दोष देकर, उसे अपनी नियति मान बैठता है। वह कितना विश्वासी है कि बार-बार ठोकर खाने पर भी नियति को ही दोषी मानता है। मनुष्य पर उसे कितना भरोसा है किन्तु वही मनुष्य उसकी दीनता का हेतु होता है। प्रेमचंद साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान्, शीर्षस्थ आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा लिखते है- "गोदान में किसानों के शोषण का रूप ही दूसरा है। यहाँ सीधे-सीधे रायसाहब के कारिंदे होरी का घर लूटने नहीं पहुँचते। लेकिन उसका घर लुट ज़रूर जाता है। यहाँ अंग्रेजी राज के कचहरी-कानून सीधे-सीधे उसकी ज़मीन छीनने नहीं पहुँचते। लेकिन ज़मीन छिन ज़रूर जाती है। होरी के विरोधी बड़े सतर्क हैं। वे ऐसा काम करने में झिझकते हैं जिससे होरी दस-पाँच को इकठ्ठा करके उनका मुकाबला करने को तैयार हो जाए। वह उनके चंगुल में फँसकर तिल-तिल कर मरता है लेकिन समझ नहीं पाता कि यह सब क्यों हो रहा है। वह तकदीर को दोष देकर रह जाता है; समझता है; यह सब भाग्य का खेल है, मनुष्य का इसमें कोई बस नहीं।"9

प्रेमचंद ग्रामीण व किसानी जीवन में व्याप्त धार्मिक एवं सामाजिक मान्यताओं, अंधविश्वासों, कुरीतिओं आदि का गंभीर एवं मनोवैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं। किसानी ज़िंदगी को यदि किसी चीज़ ने सर्वाधिक प्रभावी तरीक़े से जकड़े है तो वह है धर्म। ब्राह्मण प्रतीक है इस धर्म का। धर्म अनेक प्रकार से शोषण करता है, और किसान धर्म भीरु होता है। मुल्ला-मौलवी, पंडित-पुरोहित, साधु-महंत, सभी शोषक हैं। गोदान का एक पात्र दातादीन ऐसा ही धर्मनिष्ठ है जो आडम्बर और कर्मकांड रचता है। ग्रामीण एवं अशिक्षित जनता उसके बहकावे में आ जाती है। दातादीन अभिमान के साथ कहता है, "कोई हमारी तरह नेमी बन तो ले। कितनों को जनता हूँ, जो कभी संध्या वंदन नहीं करते। न उन्हें धर्म से मतलब, न करम से न कथा से मतलब, न पुरान से। वह भी अपने को ब्राह्मण कहते हैं। हमारे ऊपर क्या हँसेगा कोई, जिसने अपने जीवन में एक एकादशी भी नागा नहीं की। कभी बिना स्नान पूजन किये मुँह में पानी नहीं डाला। नेम का निभाना कठिन है।"10

साहित्यकार समाज की यथार्थ स्थिति का वर्णन करता है। इसलिए किसान साहित्य में हमेशा उपस्थित रहा है। किन्तु वैश्वीकरण, औद्योगीकरण, उदारीकरण, तथा निजीकरण की नीतियों ने किसान को सर्वाधिक नुकसान पहुँचाया है। पूँजीवाद और वैश्वीकरण के चलते समाज दो भागों में विभाजित हो गया है, जिसका सर्वाधिक प्रभाव समाज के निम्न वर्ग पर पड़ा है। किसान अपनी उदारता और कर्ज़े की अधिकता के कारण अभिशप्त जीवन-जीने को विवश है। जन-जन की शोषण मुक्ति की समस्या प्रेमचंद को गोदान में विकल करती रही है। गोदान की संरचना से प्रतीत होता है कि प्रेमचंद आर्थिक शोषण के चित्रण को मात्र किसानों तक ही सीमित नहीं करना चाहते थे अपितु उनका सन्दर्भ अधिक व्यापक एवं विस्तृत है। गोदान की कथा शोषण मुक्ति की विराट समस्या को इंगित करती है। प्रेमचंद की ही भाँति मुक्तिबोध के भी रचनाकर्म की एक मात्र समस्या यही है- "कि मैं अपनी अधूरी दीर्घ कविता में/सभी प्रश्नोत्तरी की तुंग प्रतिमाएँ/गिराकर तोड़ देता हूँ हथौड़े से /कि वे सब प्रश्न कृत्रिम और/उत्तर और भी छलमय/समस्या एक..../मेरे सभ्य नगरों और ग्रामों में /सभी मानव/सुखी, सुन्दर, व शोषणमुक्त /कब होंगे?"11

गोदान के माध्यम से प्रेमचंद किसानी एवं महाजनी सभ्यता के यथार्थ स्वरूप से जनमानस को परिचित करना चाहते थे। इसके निमित्त वे व्यापक फलक रचते हैं। गोदान में किसान व मजदूर समाज का यथार्थ व्यक्त हुआ है उससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि प्रेमचंद को किसानों के वर्गीय चरित्र की गहरी तथा विस्तृत समझ थी। प्रेमचंद ने जिस किसान की रचना की वह विद्रोही प्रकृति का नहीं है। वह ऐसा किसान है जिसके पास हल, बैल और थोड़ी ज़मीन है। उनकी इसी विशेषता का उल्लेख करते हुए प्रोफ़ेसर शैलेश जैदी कहते हैं- "देश में व्याप्त किसानों की दयनीय स्थिति, आर्थिक विषमता, टूटते हुए परिवार, फैलती हुयी महाजनी सभ्यता, सामंतवाद के भव्य खंडहर, देशभक्ति के विभिन्न मुखौटे, निर्बलों के प्रति अमानुषिकता, मिल-मालिकों द्वारा ग़रीबों के रक्त का शोषण, मज़दूरों के वेतन में कटौती, हड़तालियों पर पड़ने वाले पुलिस के डंडे, भूख और नंगे मज़दूरों का रेला, बिरादरी का विष, पंचायत की पक्षपातमय शोषक मनोवृति, मनुष्य और मनुष्य के बीच फूट, भद्रता की ओट में झाँकती हुई चरित्रहीनता, धार्मिक पाखंड, जातिगत-भेदभाव..., सारांश यह है कि इस प्रकार के अनेक विषय हैं, जिन्हें गोदान के कथा संगठन में बड़ी ही कलात्मकता के साथ पिरो दिया गया है।"12

गोदान का होरी सामंती मान्यता व विचारधारा को कभी नियति के नाम पर, कभी ईश्वरीय इच्छा मानकर, कभी पुनर्जन्म के नाम पर, कभी समाज व्यवस्था के नाम पर, कभी ख़ुद की असमर्थता, तो कभी मरजाद का हवाला देकर स्वीकार करता है। ऐसा भी देखा गया है कि शोषित व्यक्ति कभी-कभी शोषण तंत्र को नियम संगत मानता है। रायसाहब का संबंध सत्ता-वर्ग से है। जिसके कारण होरी पर वे अपने विचारों को आरोपित करते हैं। दार्शनिक विचारों के ज्ञान से लबरेज़ मिस्टर मेहता सिद्धांत की आड़ में रायसाहब के इस आत्मभर्त्सनावादी ढ़ोग की आलोचना करते हैं। वे कथनी और करनी के मतभेद को उद्घाटित करते हैं। "आप कृषकों के शुभेच्छु हैं, उन्हें तरह-तरह की रियायतें देना चाहते हैं, आप ज़मींदारों के अधिकार, छीन लेना चाहते हैं, बल्कि आप उन्हें समाज का श्राप कहते हैं, फिर भी आप ज़मींदार हैं, वेसे ही ज़मींदार जैसे हज़ारों और ज़मींदार हैं। अगर आप की धारणा है कि पट्टे लिख दें, बेगार बंद कर दें, इजाफा लगन को तिलांजलि दे दें, चरावर ज़मीन छोड़ दें। मुझे उन लोंगों से जरा भी हमदर्दी नहीं है जो बातें करते हैं कम्युनिस्टों की सी, मगर जीवन है रईसों का-सा, उतना ही विलासमय उतना ही स्वार्थ से भरा हुआ।"13

गोदान में ग्रामीण जीवन, समाज एवं संस्कृति का बड़ा व्यापक एवं वास्तविक चित्रण हुआ है। कृषक जीवन के व्यवहार-विचार, रूप-रंग, विश्वास, संबंध, रहन-सहन, रूढ़ियाँ, परम्परा, तनाव और टूटन आदि सभी गुण उनके उपन्यासों में विद्यमान हैं। किसान शोषण तंत्र के कुचक्र से भी वे परिचित थे। सरकारी अफ़सर, ज़मींदार और उनके कारिंदे सब मिलकर किसान को किस तरह शोषण का शिकार बनाते हैं, यह उपन्यास के आख़िरी अंश से जाना जा सकता है, जब होरी के भावी दामाद रामसेवक ने स्पष्ट कर दिया- "यहाँ तो जो किसान है, वह सबका नरम चारा है। पटवारी को नजराना और दस्तूरी न दे, तो गाँव में रहना मुश्किल। ज़मींदार के चपरासी और कारिंदों का पेट न भरे तो निबाह न हो। थानेदार और कानिसिटिबिल तो जैसे उसके दामाद हैं...कभी कानूनगो आते हैं, कभी तहसीलदार, कभी डिपटी, कभी जंट, कभी कलक्टर, कभी कमिसनर; किसान को उनके सामने हाथ बांधे हाजिर रहना चाहिए।"14

प्रेमचंद रचनात्मकता के लिए प्रेरणा को आवश्यक मानते हैं। और यह प्रेरणा आस-पास, तथा सामाजिक जीवन से आती है। उनका संवेदनशील मन सामाजिक जीवन की विषमताओं, कुरीतिओं, विडम्बनाओं आदि से विचलित होता है। वे समाज की हर बुराई को नैतिकता और आधुनिकता की दृष्टि से देखते हैं, तथा परम्परागत नैतिक एवं मानवीय जीवन मूल्यों की रक्षा के साथ वे युग की नई कसौटियों का अन्वेषण करते हैं। गोदान भारतीय ग्रामीण परिवेश और कृषक जीवन का महाकाव्य है। किसान के जीवन-संघर्ष, उनके दुःख-सुख व नाना स्थितिओं का बखान व्यक्त हुआ है। एक किसान के साथ शासन सत्ता व सामंत वर्ग का बर्ताव किस तरीक़े से किया जा रहा है उसके कलुषित चेहरे का उद्घाटन हुआ है। किसान किस तरह मज़दूर वर्ग में शामिल होता जा रहा है उसका रेखांकन बड़ी ही सजगता के साथ हुआ है। शोषण के समस्त तंत्रों के नक़ाब को हटाकर उनके वास्तविक चेहरे को दिखाने का प्रयास किया गया है। किसान जो समस्त की चिंता करता है उसके जीवन की चिंता किसी को नहीं है। वह जो अन्न उपजाता है वही आज भुखमरी का शिकार सर्वाधिक है। कैसी विडंबनात्मक स्थिति है। उपन्यास में कृषि संस्कृति के अस्तित्व पर ही संकट है और इससे उसमें महाकाव्यात्मक चेतना की अनुभूति होती है। प्रेमचंद के समूचे साहित्य में अन्याय के ख़िलाफ़ पुरज़ोर वकालत मौजूद है। जिस विशेषता के कारण वे सदैव प्रासंगिक बने रहेंगे।

धीरेन्द्र सिंह
(शोधार्थी )
हिंदी विभाग
डॉ. हरी सिंह गौर विश्वविद्यालय सागर, म.प्र.
पिन.470003
मो.9005939570
ईमेल.dhirendra.sam_2012@gmail.com

सन्दर्भ ग्रन्थ-

1.प्रेमचंद-गोदान, सरस्वती प्रेस, दिल्ली, पेपरबैक संस्करण, पृष्ठ संख्या, 18
2. https://hi.wikipedia.org/wiki
3. http://www.bbc.com/hindi/india/2010/12/101228_farm_sucide_pn.shtml
4. डॉ. सत्यप्रकाश मिश्र- (सं.) गोदान का महत्त्व, लोकभारती प्रकाशन, इलाहबाद, पृष्ठ संख्या, 174
5. वही, पृष्ठ संख्या, 289
6. राजेश जोशी- एक कवि की नोटबुक, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या, 174
7. प्रेमचंद-गोदान, सरस्वती प्रेस, दिल्ली, पेपरबैक संस्करण, पृष्ठ संख्या, 22
8. जनसत्ता-रविवार 13 दिसंबर 2015, प्रकाशन दिल्ली, पृष्ठ संख्या,
9. डॉ. रामविलास शर्मा-प्रेमचंद और उनका युग, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ संख्या, 97-98
10. कमल किशोर गोयनका- प्रेमचंद, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या, 62-63
11. मुक्तिबोध- चाँद का मुँह टेढ़ा है, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या 154-155
12. कृष्णमुरारी मिश्र - आद्यबिम्ब और गोदान, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या, 89
13. सदानन्द साही-(सं.) साखी, प्रेमचंद साहित्य संसथान का त्रैमासिक, अंक 18-19, अक्तूबर 2008 मार्च 09
14. डॉ. रामविलास शर्मा-प्रेमचंद और उनका युग, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ संख्या, 230


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