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ISSN 2292-9754

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01.23.2019


रणेंद्र की कहानियों में दर्ज आदिवासियों का दर्द

 अपने को सभ्य कहने वाले ग़ैर-आदिवासी लोगों के बीच आदिवासी शब्द को लेकर एक ख़ास उत्सुकता हमेशा बनी रहती है। मसलन आदिवासी कैसे होते हैं? क्या खाते हैं? कैसे रहते हैं? क्या वो काले होते हैं? इतना ही नहीं इस सभ्य समाज के ज़्यादातर लोगों का यह भी मानना है कि चूँकि आदिवासी ज़्यादातर जंगल में रहते हैं, इसलिए ये लोग नक्सली होते हैं। यह बहुत पिछड़े होते हैं। इनको पहनने और रहने की तमीज़ नहीं होती। ये लोग अशिक्षित होते हैं। ऐसे ही कई सवाल, मनोवृत्तियाँ और जिज्ञासायें लोगों के जेहन में तैरती रहती हैं। सभ्य समाज के लोगों को यह नहीं पता कि आदिवासी की समाज की नज़र में यही सभ्य लोग ‘दिकू’ कहे जाते हैं। दिकू यानी की आदिवासियों का शोषक समाज।

हरिराम राम मीणा का कहना है- “जिस तरह आज भारत के ग़ैर-आदिवासी अपने को आदिवासी समाजों से सभ्य और आगे बढ़ा हुआ मानते हैं, ऐसा ही पश्चिम कभी सारे ग़ैर-पश्चिमी समाजों के बारे में मानता था।”1 फिर पश्चिम के देशों ने सभ्य और आधुनिक बनाने के नाम पर पूर्वी देशों को किस तरह गुलाम बना कर रखा यह इतिहास के पन्नों में दर्ज़ है।

आदिवासी समाज को परिभाषित करते हुए रमणिका गुप्ता लिखती हैं कि “आदिवासी सदियों से ‘बराबरी, भाईचारा और आज़ादी’ को अपने जीवन में जीता आया है। यह सूत्र ही उसकी जीवनशैली का एक आवश्यक हिस्सा है वह सामूहिकता में जीता है, उसकी अपनी एक संस्कृति है- भाषाएँ हैं। वह प्राकृतिक संसाधनों- जल- जंगलों का मालिक रहा है जो आज उससे छीने जा रहे हैं। प्रकृति ही उसके जीवन यापन का साधन रही है।”2

ध्यातव्य हो कि आदिवासी समाज के लोगों और उन इलाक़ों से ही देश को सर्वाधिक मूल्यवान वस्तुएँ प्राप्त होती हैं। काष्ठ वस्तुओं के निर्माण में भी आदिवासी समाज का अग्रणी योगदान है। फिर भी तमाम आंकड़ों और साहित्य से आदिवासी लोगों और इलाक़ोम की दशा चिंताजनक दिखती है। केदार प्रसाद मीणा द्वारा एक संपादित पुस्तक है ‘आदिवासी कहानियाँ’। इस संग्रह की भूमिका में उल्लिखित है कि “इस समय देश का सबसे अधिक संघर्षरत तबक़ा यहाँ का आदिवासी है। देश की सरकारों और मुख्यधारा के समाज का उनके प्रति जो रवैया देखने को मिल रहा है, सचमुच अमानवीय और भयानक ढंग का क्रूर उदाहरण है।”3

इस चिंता और पीड़ा को केंद्र में रखकर अनेक रचनाकारों ने अपनी लेखकीय प्रतिबद्धता ज़ाहिर की है। जिसमें रणेंद्र का नाम उल्लेखनीय है। यह वही रणेंद्र हैं, जिनका उपन्यास ‘ग्लोबल गाँव के देवता’ और ‘गायब होता देश’ साहित्य जगत में ख़ूब सराहा गया। वो इसलिए कि रणेंद्र आदिवासी समुदाय के संकट, संघर्ष और सवालों को निर्भीकता से अभिव्यक्त करते हैं। इनकी अभिव्यक्ति का माध्यम न केवल उपन्यास, बल्कि कवितायें और कहानियाँ भी हैं।

इस लिहाज़ से इनका अभी तक का एकमात्र कहानी संग्रह ‘रात बाकी एवं अन्य कहानियाँ’ पठनीयता, संप्रेषणीयता और सार्थकता की तीनों दृष्टि से बेजोड़ है। इस संग्रह में कुल सात लम्बी कहानियाँ संग्रहित हैं। जिनमें ‘रात बाकी’, ‘वह बस धूल थी’, ‘रफ़ीक भाई को समझाइये’, ‘चंपा गाछ, ’अजगर और तालियाँ’, ‘बारिश में भींगती गौरैया’, ‘जल रहे हैं हरसिंगार’ और ‘ठीक बा नू, सायराबानू’ नामक शीर्षक कहानियाँ हैं। उल्लेखनीय है कि इस संग्रह की लगभग सभी कहानियाँ ‘हंस’, ‘कथादेश’, ‘बयां’, ‘उत्तरा’, ‘नया ज्ञानोदय’, एवं ‘पल- प्रतिपल’ जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। इसके अलावा इनकी कहानियाँ विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में लगातार छप रही हैं।

ख़ैर इनकी कहानियों को पढ़ते हुए लगता है कि कथा लिखने की जो विशेष शैली रणेंद्र ने विकसित की है, वह अन्य से अलहदा है। अन्य से अलहदा इस अर्थ में कि इनकी कई कहानियाँ टुकड़ों में बँटी हुई हैं। जो किसी ख़ास अर्थवान पंक्ति के अंतर्गत अपने मुक़ाम तक पहुँचती हैं। जैसे ‘रात बाकी’ कहानी की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार है - “नीली झील सी आँखें और जापानी द्वीप”, “सिर्फ एक उन्माद था जीवन अनुराग”, “गिरता नक्षत्र कालिमा की धार सा”। या ‘चंपा गाछ, अजगर और तालियाँ’ कहानी की पंक्ति- “राजधानी : रंगरंग के रिमझिम”, “कृष्णमृगी की आखिरी उड़ान” पंक्तियों से कहानी आगे बढ़ाती हैं।

इनकी कहानियों की विषयवस्तु, भाषा और शैली, एक शोधार्थी के लिए चिंतन का विषय है। वहीं एक सामान्य पाठक के लिए संवेदना के स्तर पर झकझोरने वाली भी है। इन कहानियों के केंद्र में आदिवासी लोग हैं। उनके दुःख और पीड़ा के साथ उनकी जीवटता भी है। उनके हक़-हुकुम की लड़ाइयों के बीच प्रेम के कोमल अतरंग क्षण भी हैं। आदिवासी युवतियों के साहस की मिसाल है। जो जंगल में रहकर पढ़ना और न्याय लेना दोनों जानती हैं। साथ ही ग़लत का प्रतिकार करने की माद्दा भी रखती हैं। वहीं दूसरी ओर आदिवासी लोगों को और भी हाशिये भी धकेलने हेतु ब्यूरोक्रेसी, पोलिटिशियन, बिल्डर्स और कार्पोरेट्स का गहरा कुचक्र है। पुलिस अधिकारियों की अमानवीय अत्याचार की दास्तान है। कुछ ख़ास लोगों को लाभ पहुँचाने के लिये नियमों की अवहेलना है। विस्थापन की पीड़ा है। समाज के वंचित तबक़े से ही निकले प्रशासक के द्वारा वंचितों को ही लूटने का क़िस्सा है। जो यह दिखाता है कि पूँजी और रसूख़ की हवस व्यक्ति को कितना भी नीचे गिरा सकती है। चाहे वह जिस भी समुदाय या वर्ग का व्यक्ति हो। चाहे वह दक्षिण या वाम के विचारों का पोषक ही क्यों न हो। भ्रष्ट आचार-विचार और सामाजिक व्यवस्था इस तरह का जाल बुनती है अंततः उसमे फँसना ही है।

इस संग्रह की पहली कहानी ‘रात बाक़ी’ (कथादेश : अखिल भारतीय हिंदी कहानी प्रतियोगिता-2005) प्रथम स्थान प्राप्त कर चुकी है। कहानी के पन्नों से- "...अपनी मृत्यु के पूर्व...अपनी ही झोपड़ी की आग में झुलसती असह्य पीड़ा...करूँ चीत्कारों के बीच...चाला पच्चो-पुष्पा की आजी-माँ ने चीखकर शाप दिया था-‘जो तोहनी के ई बाँध कहियो पूरा ना होई’...आज...वर्षों बीत जाने के बाद भी...कैमूर अंचल का यह दुर्गावती बाँध अधूरा पड़ा है...एकदम अधूरा...अब यह दुर्योग है...या शाप का असर...कौन जाने..."4

इस कहानी में आदिवासी इलाक़ों में तैनात प्रशासकों का काइयाँपन, और उनकी पत्नियों एवं उनके स्वयं के आधुनिक जीवन शैली के रोचक क़िस्से हैं। मुख्य धारा के राजनीतिज्ञों की जाति और वर्ग आधारित बेग़ैरत और असंवेदनशील निर्णय हैं। मजदूर वर्ग के जनगीत हैं। हिंसा की दिल दहलाने वाली घटनाएँ हैं। इन सबके बीच यह कहानी हाशिये के उन लोगों को प्रेरणा देती है, जो संघर्ष के बूते अपनी वजूद की ज़मीन तलाश रहे हैं।

हंस पत्रिका के मार्च, 2017 अंक ‘रहस्य-अपराध-वार्ता’ विशेषांक में रणेंद्र की एक कहानी छपी थी- ‘भूत बेचवा’। वैसे तो यह कहानी रहस्य से भरी है। लेकिन इस रहस्य में शामिल हैं- आदिवासी। जिनके भोलेपन का फ़ायदा उठा कर टी.पी त्रिपाठी और उनका ‘त्रिपाठी एंड संस’ दिन दूनी रात चौगुनी तरक्क़ी करता है। नक्सल के नाम पर पुलिस महकमा से सांठ-गांठ करके फ़र्जी इनकाउंटर और हत्या करवाना। यह हत्या शुरू में तो किसी ज़मींदार के खेत की रक्षा हेतु भूत ख़रीदने से होती है। जिसके फलस्वरूप मोटा पैसा मिलता था। जिसमें शामिल होता है पुलिस महकमा भी। आगे चलकर इसे और भी फ़ायदे वाला धंधा समझकर खूब खेल होता है। इस भूत के खेल में बलि चढ़ते थे, निरीह आदिवासी। कहानी का एक पात्र पांचू जो टी.पी त्रिपाठी का सहयोगी था, कहता है कि “पुलिस महकमा का इतना तो फ़ायदा तो था ही कि किसी कमिय जाइत आदमी के सामने गिड़गिड़ाने या रुपया फेंकने की ज़रूरत नहीं। ख़ाली नज़र दौड़ते रहिये। सबसे कमज़ोर, ग़रीब कमियाँ परिवार पर नज़र रखिये। ज़रूरत के मुताबिक़ उसके घर से जवान लड़के को उठा लीजिये। कभी डकैत- कभी नक्सली के नाम पर ठोंक दीजिये। उसके बाद मेरे ज़िम्मे छोड़ दीजिये। मजाल की भूत इधर-उधर हो जाए।”5

पता नहीं क्यों आदिवासी, ग़रीब और मजदूर तबक़ा ही पुलिस-प्रशासन के शोषण का शिकार होते हैं? इस व्यथा को रणेंद्र ‘भूत बेचवा’ कहानी में ही दर्ज़ किये हैं। वो कहते हैं कि शहर के चौराहों पर गोरे-चिट्टे दिखने वाले, महँगी गाड़ियों से चलने वाले, महँगा कपड़ा पहनने वालों को पुलिस शायद ही कभी रोकती हो लेकिन काले दिखने वाले, मैला-कुचला पहने, गमछा लगाये कोई आदिवासी, मजदूर, ग़रीब दिख जाए तो उसकी गाड़ी और काग़ज़ में ढेर सारी कमियाँ दिखा कर बिना कुछ लिए छोड़ते नहीं। दरअसल इस कहानी में भी यही होता है जब आदिवासी युवक अनिल दा अपने साथी की पत्नी के इलाज हेतु कुछ पैसे लिए शहर में प्रवेश करते हैं। कहानी के हवाले से कि “आदतन आदिवासी अनिल अरुणाभ पन्ना और बहादुर बाखला की बाइक रोक ली गयी। एक सिपाही से अनिल दा उलझ ही रहा था कि दूसरे सिपाही ने कागज पत्तर तलाशने के बहाने डिक्की खोली तो रुपये की थैली पर नज़र पड़ गयी। सिपाही जी की बाँछे खिल गईं। साले। आदिवासी, कोल-बकलोल के पास एतना रुपया कहाँ से बे? ज़रूर नक्सली सभन का पैसा है। तू लोग कुरियर हो। कहीं पहुँचाने जा रहे हो। बहादुर दा नर्सिंग होम की दवा पुर्जा दिखाते रह गया। गिड़गिड़ाकर, हाथ जोड़कर आॉपरेशन की हड़बड़ी बताई। लेकिन कोई मानने को तैयार नहीं। बहादुर दा को लगा कि अब उसकी गोमकाईन और बच्चा बचेंगे नहीं।”6

पता नहीं यह कैसा न्याय और कैसी व्यवस्था है जो कमज़ोर को, आदिवासी को, ग़रीब पर बेइंतहा ज़ुल्म ढा रही है।

इनकी एक कहानी है ‘वह बस धूल थी’ है। यह कहानी आदिवासी इलाक़ों के युवक-युवतियों के सामाजिक दायित्वों, उनके संघर्ष, साहस और सफलता की है। तो वहीं दूसरी ओर आदिवासियों के बीच से ही निकले एक युवक के भ्रष्टता की दास्तान है। यह वर्तमान समय का प्रभाव या अत्यधिक भोग-विलास की लिप्सा का परिणाम कह सकते हैं कि एक युवक जो प्रशासक नियुक्त होकर अपने ही इलाक़े में आकर ब्यूरोक्रेसी की मोटी मलाई खाता है। अपने ही भाई-बंधुओं पर अत्याचार ढाता है। वह युवक कोई और नहीं उसी हाशिये के समाज का प्रतिनिधित्व करता है जो आज भी अपने वजूद और समता के लिए संघर्षरत है।

यह कहानी यह बताती है कि शिक्षा लेना और नौकरी पाना अलग बात है, और मानवीय मूल्यों की रक्षा करना अलग बात। वहीं एक ग़रीब, लाचार वो भी एक स्त्री के लिए न्याय पाना कितना कठिन है। यह इस कहानी की नायिका ‘सोमा कुजूर’ के माध्यम से जाना जा सकता है। कहानी के अंतिम हिस्से में दर्ज़ है कि- “सोमा कुजूर...एक आदिवासी स्त्री...एक संस्कृति...एक आदिम सभ्यता...ख़त्म हो गई...जैसे...रेड इंडियंस...जैसे डोडो पछी...जैसे एक नदी।”7

आज जब कुछ ख़ास धनाढ्य लोग क्वालिटी लाइफ़ और रंगीन जीवन जी रहे हैं। जब शिक्षा, एनजीओ, पुलिस-प्रशासन, सरकारें, कानून और एक्टिविस्ट निज स्वार्थ में पथ-भ्रष्ट हुए जा रहे हैं। क्रांति एक कमरे के शोर–शराबे और एक ख़ास लुक में ही दब जा रही है। आज जिस तरह फ़र्जी एनकाउन्टर करने और फ़र्जी नक्सली बनाने को लेकर कानूनों का दुरुपयोग हो रहा है। आदिवासी इलाक़ों में जिस तरह से स्त्रियों के शरीर को कुछ पुलिसिया समूह नरभक्षी भेड़ियों की भाँति नोचते, खसोटते हैं। इन बिंदुओं को रणेंद्र अपनी कहानियों में बख़ूबी में उठाते हैं। रणेंद्र की एक कहानी है ‘चम्पा गाछ, अजगर और तालियाँ’। यह कहानी इन बिंदुओं को पर सिलसिलेवार चर्चा करती है। आदिवासी सन्दर्भ में रणेंद्र इस कहानी में लिखते हैं “बहरहाल, बात सेमिनारों-गोष्ठियों की चल रही थी, उनके विषय बहुत गंभीर हुआ करते, जैसे-विस्थापन, पलायन, जल, जंगल, ज़मीन, आदि-आदि। आयोजक-प्रायोजक थोड़ा ज़्यादा गंभीर रहते, यह कहना मुश्किल।”8

कुछ आदिवासी इलाक़ों के लोगों के आजीविका का एक बड़ा माध्यम है तेंदू पत्ता इकट्ठा करना और बीड़ी बनाना। रणेंद्र उन बीड़ी मजदूरों के अनंत दुःख और बीमारियों के बीच, उन आदिवासियों के हृदय में पलते प्रेम के कोमल भावों को भी अभिव्यंजित करते हैं। “कहते हैं कि कस्बे का जय किसान कोल्ड स्टोरेज सड़े-गले, कच्चे-पक्के आलुओं से भरा रहता और जय जवान सिनेमा हॉल इन हड़ियल बीड़ी वर्करों से। लेकिन बैजंतीमाला, मधुबाला, शर्मिला टैगोर, वहीदा रहमान की अदाओं पर जब हॉल में सीटियाँ बजतीं, सिसकारी भरी जाती, सीट उछाले जाते तो टी.बी. बैक्टीरिया भी घबड़ा जाता। एक पल के लिए ही सही, हार मान लेता। जिन्दगी लम्हों में जीत महसूसती।”9

समग्रतः यह कि इनकी कहानियाँ उन तत्वों का विश्लेषण करती हैं, जो किसी व्यक्ति को लाचार और बेबस करने में मददगार होती है। इनकी कहानियों से गुज़रते हुए यह लगता है कि विषम हालातों से भयभीत हुए बिना आज आदिवासी समाज अपने हक़ के लिए लड़ रहा है। रणेंद्र की कहानियाँ व्यवस्थाजन्य ख़ामियों और षड़यंत्रों को उजागर करती हैं। शोषण के औज़ारों और काले कारनामों की चिट्ठा खोलती हैं। विकास के पीछे दबे पाँव खड़े विनाश की सच्चाई को देखती हैं। यह भी कि आज आदिवासी समाज अपने न्याय के लिए चाहे जितना संघर्ष कर ले, लेकिन उजाला इनके हिस्से में मुनासिब नहीं। क्योंकि समकालीन दौर में राजनीति की बागडोर उन हाथों में है जो हर क़ीमत पर बस लाभ चाहते हैं। पुलिस और न्याय व्यवस्था उन हाथों से संचालित हो रही है जो अथाह पूँजी के मालिक हैं। रणेंद्र की कहानियाँ जहाँ एक ओर इस दौर में जी रहे आदिवासियों के संकट और समस्याओं को दर्ज करती हैं वहीं दूसरी ओर तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उनके संघर्ष और साहस को भी प्रस्तुत करती हैं।

धीरेन्द्र प्रताप सिंह
शोध-छात्र (हिंदी), इलाहाबाद विश्वविद्यालय
पता- कक्ष सं. 28, अमरनाथ झा छात्रावास. 211002
संपर्क सूत्र : 09415772386
ई.मेल- dhirendrasingh250@gmail.com

संदर्भ

1- हरिराम मीणा, आदिवासी मिथक, आदिवासी दुनिया, नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, सं. – 2013, पृ. सं.-32
2- रमणिका गुप्ता, आदिवासी समाज और साहित्य में नाभि-नाल का रिश्ता, आदिवासी समाज और साहित्य (सं. रमणिका गुप्ता), सामयिक प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली, सं-2016, पृ. सं.-9-10
3- केदार प्रसाद मीणा, आदिवासी समाज,साहित्य-विमर्श और कुछ कहानियाँ, आदिवासी कहानियाँ, अलख प्रकाशन, जयपुर, सं. 2013, पृ. सं.-6
4- रणेंद्र, रात बाक़ी, रात बाक़ी, रात बाक़ी एवं अन्य कहानियाँ, राजकमल प्रकाशन, पटना. सं. 2010,
पृ.सं.-7
5- रणेंद्र, भूत बेचवा, हंस(मासिक), मार्च 2017, पृ. सं.-88
6- वही, पृ. सं.-83
7- रणेंद्र, वह बस धूल थी, रात बाक़ी एवं अन्य कहानियाँ, राजकमल प्रकाशन, पटना. सं. 2010, पृ. सं.-46
8- रणेंद्र, चम्पा, गाछ, अजगर और तालियाँ, रात बाक़ी एवं अन्य कहानियाँ, राजकमल प्रकाशन, पटना. सं. 2010, पृ. सं.-69
9- रणेंद्र, बारिश में भींगती गौरैया, रात बाक़ी एवं अन्य कहानियाँ, राजकमल प्रकाशन, पटना. सं. 2010,
पृ. सं.-95


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