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ISSN 2292-9754

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01.23.2019


मानवीय सृजन में ‘क्षण‘ की भूमिका

देश और दुनिया में जितने भी बड़े एवं महान कार्य आविष्कार, रचनाएँ एवं उपलब्धियाँ प्राप्त हुई हैं, सब किसी न किसी क्षण विशेष में उत्पन्न हुई वैचारिक शक्तियों को क्रिया रूप में परिणति करने, निर्णय लेने एवं एक नई दिशा देने से ही संभव हुई है। इस सृष्टि के आदि से लेकर आज तक की दिन प्रतिदिन सृजनशील होने की प्रक्रिया या किसी भी सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, वैज्ञानिक, धार्मिक परिवर्तनों के पीछे की शक्ति ‘क्षण’ में ही निहित रही है। यद्यपि कि इन सबकी ज़मीन देश काल परिस्थितियों के लिहाज़ से भिन्न-भिन्न रही है और जब भी उस ज़मीन को तलाशा या कुरेदा गया है तो इसने अतीत और भविष्य को देखने की एक नई दृष्टि प्रदान की।

यदि यह कहा जाए कि क्षण विशेष ही मानव प्रगति एवं सृजन का स्त्रोत है तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं लगती। क्योंकि किसी भी सार्थक एवं सकारात्मक कार्यों एवं परिवर्तनों के पीछे इसी शब्द की प्रेरणा होती है। वहीं दूसरी ओर जब भी इस क्षण का दुरुपयोग हुआ है या इसकी नकारात्मकता समाज पर हावी हुई है तो इसी क्षण ने सृष्टि का विनाश भी किया है। तभी तो यह भी कहा जाता है कि ‘लम्हों ने ख़ता की है, सदियों ने सज़ा पाई है’।

मानव मन और मस्तिष्क सदैव से जिज्ञासु प्रवृत्ति का रहा है। जिसके फलस्वरूप वह प्रत्येक कार्य और कारण में सम्बन्ध स्थापित करता है। इसी सम्बन्ध स्थापना के दौरान वह किसी कार्य को क्रियान्वित करता है या उस पर गम्भीर चिंतन आरम्भ करता है। हो सकता है इसके पीछे का उसका उद्देश्य नितांत निजी हो या सार्वजनिक। उदाहरण स्वरूप हम महात्मा बुद्ध के उस क्षण विशेष के चिंतन को ले सकते हैं, जिसके कारण वह आधी रात को अपना भव्य विलासिता भरा जीवन छोड़कर मानव समाज के कष्टों के निवारण हेतु जंगल की राह पकड़ लेते हैं। इस कड़ी में हम न्यूटन, एडीसन, जगदीश चंद्र बसु, सम्राट अशोक, नेल्सन मंडेला, कार्ल मार्क्स, महात्मा गाँधी, भगत सिंह, वल्लभ भाई पटेल जैसे अनेक लोगों का नाम ले सकते हैं। जिन्होंने इस जीव जगत में घटित होने वाली विभिन्न घटनाओं एवं समस्याओं पर सूक्ष्मता से विचार किया, कार्य कारण में सम्बन्ध स्थापित किया तथा देश और दुनिया को एक विशिष्ट महत्व प्रदान करते हुए एक गति दी।

अमूमन जब भी किसी कार्य को लेकर यह प्रश्न पैदा होता है कि इस कार्य का उचित समय क्या हो सकता है? इसे कब आरम्भ करना चाहिए तो इसे लेकर देश ही नहीं वरन् दुनिया के सभी बड़े विचारकों एवं विद्वानों का मानना है कि किसी भी सार्थक उपयोगी एवं मानवीय गुणों से युक्त कार्य को आरम्भ करने का क्षण आज ही होना चाहिए ना की कल। किसी ने ठीक ही लिखा है कि- ‘दीर्घसूत्री विनश्यति’ अर्थात् काम को बहुत समय तक खींचने वाले का नाश हो जाता है। ‘रोजर बार्ब्सन’ का कहना है कि- ‘वह जो अपना भविष्य आनंदमय बनाना चाहता है उसे अपना वर्तमान बर्बाद नहीं करना चाहिए’।

वैसे भी जीवन का हर पल, हर क्षण बेहद महत्वपूर्ण एवं मूल्यवान है। जब जीवन का हर क्षण बहुमूल्य है और क्षण-क्षण से ही जीवन बनता है तब वर्तमान को छोड़कर भविष्य में उलझे रहना एक दिवास्वप्न के समान है और ऐसे ही अतीत में उलझे रहना एक विडम्बना। जो इस वर्तमान को पहचान कर उसका सदुपयोग करते हैं। उसके प्रति सजग रहते हैं। ऐसे ही लोगों का यूँ कहें कि इसको समझने वाले प्रत्येक व्यक्ति, समाज और राष्ट्र का जीवन एवं ज़मीन दोनों ही सफल-सम्पन्न एवं उर्वर होता है। हालाँकि समय चक्र में क्षण अति सूक्ष्म है, किंतु इसमें असीमित संभावनाएँ निहित हैं। इन्हीं संभावनाओं का सुनियोजित एवं सार्थक समुचित उपयोग व्यक्ति से होते हुए एक समूह या यूँ कहें कि राष्ट्र के स्तर पर सकारात्मक बदलाव एवं प्रसन्नता लाता है। इतिहास गवाह है कि जिसने भी अतीत से सबक़ लेते हुए अपने वर्तमान का उपयोग सही दिशा में किया है वह व्यक्ति, समाज और राष्ट्र प्रगति के सोपानों पर आगे बढ़ता ही गया है। यदि हमारा अतीत अंधकारमय है, असफलताओं और निराशा से भरा हुआ है तो इसका अर्थ है कि हमने अपने वर्तमान क्षण का उपयोग शायद सही रूप में नहीं किया था। यदि वर्तमान का क्षण हाथ से निकल जाता है तो वह अतीत का पल बन जाता है और इसके आगे का जो क्षण है वह हमारी पहुँच के बाहर। अर्थात यह कि आज का वर्तमान क्षण ही हमारा है। जिसका हम जिस रूप में चाहें उस रूप में उपयोग कर सकते हैं। चाहें तो एक अनुकरणीय अतीत और स्वर्णिम भविष्य या इसका दुरुपयोग कर एक दाग़नुमा, बदनुमा अतीत और अंधकारमय भविष्य।

यद्यपि की समय चक्र का प्रत्येक क्षण एक जैसा नहीं होता। कोई क्षण कला या सृजन का या आनंद का क्षण होता है और इसकी अनुभूति दे जाता है तो कोई अवसाद लेकर आता है। हमारा यह दायित्व बनता है कि यदि कोई कार्य या विचार जो सार्थक उपयोगी, सृजनशील हो और जो अभी हो सकता है तो उसे तत्क्षण प्रारम्भ कर देना चाहिए। क्योंकि यह कोई नहीं जानता कि अभी का सुख कब अगले पल में दुख में बदल जायेगा या अभी का दुख कब अगले पल में सुख में परिवर्तित हो जायेगा। यक़ीनन आरम्भ का क्षण तो अभी का है। अपनी पूरी शक्ति, चेतना और क्षमता इस क्षण पर केन्द्रित करने से ख़ुद ब ख़ुद सभी अज्ञात भय और चिंताएँ दूर हो जाती हैं।

वर्तमान क्षण केवल एक बहता हुआ क्षण नहीं है। वर्तमान क्षण में अनंत की गहराई है। पूरा अतीत और भविष्य वर्तमान में मौजूद है। अब इस विषय को थोड़ा और विस्तार से देखें तो यह बात निकलकर आती है कि आरम्भ का क्षण अभी है अर्थात वर्तमान। हो सकता है कि इसके पीछे अतीत या वर्तमान का कोई चित्र हो, प्रेरणा हो, चेतना हो या समस्याएँ या घटनाएँ हो या भविष्य की चिंता ही हो। यह व्यक्तिगत भी हो सकती है और सामूहिक भी। कुल मिलाकर अभी का क्षण ही सबसे ताक़तवर होता है। इतना ही नहीं इस क्षण को क्रिया रूप में परिणत करने की ज़मीन भी यहीं होती है। तो ऐसे में सहज ही मन में एक प्रश्न उठता है कि आरम्भ का क्षण यदि अभी है तो इसमें क्या आरम्भ किया जाय? आरम्भ करने का कार्य किस रूप में हो सकता है और उसकी प्रवृत्ति कैसी हो? आरम्भ करने का कार्य एक व्यक्ति, समाज या राष्ट्र कौन कर सकता है? इसकी ज़मन क्या हो सकती है? हमारे समाज द्वारा स्वीकृत आचरण, मूल्य नैतिकता या धार्मिक, राजनैतिक, आर्थिक, वैज्ञानिक सत्ता की शक्ति। इन सब प्रश्नों का उत्तर बहुत कुछ अतीत में हुई घटनाओं से मिलती है तो बहुत कुछ वर्तमान में विद्यमान समस्याओं एवं परिस्थितियों से।

इन प्रश्नों का उत्तर ढूँढ़ने से पूर्व देश और दुनिया में अतीत में घटित हुई विभिन्न घटनाओं और आज की विद्यमान समस्याओं, परिस्थितियों एवं उपलब्धियों के संदर्भ में देखने की ज़रूरत है और उस ज़मीन को भी कुरेदने, तलाशने और देखने की भी जिससे हम गुज़र रहे हैं या गुज़र चुके हैं। उदाहरण के लिए वह एक दौर था जब अफ़्रीका में रंगभेद को लेकर हिंसक भावना चरम पर थी। अत्याचार और अपमान अश्वेतों के साथ आम बात थी। अफ़्रीका के प्राकृतिक, सामाजिक एवं राजनैतिक ज़मीन पर गोरों का कब्ज़ा था। लेकिन वह एक क्षण ही था जब ट्रेन के डिब्बे से महात्मा गाँधी को गोरों द्वारा धक्के मारकर बाहर फेंक दिया गया और ठीक उसी समय ही गाँधी जी के मन में यह विचार आया कि क्यों न रंगभेद के ख़िलाफ़ लड़ाई छेड़ दी जाय। उन्होंने उसी क्षण यह ठान लिया और अफ़्रीका में एक परिवर्तन की लहर उठ गई। लोग वहीं थे, ज़मीन वहीं थी बस ज़रूरत थी तो अत्याचार और अपमान के विरुद्ध एक शुरूआत करने की। गौतम बुद्ध ने नगर भ्रमण के दौरान यह देखा कि किस तरह लोग इस समाज में दुखी हैं, लाचार हैं, कष्ट झेल रहे हैं। उन्होंने उसी क्षण में यह सोचा होगा कि कि इस संकट का निवारण होना चाहिए और मध्य रात्रि में ही घर छोड़कर ज्ञान प्राप्ति कि तलाश में निकल गए। आगे चलकर वह एक महान धर्म प्रचारक और मानवता के पुजारी बने, क्यों? क्योंकि उन्होंने यह महसूस किया कि आरम्भ का क्षण अभी है और इसकी ज़मीन भी यहीं है। जिसे बदलना होगा और वह आरम्भ होने के क्षण में ही निहित है। महान सम्राट अशोक के लिए वह एक क्षण ही था जब कलिंग युद्ध के भयंकर रक्तपात और कटते मानव मुंडों को देखकर वह व्यथित हो गये और शस्त्र त्याग दिया। आगे चलकर वह अपने बहुत सारे मानवीय मूल्यों एवं कार्यों से अशोक महान कहलाये। भूख से बिलबिलाते, मरते, कुपोषित होते लोगों को देखकर नार्मन इ बोरलाॅग के मन में एक क्षण विशेष में यह विचार आया होगा कि अब एक ऐसे आविष्कार, क्रांति की ज़रूरत है जो लोगों को भरपेट भोजन दे सके फलस्वरूप इस मानव समाज में हरित क्रांति का उपहार मिल सका। देश और दुनिया में घटित हुई इस प्रकार की अनेक आविष्कारों, विचारों, क्रांतियों, नव जागरण एवं कई महान ऐतिहासिक रचनाओं के मूल में आरम्भ करने के क्षण का ही महत्वपूर्ण स्थान रहा है। इन सबकी ज़मीन भी या यूँ कहें कि इनकी जड़ें भी इसी मानव समाज में विद्यमान रहीं हैं और हैं भी।

यदि इस विषय के लिहाज़ से हम आज के इस दौर की बात करें तो यह सच है कि हमारा यह मानव समाज, मानव सभ्यता के इतिहास में अब तक के सबसे सभ्य, शिक्षित एवं प्रगति के सोपानों पर उत्कृष्ट अवस्था से गुज़र रहा है। हम सब इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं जहाँ ज्ञान-विज्ञान सूचना, संचार क्रांति को लेकर नित-नए आविष्कार हो रहे हैं। समाज, विज्ञान, धर्म, दर्शन, साहित्य, संस्कृति, सभ्यता लगभग सभी पैमानों पर हम सब दिन प्रतिदिन सफलता की नई ऊँचाईयों को छू रहे हैं। लेकिन आज भी दुनिया का एक बड़ा हिस्सा भय, भूख, बेकारी, ग़रीबी, भ्रष्टाचार अत्याचार से जूझ रहा है। समाज के विभिन्न अंगों मसलन धर्म, संस्कृति, साहित्य, इतिहास दर्शन, राजनीति सबकी व्याख्यायें अलग-अलग अर्थों एवं रूपों में हो रही है। व्यक्ति के ऊपर विचारधाराएँ हावी हो रही है। क्या उचित है? क्या अनुचित? क्या आरम्भ किया जाय, क्या नहीं? इसकी कहीं कोई स्पष्ट परिभाषा और पहचान नहीं दिख रही है। कहीं धर्म के नाम पर आतंकवाद और जेहाद को आरम्भ करने की वकालत है तो कहीं जल, जंगल, ज़मीन लूटने की कवायद। शोषण का स्वरूप अपने बदले हुए रूप में बदस्तूर जारी है। राजनीति, धर्म और शिक्षा इनकी ज़मीन में धँसी है, भ्रष्टाचार, परिवारवाद, सत्ता की हनक, विलासिता भरा जीवन का ढोंग, नैतिकता का पाखंड और अपनी अस्मिता को बचाये रखने की ललक। यही वो कारण है जिससे मानव समाज का एक बड़ा हिस्सा संकट में फँसता दिख रहा है। आज भी वह कई जगहों पर भयंकर रूप से पीड़ित और शोषित है।

एक सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आज दुनिया का लगभग हिस्सा उपनिवेशवादी गुलामी से मुक्त हो चुका है। दुनिया में लगभग हर एक मुल्क आज़ाद है। लेकिन यहाँ पर एक क्षण ठहरने और आत्मवलोकन करने की आवश्यकता है कि क्या हम वास्तव में आज़ाद हैं? क्या शारीरिक गुलामी ही दासता है या दिमागी गुलामी भी कोई चीज़ होती है? इसकी भी पड़ताल करनी होगी और ज़मीनी हक़ीक़त को देखना होगा कि लोकतंत्र क्या आज लूट तंत्र में नहीं बदल रहा? हाशिये के समाज मसलन (दलित, आदिवासी, कृषक, ग्रामीण एवं मलिन बस्तियों में रहने वाली स्त्रियों) की हक़ीक़त क्या है? आरम्भ करने के क्षण में क्या इन्हें नहीं रखा जा सकता? क्या इनकी बुनियादी ज़रूरतों एवं इनको मुख्य धारा में लाने के समुचित, सार्थक एवं सफल प्रयास नहीं होने चाहिए? इसको भी देखने और इनकी भी ज़मीन को समझना होगा। जो इसी सृष्टि और समाज में फैली हुई है। जो ज़्यादातर जगह समुचित देख-रेख के अभाव में बंजर और कमज़ोर हो चली है।

 आज गाँवों का सौन्दर्य जैसे लोक कलाएँ, ग्रामीण जीवन या यूँ कहें कि लोक की सामूहिकता, परम्परायें, तीज, त्यौहार, आपसी सौहार्द बाज़ारवाद एवं विनाश रूपी विकास के कारण नष्ट होने के कगार पर खड़ी है। तो फिर आरम्भ करने के क्षण में इन स्थितियों, परिस्थितियों और इसके ज़िम्मेदार कारकों को कैसे नज़रअंदा़ किया जा सकता है। इन सबके लिए ज़रूरी है कि अब हम दैनिक कार्यों की व्यस्तता की मजबूरी से, भौतिक सुखों की गुलामी से मुक्त होकर, अपनी दशा नहीं बल्कि हम किस दिशा में जा रहे हैं इस पर भी मंथन करें। वैसे भी घुप्प अंधेरे में रोशनी की किरण ही काफ़ी है सो पूरा दिन, पूरा, महीना पूरा साल ना सही..... एक घंटा, बस कुछ दिन, चंद क्षण तो निकाले ही जा सकते हैं जिससे शायद व्यष्टि से लेकर समष्टि तक एक बड़ा बदलाव आ सके। वास्तव में आरंभ करने के क्षण में यह सब भी निहित होना चाहिए। क्योंकि कुछ भी आरंभ करने की पृष्ठभूमि इन्हीं सब बातों से बनती है।

इन सब बातों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि किसी भी कार्य और विचार को मूर्त रूप देने एवं आरम्भ करने का सबसे उपयुक्त समय और अवसर अभी है, न की आने वाला कल। वैसे भी बीते हुए कल पर हमारा कोई ज़ोर नहीं और आने वाले कल पर कोई वश नहीं और ना ही कोई पकड़। अतीत हमारे लिए आज का मार्गदर्शक हो सकता है और सुनहरे भविष्य की कल्पना आज का उत्साह। इन्हीं दोनों के सम्मिलन से एक बेहतर भविष्य का निर्माण और आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वर्णमयी अतीत हम दे सकते हैं। बशर्ते हमें वर्तमान क्षण की गति और लय को समझना होगा। अपने आँखों के सामने फैले हुए आज के दौर और अभी के परिदृश्य को सपनों में नहीं वरन् हक़ीक़त में आँखे खोल के देखना होगा। देश और दुनिया में विद्यमान विभिन्न समस्याओं मसलन- धर्म, लोक, संस्कृति, सभ्यता, शिक्षा, राजनीति समाज की जड़ों एवं ज़मीन को तलाशना होगा। उन कारणों की व्यापक एवं सूक्ष्म पड़ताल ज़रूरी है जो मनुष्य को ही मनुष्य के शोषण का मार्ग सुझाती है। जहाँ मनुष्यता द्वितीयक और स्वार्थपरता प्राथमिक हो। ऐसे में आज और आज ही क्यों? बल्कि अभी इस विषय पर विचार करने एवं कार्य रूप में परिणत करते हुए एक सजग चेतना के साथ उठ खड़े होने की आवश्यकता है। जब समाज का प्रत्येक वर्ग इन सब बातों, हालातों से वाक़िफ होकर लोक कल्याण की भावना से यदि अपने क्षेत्र या स्व के कार्यों का निर्वहन ही पूरी ईमानदारी, निष्ठा, त्याग, धैर्य और पूर्ण समर्पण के भाव से करें तो आरम्भ के क्षण की सार्थकता स्वतः सिद्ध हो जायेगी।

इस विषय के सारतत्व के रूप में महात्मा गाँधी के इस कथन से काफ़ी कुछ समझा जा सकता है कि- जो सबसे ग़रीब और कमज़ोर आदमी तुमने देखा हो, उसकी शक़्ल याद करो और अपने दिल से पूछो कि जो क़दम उठाने का तुम विचार कर रहे हो, वह उस आदमी के लिए कितना उपयोगी होगा। क्या उससे उसे कुछ लाभ पहुँचेगा? क्या उससे वह अपने ही जीवन और भाग्य पर कुछ काबू रख सकेगा? यानि क्या उससे उन करोड़ों लोगों को स्वराज्य मिल सकेगा जिनके पेट भूखे और आत्मा अतृप्त है?

धीरेन्द्र प्रताप सिंह
शोध छात्र (डी.फिल. हिन्दी साहित्य)
इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद
सम्पर्क सूत्र: 09415772386
dhirendrasingh250@gmail.com


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