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05.03.2012
 

डूब चुके कितने अफ़साने
देवमणि पांडेय
 


डूब चुके कितने अफ़साने इन आँखों के पानी में
नाम तलक न आया मेरा फिर भी किसी कहानी में

जीवन ऐसे गुज़र रहा है साए में दुख दर्दों के
जैसे फूल खिला हो कोई काँटों की निगरानी में

छीन लिया दुनिया ने सब कुछ फिर भी मालामाल रहा
जब - जब मुझको हँसते देखा लोग पड़े हैरानी में

किससे कीजे सच्ची बातें किसके आगे खोलें दिल
हर इंसान नज़र आता है शामिल बेईमानी में

दुनिया जिसको सुबह समझती तुम कहते हो शाम उसे
कुछ सच की गुंजाइश रक्खो अपनी साफ़ बयानी में

ख़ुदग़र्ज़ी और चालाकी में डूब गई दुनिया सारी
वर्ना सच्चा ज्ञान छुपा है बच्चों की नादानी में


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