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ISSN 2292-9754

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07.29.2014


स्वर्ण आभा गुजरात –एक अदभुत भागीरथ कार्य
समर्पित साहित्य सेविका और तपस्विनी डॉ॰ अंजाना संधीर के सम्पादन का प्रतिफल!

अपनी बुलंदियों को साहित्य जगत के क्षितिज की ओर ले जाने वाली डॉ. अंजना संधीर अब किसी परिचय की मोहताज नहीं है। वे - हिंदी, अंगरेज़ी, उर्दू और गुजराती में लेखन करती हैं। देश-विदेश की पत्रिकाओं में उनकी रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं। उर्दू से हिंदी एवं गुजराती में रचनाओं के अनुवाद भी प्रकाशित हो चुका है। स्वर्ण आभा गुजरात के स्वरूप में उनकी संपादन क्षमता का एक अनोखा अद्भुत चमत्कार सामने है, जिसके साक्षी आज हम सभी बने हैं।

श्री रामवतर त्यागी का एक कविता की पहली दो पंक्तियाँ याद आती हैं -

"इस सदन में मैं अकेला ही दिया हूँ, मत बुझाओ
जब मिलेगी रोशनी मुझी से मिलेगी !!”

हाँ उस दिये की लौ को रौशन करने का यह काम अंजाना ने किया है, इसमें दो राय नहीं है।

‘स्वर्ण आभा गुजरात’ गुजरात की 100 महिलाओं की हिन्दी में लिखी कविताओं का संपादित काव्य संग्रह है, जिसमें पहली बार 1950 से अब तक की महिलाओं की हिन्दी कविताओं का सम्पादन हुआ है। उनका परिचय, तस्वीर व संपर्क सूत्र भी उसमें शामिल है....!! यह निस्संदेह एक साहित्य की साधना का व एक मनोबल का प्रतीक है, जिस कार्य में अंजना संधीर ने दक्षता हासिल की है।

‘प्रवासिनी के बोल’ और ‘प्रवासी आवाज़’

यह पहली बार नहीं हुआ है – सन् 2006 में प्रवासिनी के बोल का आगमन यू.एस.ए. व कनाडा की प्रवासी नारियों के सृजनशीलता का प्रतीक बना, जिसमें 81 अमरीकी हिन्दी कवियित्रियों की सचित्र रचनाएँ, परिचय सहित प्रस्तुत है, तथा ३३ महिला प्रतिभाएँ जो हिन्दी से जुड़ी हुई है, उनका परिचय, सचित्र रचनाओं के साथ एक संगठित बेमिसाल कार्य रहा। (इसी के संद्रभ में श्री कमलकिशोर गोयनका का कथन अंजना जी की कर्म निष्ठा को ईंधन सी ऊर्जा देने के लिए पर्याप्त है - "इतनी सारी प्रवासी कवित्रियाँ पहली बार हिन्दी संसार के सन्मुख आ रही हैं, इतनी प्रकार की अनुभूतियाँ हमें मिल रहीं है - मेरे विचार में यह प्रयास सतुत्य है, स्वागत के योग्य है" आगे उनका कहना है कि "उन्होंने सदैव यही आग्रह किया है कि भारत में अभी तक अमरीका के हिन्दी साहित्य को कोई विशिष्ट पहचान नहीं बनी है।")

फिर 2009 में शृंखला की एक और कड़ी "प्रवासी आवाज़" हमारे समक्ष ४४ प्रवासी कहानीकारों को एक संकलन के रूप में सामने आया- जिसने पहली बार १९५० से २००७ की अब तक की कहानियाँ, जो प्रवासी आँगन की शोभा थीं, उन्हें अब अपने देश के साहित्य से जोड़कर पहचान पाने की सफल कोशिश है। सचित्र परिचय के साथ इतनी सारी कहानियाँ अपने कथ्य और शिल्प के द्वारा, जिनमें शामिल है -मातृ-भूमि, परिवेश, अपनों से अलग होने की कसक, सामाजिक परिस्थितियों से गुज़रते हुए कुछ अनुभव और ढलती उम्र की व्यवाहरिक आसानियाँ और दुश्वारियाँ, जो एक सूत्र से बँधी हुई मानवता का प्रतीक लगती हैं। अंजना द्वारा संपादित इन दो जुड़वाँ संकलनों ‘प्रवासिनी के बोल’ और ‘प्रवासी आवाज़’ इसी बात के ज़ामिन है और यह कहने में कोई अतिश्योक्ति न होगी कि अंजना जी ने संपूर्ण जीवन एक समर्पित साहित्य सेविका और तपस्विनी बनकर साहित्य साधना को अर्पण किया है। प्रवासी साहित्यकारों के लिए यह गर्व की बात रही और रहेगी। अब इसमें एक कड़ी आज जुड़ी है स्वर्ण आभा गुजरात के रूप में और हम सभी नरियाँ अपनी पहचान दर्ज कराते हुए गौरवान्वित महसूस कर रही हैं। यह एक अनोखा, अद्भुत भागीरथ कार्य है। निश्चय ही ये सभी कलश संदर्भ-ग्रंथ की मानिंद अपने पुस्तक-कोश में रखना हमारा सौभाग्य होगा।

असल में देखा जाय तो यही ‘महिला दिवस’ है जहाँ नारी अपनी पहचान दर्ज कराती है, और अपनी क़लम के माध्यम से पहचानी जाती है। साहित्य के रास्ते की हर दुश्वारी आसानी में परिवर्तित होती है, जब हौसले साथ-साथ हों। उन्हीं हौसलों के बल पर अँधेरों के गर्भ से उजाला निकाल आने का प्रयास सफल होता है।

महाराष्ट्र अकादेमी के अध्यक्ष डॉ. दामोदर खड़से जी ने एक जगह लिखा है-

आइने भी अब सियासत कर रहे हैं
ख़ास चेहरों पर इनायत कर रहे हैं
ये उजाला उन अदीबों ने किया हैं
जो अँधेरों से बगावत कर रहे हैं

नारी को सम्मान अधिकार पाने और प्रयोग करने का पूरा अधिकार है। उसे अपनी क्षमताओं को पहचानने और प्रदर्शन करने से, इस सदी में तो कोई नहीं रोक पाएगा। आशावादी राहों पर चलना उसका अधिकार है।

दुष्यंत जी ने लिखा था-

"कैसे आकाश में सुराख नहीं होता,
एक पत्थर तो तबीयत से उछलो।"

अंजना जी वही काम किया है। जो भी किया है निष्ठा के साथ किया है, तबीयत से यह संघर्षमय वाटिका बनाई है। क्योंकि वह दुष्यंत जी के इस कथन की अहमियत जानती है- "सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं है। मेरी कोशिश है कि सूरत बदलनी चाहिए।" इस कोशिश को नक्शे-पा पर चलते हुए अंजना जी ने अपनी निष्ठावान सोच को अमली जामा पहनाया है। इस कोशिश जिसमें उनका योगदान अमूल्य है। ये साहित्य के सिर्फ अंजना जी की ही नहीं, हर उस नारी की पहचान है जो अपने क़लम के तेवर से ख़ुद को ज़ाहिर कर पाती है। यक़ीनन इस कार्य में वह अकेली इस नाव को नहीं खेती है, उसके साथ एक काफ़िला भी है !

मैं अकेला ही चला था जानिबे-मंज़िल
लोग आते गए कारवां बनता गया

अब मैं इस नए कलेवर की साहित्यकारों का ज़िक्र करना चाहती हूँ.......!!

कहते हैं साहित्य जीवन का अलंकार नहीं है, वह स्वयं जीवन है। साहित्यकार सृजन के क्षणों में उस जीवन में जीता है, और पाठक पढ़ने के क्षणों में...! मुझे याद है, कभी भूली ही नहीं, कोटा से पाक्षिक पेपर ‘समाचार-सफर’ में बोल्ड शब्दों में तेज़ाबी तेवरों से ओत-प्रोत दो पंक्तियाँ अपने भावार्थ को साकार करते हुए लेखक का पाठक से नाता दर्ज करने से नहीं चूकीं। पंक्तियाँ है--–

"मौत हो जाएगी विधवा, जिस दिन मैं मर जाऊँगी
तेरे लिए ऐ ज़िंदगी, मैं कुछ कर जाऊँगी"

जीवन की आशा और मौत की निराशा के बीच का जीवन भी रचनाकार जीता है –यह हमारे सामने वरिष्ठ स्नेहमयी साहित्यकार डॉ. इन्दिरा दीवान मौजूद है- उनकी लिखी हुई कालजयी रचना का एक अंश है।

मैं "स्वर्ण आभा गुजरात” की चंद नारियों के मन के विविध रंग रेखांकित करूँगी। आज जब बाह्य जीवन से संबंध रखनेवाले राजनीति, समाज, आदि के क्षेत्रों में भी हमारे मन में एक प्रतिक्रियात्मक ध्वंस में ही जीवित रहने पर बाध्य किया है, तब काव्य की धारा से नारी अस्मिता की संपादक रचना निगम रिश्ते नमक कविता में नारी मन की बात रखते हुए कहती :

कुछ चेहरों पर / लटकी हुई हैं तख्तियाँ /
रिशतों की /अनचाहे बोझ सी/

स्व. मरियम ग़ज़ला: एक बहुभाषी, बहुविधाओं पर कलम चलाती रही और उनके साहित्य के विविध पक्ष सामने आते रहे साहित्य के माध्यम से। वह खुद भी चलती फिरती रुबाई थी। उनका एक शेर-

मैं उससे बात करूँ ये मेरी मजाल कहाँ?
वो बदमिजाज़ है, बदखू है, बद ज़ुबान भी है।

प्रसिद्ध गुजराती नॉवल कृष्णायन की रचनाकार काजल ओझा वैध्य गद्य में अपनी पहचान रखती है। मैंने यह नॉवेल हिन्दी में पढ़ा है अंजना जी ने हिन्दी में अनुवाद किया है। काजल जी के पद्य में भी इनकी क़लम के तेवर कश्मीर नामक कविता की इन पंक्तियों में महसूस करें:

कश्मीर-मुझे हमेशा एक आँसू की तरह लगता रहता है/
न बहता-न सूखा/ एक जमा हुआ आँसू /उसमें वह दर्द है/
जो हड्डियों में सर्दी घुसने के बाद होता है/

यहाँ मुझे याद आती है अंजना जी की लिखी कविता "अमरीका हड्डियों में जम गया’ जिसका अनुवाद डॉ. बलशौरी रेड्डी जी ने तेलुगू में सन 2004 में किया था.. और उनकी एक बेहतरीन ग़ज़ल जो ह

निकले गुलशन से तो गुलशन बहुत याद किया
धूप को छाँव को आँगन को बहुत याद किया
तुझको भी याद सताती है मेरी क्या मालूम
मैंने भाई तेरी दुल्हन को बहुत याद किया

मेशा मन को अभिभूत करती रहती है...

यह है शब्दों के माध्यम से छलकता हुआ दूरियों का दर्द, जो प्रवासी भारतीय यहाँ से वहाँ जाकर बस जाते हैं। वे अपने संस्कार, सभ्यता, संस्कृति अपने साथ ले जाते हैं। शब्दों का सौंदर्य उनकी भावाभिव्यक्ति के स्वरूप उनके हृदय की भावनाओं का एक निर्झर झरना बनकर प्रवाहित हुए बिना नहीं रह सकता। काव्यरचनात्मकता नारी मन को को खुद से जोड़ते हुए जन मानस से जोड़ती है। साधना भट्ट की रचनात्मक झरने से शब्दों की रिमझिम रिमझिम बरस रही है:

पवन की बांसुरी ने मल्हार राग छेड़ा है
बूंदों की रिमझिम जलतरंग साथ लाई है
सागर की प्रीत से बादल खींचे आए हैं
अपने इक वादे पर दोस्ती निभाए हैं
बादलों पे बादलों के टोले/ बौछार पे बौछार//

हिन्दी भाषा की कार्य में अपना योगदान देने वाली मंजु महिमा अपनी कलर ब्लाइंड कविता में वर्तमान समाज की सच्चाई रखते हुए लिखती हैं:

समय की कूची / वर्तमान के केनवास पर/
खींच रही है/ न जाने कितने/ चाहे/ अनचाहे चित्र/

अनकहे अछूते शब्दों की भाषा ही मन की भाषा है।

संग्रह के आख़िरी पन्नों में एक महत्वपूर्ण अनुक्रम दिया है जो बहुत ही महत्वपूर्ण सूचि की मानिंद प्रस्तुत किया गया है, यह सुविधप्रादन प्रयास है:

गुजराती कवियित्रियों व कवियों की रचनाओं का गुजराती से हिन्दी में अनुवाद
अमरीकी हिन्दी कविता में नारी वाद: जिसमें कई प्रवासी नारियों की प्रतध्वनित होती आवाज़ है और सबसे विशेष: गुजरात की महिला रचनाकारों की हिन्दी में प्रकाशित पुस्तकें आदि।

स्वर्ण आभा गुजरात का यह अविस्मरणीय अवसर एक नए आगाज़ का ऐलान है। जल्द ही स्वर्ण कलश गुजरात के आगमन का इंतज़ार रहेगा। इसमें गुजरात से पहली बार हिन्दी कहानियों का यह जुड़वाँ संपादित कहानी संग्रह होगा। ये जुड़वाँ संग्रह प्रवास से और गुजरात से अंजना जी की सम्पादन क्षमता और आभा को ध्रुव तारे की तरह प्रकाशमान करते रहेंगे।

विशेष साधुवाद व धन्यवाद अंजना जी को देती हूँ कि उन्होने मुझे प्रवास के संकलनों में शामिल किया और गुजरात से भी दो सिंधी महिलाओं को शामिल किया है। -साहित्य में जात-पात का कोई हस्तक्षेप नहीं, कविता तो दिल से निकलकर ज़बान तक आते आते में शब्दों में ढाल जाती है। श्री गोपालदास नीरज का एक शेर है-

इतना बदनाम हुए है हम, इस ज़माने में
सदियाँ लग जाएँगी लोगों तुम्हें भुलाने में

यहाँ मैं अंजना जी के इस वंदनीय कार्य के लिए उन्हें हार्दिक बधाई देते हुए आशीर्वाद के तौर यही कहूँगी.....

शोहरत जो कमाई है, तुमने ये ज़माने में
गुज़रेंगी कई सदियाँ, अब तुमको भुलाने में
...स्वयं रचित

जयहिंद !

देवी नागरानी
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