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ISSN 2292-9754

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02.28.2016


आस्थाओं की व्यापकता व अनुभवों की गहराई से उजला "सूरज मेरा दुश्मन"

काव्य संग्रह: सूरज मेरा दुश्मन
लेखकः संगीता सहजवाणी
प्रकाशकः परिदृश्य प्रकाशन , धोबी तलाब, मुंबई - 2
ल्यः रु. 75/
पृष्ठ: 80

हिंदी साहित्य के आकाश में एक और नया सितारा रोशन नज़र आ रहा है, जो अपना परिचय अपनी सहजता से अपनी कविताओं में दे रहा है। जी हाँ यह है संगीता सहजवाणी जो एक नये सूरज से हमें रू–ब-रू करा रही हैं जो मानवता का दुश्मन है। अपने परिवेश की परिधि में संगीता ने जितनी सरलता से दोस्ती का दावा किया है, उतनी ही सहजता से निभाया भी है। पर इस दोस्ती के दायरे में उन्वान ''सूरज मेरा दुश्मन'' इस इन्द्रधनुषी आकाश पर कुछ और ही रंग बिखेर रहा है। अपने अस्तित्व की अभिव्यक्ति को जानना और जानकर कम से कम शब्दों में परिभाषित करना, अपने आप में एक अनुभूति है। सच में देखा जाये तो कविता, संवेदनशील हृदय की पारदर्शी अभिव्यक्ति है और शब्द उसी कविता के सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि! जिनका आधार लेकर संगीता जी की निःशब्द सोच शब्दों के सहारे अपने कवि हृदय से झर-झर कर बहती हुई काव्य धारा में हमें बहा लेने में परिपूर्ण है। उनकी अभिव्यक्ति की शिद्दत को उनके ही शब्दों में सुनिये-

"मैं तब तक नहीं लिख पाती जब तक लिखना विवशता न बन जाय''

अब अपनी विवशता को हमारी विवशता बनाकर उन्होंने अद्भुत अनुभूतियों से हमारा परिचय करवाया है जहाँ हम आस्थाओं की व्यापकता व अनुभवों की गहराई में एक ठहराव पाते हैं। जिया गया आदर्श, काव्य सौंदर्य तथा कथ्य और शिल्प का अद्भुत तालमेल पाठक की उत्कंठा को जगाये रखने के लिए बहुत हैं और संगीता जी ने अपने शब्दों के जाल से समाँ बाँधते हुए अपने अनुभवों से हमें परिचित करवाते हुए लिखा है...

"तुमने माँगा नहीं, कहा है। मैंने दिया नहीं, सहा है"

एक संदेश, एक बोध, के रूप में ब्रह्म वाक्य बनकर जीवन के क्षितिज पर सहज मार्गदर्शक बनकर दमक रहा है। वे समाज की विसंगतियों की ओर इशारा करते हुए "कौवे" नामक कविता में उनका भाव-बोध देखिये-

इस देश में कौवे बहुत हैं / जहाँ मैं रहता हूँ
उन्हें दुत्कारने का / अधिकार नहीं है मेरा
क्योंकि मैं स्वयं भी / उनसे कम कौवा नहीं

अनायास होंठों से फिसलती हँसी जब संजीदा हुई तब समझ में आया कि संगीता जी यह पैग़ाम ख़ुद को नहीं सारी मानवता को दे रही हैं। भावार्थ को समझिए, परखिये.....

कांव कांव तू क्या करे, करेगा कितनी बार
सब चुप है तुम भी रहो, समझो सच का सार

अपने ही अस्तित्व का दृश्य, अदृश्यता में ढूँढना, अपने वजूद की तलाश में खोकर एक सच के साथ साक्षात्कार करना मनुष्य के लिए गौरवपूर्ण उपलब्धि है... अपने होने और न होने के इस पारदर्शी पर्दे को फ़ाश करना सरलता की हदों से बहुत परे है, जिसका ज्ञान कहीं गहराइयों में धँस कर संगीता ने पाया है वही हमारे साथ साँझा करते हुए कहती हैं-

हर नकार के माल में / मकड़ी बना, मेरा अस्तित्व
है तो - पर नहीं – सा

संगीता जी की कविताओं से गुज़रते हुए दुनियां की मामलेदारियों को सलीक़ेदार शब्दों में अभिव्यक्त करने की कला के दर्शन के साथ-साथ परिवेश की चिंता, दोस्ती से उतरकर दुश्मनी के मंच पर रक्स करता ज़हरीला अनुभव, मानों हर कविता उनके व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व करती है। जो बात सामान्य आदमी देखता है, देखकर अनदेखा कर जाता है, रचनाकर उसी उलझन की गुत्थी को सुलझाने का प्रयास करता है। लेखक पीड़ा को महसूस करके, उसे अभिव्यक्त करने की चेष्टा करता है। यही कला, यही फ़न संगीता जी के काव्य में पाया जाता है। सोच की शिला को शब्दों में तराशकर, अनुभव की आकृति को तैयार किया है।

अपने भीतर झाँककर देखना आत्मलोकन की क्षमता को बढ़ाकर सच के सामने खड़े होने का साहस पाना अपने आप में एक आश्चर्यजनक अनुभूति है। मन रूपी पंछी शरीर के पिंजड़े में क़ैद, अपनी रिहाई की आस में छटपटाता है, यह उसकी मजबूरी है जिसका निष्कर्ष वह नहीं निकाल पता है-

हाथ उठाये। बिन हिले-डुले – मजबूर

सच में देखा जाय तो संवेदनशील हृदय की पारदर्शी अभिव्यक्ति शब्द कविता का सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि है..

"विश्वास की दृष्टि को चाहिये / सत्य का आकाश, तथ्यों का प्रकाश
अविचारी श्रद्धा अथवा अविश्वास / देते है हमको अंधत्व

हर भ्रम की सीमाओं को उलाँघते हुए, प्रेम के आयामों से साक्षात्कार कराती, संगीता जी की काव्य बोध, सौंदर्य बोध की शब्दावली देखिये ...

प्यार वो/लेना है तो अपनाओ पूरा का पूरा/नहीं तो छोड़ दो ........
यह वह खरा सोना है/जिसके गहने नहीं बनते

स्त्री मन में करवट लेती कई धारायें, धारणाएँ प्रश्न-चिह्न बनकर मन को उकेर देती हैं - बुद्धि पर पड़े अंध विश्वास के बारे में, सबके मुँह पर सन्नाटों के चिपटे टेप, चौराहे पर लावारिस लाशों का घोषित किया जाना, मौत की घातक -धारदार मार जिसे मनोभावों ने झेला है, विज्ञान की नई राह, जहाँ सभ्यता ने मापदंड के नये-नये पैमाने विकसित किये हैं, दूर-दूर के रास्ते नज़दीकियों के दायरे में ला ख़ड़े किये हैं, और सफ़र के छोर पर रेगिरस्तान को हरा-भरा करने का जो प्रयत्न किया गया है वही बिम्ब बनकर रेखांकित हुए हैं।

कवयित्री कविता की नखशिख की विलक्षणता की पक्षधर है वह सुन्दरता से अपनी रचना को सलीक़े से शृंगारित करती, भावों में महकाती पाठक के मानस पर काव्योन्माद से परिपूरित एक छवि को निखार कर प्रस्तुत करती है। कहीं-कहीं तो कविताओं का एक-एक शब्द ध्वन्यात्मक, लयात्मक और दमकता हुआ दिखाई देता है, जैसे अपनी आभा जनमानस में बिखेरने का स्तुत्य प्रयास कर रहा है.

उनका यह पहला सफ़ल प्रयास कई और रचनाओं के अंकुर अपने गर्भ में लिये हुए है जो शृंखला बनकर साहित्य के फ़लक पर अपना मुक़ाम पायेंगें. इसी विश्वास और आशा के साथ मेरी शुभ कामनाएँ उनके सफ़र में हमसफ़र रहेंगी।


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